मंगलवार, 27 जनवरी 2015

66 वॉ गणतंत्र दिवस नया संदेश लेकर आया है।

  •               गणतंत्र दिवस 26 जनवरी को हर वर्ष आता है। यद्यपि वर्ष-दर-वर्ष समय व्यतीत होने के कारण  राष्ट्र प्रत्येक गणतंत्र दिवस पर पिछले गणतंत्र दिवस की तुलना में कुछ न कुछ विकास की ऊॅंचाई को प्राप्त अवश्य करता है। लेकिन इस वर्ष का गणतंत्र दिवस कुछ नई ऊॅचाईयों को लेकर आया है। आखिरकार कल से पूरे मीडिया में ''बराक ओबामा'' व ''भारतीय गणतंत्र दिवस'' ही छाया हुआ है। यह पहला अवसर नहीं है जब किसी देश का राष्ट्राध्यक्ष या प्रधानमंत्री हमारे गणतंत्र दिवस में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने आया है। लेकिन बात ''बराक ओबामा'' की कुछ अलग ही है। सोवियत संघ के टूटने के बाद विश्व में सर्वश्रेष्ठ शक्तिशाली व मजबूत लोकतंत्र देश के रूप में स्थापित युनाईटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका के राष्ट्रपति ''बराक ओबामा'' के भारतीय गणतंत्र दिवस के कार्यक्रम में शामिल होने पर उनका हार्दिक स्वागत है। यह गणतंत्र दिवस इस मायने में इसलिये महत्वपूर्ण हो जाता है कि विश्व के इस सबसे ताकतवर व्यक्ति ने विश्व का सबसे बडा़ लोकतांत्रिक देश भारत की बढ़ती हुई विश्व शाक्ति की पहचान को गणतंत्र दिवस में शामिल होकर अंतर्राष्ट्रीय मान्यता दी है। इसके लिये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी साधूवाद के पात्र है जिन्होंने राष्ट्रपति बराक ओबामा से अपने 8 महिने के कार्यकाल में 6 मुलाकातें कर एक व्यक्तिगत सम्बंध स्थापित कर भारत को अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज पर एक विकसित देश की ओर अग्रेषित राष्ट्र के रूप मे पेश करने का सफल प्रयास किया है। इस गणतंत्र दिवस पर दोनों देशों के प्रमुखों ने स्थापित परम्पराओ को तोड़ा है। जहॉ बराक ओबामा की भारत आने की और गणतंत्र दिवस पर शामिल होने की तीव्र इच्छा ने उनके स्थापित पूर्व निर्धारित कार्यक्रम स्टेट अॅाफ दा यूनियन को संबोधित करने के कार्यक्रम को 12 दिन पूर्व सम्पादित कर अमेरिका की स्थापित परम्परा को तोड़ा है। इस परम्परा के कारण ही तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.व्ही.नरसिम्हाराव के निमंत्रण को तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन स्वीकार नहीं कर पाए थे। उसी प्रकार भारतीय प्रधानमंत्री ने भी अभी तक की स्थापित परम्परा को तोड़कर भारत की धरती पर पहॅुचे ओबामा का हवाई अड्डे पर पहुच कर स्वागत किया। यह न केवल दोनो देश की एक-दूसरे के प्रति निकटता और सम्मान को प्रदर्शित करता है बल्कि दोनांे देशों प्रमुखों की व्यक्तिगत केमेस्ट्री को भी झलकाता है।
  • आईये जिस प्रकार उपरोक्त प्रोटोकाल दोनों देशों के प्रमुखों ने तोड़ा है। क्यों न इस देश के राजनैतिज्ञ आगे बढ़कर उनके ही द्वारा स्थापित इस गलत प्रोटोकाल को क्यों न तोड़ा जाए जहॉ हम एक व्यक्ति की आलोचना सिर्फ इस आधार पर करने लगते है कि वह हमारी विरोधी पार्टी में चला गया। इसके पूर्व वह जब हमारा साथी था तो हम उसके सिर्फ गुणगान करते नहीं थकते थे। किरण बेदी इसका ताजा उदाहरण है। जब तक वह अन्ना आन्दोलन की सदस्य रही कोई पार्टी  में शामिल नहीं हुई तब तक उनके साथ काम कर रहे केजरीवाल के लिये आदरणीय रही, लेकिन जैसे ही वे भाजपा में गई, दोनों का रूख एक-दूसरे के प्रति उलट गया। राजनीति की इस स्थापित परम्परा (लेकिन लिखित नहीं) को हमारे राजनेताओं ने ही विकसित किया है।आज के इस गणतंत्र दिवस पर हम दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों द्वारा तोड़ी गई परम्पराओं का अनुकरण कर क्यों नहीं यह सीख लेते है कि क्यों नहीं हम एक व्यक्ति की आलोचना, समालोचना, प्रशंसा या निंदा उसके व्यक्तित्व और कार्यो के आधार पर करे। बजाय उसके किसी राजनैतिक पार्टी से जुड़े रहने के वजूद के आधार पर। यदि वास्तव में इस देश में गुण-दोषों के आधार पर राजनैतिक आलोचनाएं और मूल्यंाकन हो जाएगा तो निश्चित मानिये जो देश के विकास में सबसे बड़ा अड़ंगा इस राजनैतिक आलोचनाओं के कारण होता है, जहॉ हमारे पास अपने विरोधियों द्वारा किये गये अच्छे कार्यो के लिये बढ़ाई के लिये दो अच्छे शब्दों का अकाल भी पड़ जाता है, वह अड़ंगा दूर हो जायेगा।
  • यह गणतंत्र दिवस मुझे तो यही प्रेरणा देता है कि हमारे देश का राजनैतिक वातावरण इस स्थापित कु परम्पराओं की जंजीरों को तोडकर एक स्वच्छ विकासशील, एक-दूसरे के पक्षों के गुणों को सुशोभित करते हुए आगे बढ़े। 

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