बुधवार, 28 जनवरी 2015

क्या दिल्ली विधानसभा के चुनाव राष्ट्रीय आम चुनाव है ?

दिल्ली विधानसभा के चुनाव 07.02.2015 तारीख को सम्पन्न होने जा रहे है। न तो यह दिल्ली विधानसभा का पहेला चुनाव है, और न ही यह आम राष्ट्रीय चुनाव है। लेकिन जिस तरह से इलेक्ट्रानिक मीडिया द्वारा इस चुनाव को हाईलाईट किया जा रहा है वह किसी भी आम राष्ट्रीय चुनाव से भी ज्यादा है। विधानसभा बनने के पूर्व दिल्ली मेट्रोपोलियन काउन्सिल थी और उसके सदस्य मेट्रोपोलियन काउन्सिलर कहलाते थे। उनका स्टेटस एक ''पार्षद'' से कुछ ज्यादा लेकिन ''विधायक'' से बहुत कम हुआ करता था। दिल्ली एक पूर्ण राज्य भी नहीं है। अधिकार की दृष्टी से यदि उसकी तुलना एक छोटे से राज्य गोवा, असम इत्यादि राज्यो से भी की जाए तो भी उसके अधिकार तुलनात्मक रूप से काफी कम है।
यद्यपि यह बात सत्य है ''दिल्ली'' देश की राजधानी होने के कारण उसका अलग महत्व है। वैसे ही ''मुम्बई'' जो देश की आर्थिक राजधानी कही जाती है का महत्व है। अधिक से अधिक दिल्ली का महत्व मुम्बई से कुछ ज्यादा ही कहा जा सकता है। लेकिन देश की मीडिया ने जिस तरह से दिल्ली विधानसभा के चुनाव को ''हाईलाईट'' कर ''जगह'' (स्पेस) दिया है। वह निश्चित रूप से आश्चर्यचकित करने वाली है। यह मीडिया की साख पर एक प्रश्न वाचक चिन्ह भी लगाती है। मीडिया का जो प्रथम व प्राथमिक दायित्व है वह जनता की विभिन्न ज्वलन्त होती समस्याओं को जनता और सम्बंधित पक्षो के सामने लाना है। उन पर एक स्वस्थ बहस करवाकर सबंधित पक्षो का ध्यान आकर्षित कर उन समस्याओ को सुलझाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देना है। लेकिन जिस तरह से जब से दिल्ली विधानसभा के चुनाव की घोषणा हुई है, तब से लेकर अभी तक व मतदान के होने के दिन तक होने वाली लगातार बहस का क्या औचित्य है ? क्या यह जनता के मूल्यवान समय की बरबादी नहीं है ? क्योकि जनता को तो जो परोसा जाता है उसे देखने के लिये वह मजबूर है। क्या दिल्ली विधानसभा के चुनाव देश की सेहद व स्वास्थय् के लिए इतने महत्वपुर्ण है कि उन्हे 24 घंटे 24 दिन लगातार परोसा जाये ? इसके कुछ समय पूर्व हाल ही मे हुए चार विधानसभाआंे के चुनाव को भी मीडिया ने इतनी ''जगह'' व महत्व नहीं दिया। क्या देश के प्रधानमंत्री का (भारतीय जनता पार्टी के नेता के रूप मे नही) दिल्ली जैसे छोटे से राज्य के चुनाव में चार-पॉच चुनावी सभाओ मे भाषण देने की योजना बनाना उनके देश मे बढ़ते हुये स्टेटस को देखते हुये क्या उचित है ? यद्यपि राजनैतिक रूप से प्रधानमंत्री को पूर्ण रूप से यह अधिकार है कि वह अपनी पार्टी को मजबूत करने के लिए अपनी पार्टी के नेता के रूप मे जितनी चाहे भागीदारी करे।
अतः यह स्पष्ट है कि मीडिया हाऊस मे इलेक्ट्रानिक मीडिया की इतनी ज्यादा संख्या हो गई है कि हुए परस्पर गलाकाटू प्रतिस्पर्धा के कारण वे ''सबसे पहले व सबसे आगे कौन'' की प्रतिस्पर्धा भावना के कारण वे हर उस घटना -दुर्घटना, राजनैतिक परिस्थितिओ का आकलन इत्यादि विभिन्न विषयो को लेकर उनकी सूचनात्मक व गुणात्मक जानकारी देने के बजाऐ वे उसे इतना महिमा मंडित कर रह है जिस कारण वे उस कृत्य मे पूर्णतः असफल रहे है कि किस घटना, किस समाचार को कितना महत्व दिया जाए। मीडिया को अमेरिका के मीडिया से इस बात से सीख लेनी चाहिये कि अमेरिका मीडिया ने बराक ओबामा की भारत यात्रा व नरेन्द्र मोदी की हाल में हुई अमेरिका यात्रा को कितना कवरेज दिया है।
भीड़-तंत्र के इस युग मे भेड़िया़-घसान चलने वालो के समान ही मीडिया भी वही काम कर रहा है जिस पर लोकतंत्र के प्रहारियो को गहनता से विचार कर मीडिया को दिशा दिखाने के लिये सार्थक पहल करनी चाहिये। 

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