शनिवार, 25 अप्रैल 2020

भारतीय जनता पार्टी ‘‘मुस्लिम विरोधी नहीं’’ वरण ‘‘मुस्लिम विरोधी छाप’’ लिए हुये हैं।

भारतीय राजनीति मैं जनसंघ जो आगे चलकर वर्तमान भाजपा के रूप में परिवर्तित हुई है,के सम्बन्ध में एक जमाने से ही यह शाश्वत तथ्य सर्वमान्य रूप से विद्यमान हो गया है कि भाजपा एक मुस्लिम विरोधी राजनीतिक पार्टी है और कॉंग्रेस मुस्लिम परस्त राजनीतिक पार्टी हैं। वास्तव में कांग्रेस पर न केवल आजादी के बाद से बल्कि यह कहना ज्यादा उचित होगा कि आजादी के पूर्व से भी यह आरोप लगता रहा है कि कांग्रेस हमेशा मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति अपनाती रही है और इसी नीति के अन्तर्गत वह सदैव ही राष्ट्रीय सुरक्षा व देश हित को दर किनार करती आ रही हैं। ऐसे कई अवसर हमारे देश में आए जब कांग्रेस पर आरोप लगा कि उसने मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के चलते राष्ट्रीय हित में या तो निर्णय लिए ही नहीं या गलत निर्णय के लिये।
इसके विपरीत भाजपा जनसंघ के जमाने से ही अपने आप को हमेशा एक राष्ट्रवादी पार्टी के रूप में प्रस्तुत करती रही और ऐसे प्रस्तुतीकरण में उसकी सबसे बड़ा सहायक उसकी मुस्लिम विरोधी छवि ही रही। एक उदाहरण आपके सामने प्रस्तुत हैं। शाहबानांे मामले में उच्चतम न्यायालय के अंतिम बंधनकारी निर्णय को तबकी राजीव गांधी की कांग्रेस सरकार ने संसद में बिल लाकर निर्णय को पलट दिया था, तब भाजपा ने ही उसका पुरजोर तरीके से विरोध किया था। भाजपा के सत्ता में आने के बावजूद मोदी के प्रथम कार्यकाल में भी कमोबेश भाजपा की यही छवि बरकरार रही। इसी कार्यावधि में हज यात्रा सब्सिडी की समाप्ति जैसे कुछ कदम उठाये गये। यद्यपि सत्ता में आने व बने रहनें के लिये भाजपा ने मुसलमानों की सामाजिक दुर्दशा को सुधारने के लिए भी कुछ कदम उठाए। ट्रिपल तलाक उन्मूलन ऐसा ही एक बड़ा प्रगतिशील कदम माना गया, जिसका मुस्लिम समुदाय विशेषकर महिला मुस्लिम समाज ने दिल से समर्थन किया।
मोदी के दूसरे कार्यकाल में दो बड़ी घटनाएं ऐसी हुई है, जिनसे भाजपा की स्थापित छवि पर विपरीत असर पड़ा है। जिन आधारो पर यह कहा जा सकता है कि भाजपा मुस्लिम विरोधी पार्टी नहीं है। प्रथम शाहीन बाग में 100 दिन से ज्यादा चले लंबे चक्का जाम आंदोलन को समाप्त कर चक्का जाम हटा कर वहॉं के रहवासियों को हो रही असुविधाएं एंव तकलीफों को दूर करने के लिए केंद्रीय सरकार ने कोई प्रभावी कदम नहीं उठाये और न ही कोई कारवाई की। जबकि दिल्ली में पुलिस विभाग जिसकी यह जिम्मदारी है, वह दिल्ली प्रदेश सरकार के अधीन न रहकर केंन्द्र सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन हैं। राजनीतिक दृष्टि से दिल्ली के चुनाव तक कोई कार्यवाही न करना तो समझ में आता है, लेकिन चुनाव उपरान्त भी कोई कार्यवाही न करना समझ से परे है। बल्कि इसके विपरीत केंद्रीय शासन और भाजपा के नेता गण उक्त जिम्मेदारी व उत्तरदायित्व का ठीकरा लगातार दिल्ली की प्रदेश सरकार के सिर पर फोड़ते रहें। भला हो ‘‘कोरोना’’ आगमन का जिसके कारण उक्त चक्काजाम समाप्त हुआ। याद कीजिए, उसी दौरान दिल्ली में दंगा भड़कने के बाद जब केन्द्रीय सरकार ने ऐजन्डा तय कर लिया तब 2 दिन के अंदर ही दंगे को पूर्णतः नियंत्रित कर लिया गया था। ठीक इसी प्रकार शाहीन बाग में भी त्वरित व प्रभावी कार्यवाही करके चक्का जाम को समाप्त कर इस मामले को बहुत ही अच्छे ढंग से सुलझाया जा सकता था। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। 
दूसरी घटना वर्तमान तबलीगी जमात के मरकज एवं देश में फैलकर छुपते फिरने और कोरोना फैलाने की दुर्भावना के मामले को लेकर है। 10 मार्च से लेकर 28 मार्च तक केन्द्र सरकार के ठीक नाक के नीचें निजामुद्वीन मस्जिद दिल्ली में तबलीगी जमातियों द्वारा जिस तरह का नंगा नाच नाचा जा रहा था, वह देश के सामने आ चुका है। देश की बाह्य व आंतरिक सुरक्षा में लगे हुए छटवे प्रमुख व्यक्ति राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को स्वयं रात के 10-11 बजे जाकर मस्जिद प्रमुख मौलाना मोहम्मद साद से अनुरोध करके निजामुद्वी्न मस्जिद खाली करानी पड़ी। तिस पर भी मौलाना मोहम्मद साद के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत निरोधक आदेश तुरंत तो छोडिये वरण आज तक भी जारी नहीं किये गये। दूसरे दिन मात्र एक सामान्य प्रथम सूचना पत्र निजामुद्वीन थाने में दर्ज की गई जिसके बाद से मोहम्मद साद फरार है। तब शासन प्रशासन द्वारा यह प्रसारित किया गया कि वह 14 दिन के कोरोनटर््ाईन मे है। हद तो तब हो गई जब पुलिस प्रशासन द्वारा यह स्पष्टीकरण दिया गया कि मौलाना साद के कोरोनटर््ाईन होने के कारण उससे 14 दिन तक पूछताछ नहीं की जा सकती है। देश में लागू दंड पक्रिया संहिता के अन्तर्गत अपराधी आरोपी से सीधे पूछताछ की है, न कि उसके वकील के माघ्यम से यह विशिष्ट सुविधा भी साद को दी जा रही है। परन्तु क्यों?
एक अपराधी जिस पर राष्ट्रीय लॉंक डाउन के नियमों के उल्लघंन सहिता भारतीय दंड सहिता के कई अपराधो के संगीन आरोप है। इसके अतिरिक्त वीसा नियमों का उल्लघन करने वाले विदेशियों को प्रश्रय देने का आरोप है। साथ ही कुछ क्षेत्रों मे तो यह भी आरोप लगाया जाता है कि एक गहन साजिश व षडयंत्र के तहत मौलाना मोहम्म साद ने तबलीगी जमात के माध्यम से पूरे देश में कोरोना फैलाने का षडयंत्र रच रखा है। वस्तुतः 22 प्रदेशों में कोरोना संक्रमित तबलीगी पाए गए है। ऐसी असहनीय स्थिति में ऐसे जघन्य अपराधी से गहरी छानबीन हेतु तुरन्त पूछताछ न करना, न केवल आश्चर्य जनक है, बल्कि देश की सुरक्षा व हितो के एकदम विपरीत भी है। इन 14 दिनांे में साद ने बैठे संचार के आधुनिक माध्यमों का उपयोग करके क्या-क्या गुल खिलाए होगंे इसकी केवल कल्पना भर की जा सकती हैं। इतना ही नहीं तबलीगी जमात के रोहिंग्या मुसलमानों से भी संबंध है तथा तबलीगीयों ने रोहिंग्याओं के साथ मिलकर कोरोना फैलाया गया है, यह आरोप भी मौलाना साद पर लगभग है। साथ ही विदेशांे से हवाला द्वारा अवैध रूप से बड़ी धन राशि प्राप्त करने का आरोप भी मौलाना साद पर लगाया गया है। ऐसे गहन आरोपांे से सुशजित आरोपी से ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार एक डॅंाक्टर समस्त सुरक्षा कवच के साथ अपने रोगी की देख भाल एवं इलाज कर रहा है, से समस्त (पीपीडी किट इत्यादि सहित) सुरक्षा कवच पहने पुलिस टीम मौलाना साद से गहन पूछताछ तत्काल क्यों नहीं कर सकती थी, यह एक महत्वपूर्ण अनुत्तरित प्रश्न हैं। 
तबलीगी जमातीयांे के प्रति लोगों में कितना रोश है, इसे आप भोपाल के एक व्यक्ति (उसका नाम में भूल रहा हॅूं) जिसने फेसबुक पर अपना कुछ मिनटो का एक वीडियों डाला है। उसको देखिए, जिसमें वह कहता है प्रधानमंत्री मोदी को देश की जनता ने इस संकट काल में उनके द्वारा तीन बार किये गये राष्ट्रीय आव्हान को पूरा समर्थन दिया। लेकिन निजामुद्वीन से भागे तबलीगी जमातियों को सरकार अपना मेहमान क्यों मान रहीं है? उनसे बार-बार सामने आने के लिए विनम्र अनुरोध क्यों कर रहीं है, यह सब समझ से परे है। न्याय संगत होगा, इन्हें पकड करके ला कर निजामुद्वीन मस्जिद में बंद कर देना चाहिए और भोजन व इलाज की कोई सुविधा न देकर उन्हें कोरोना से होने वाली मृत्यु का भयावद्ध एहसास होने देना चाहिए। न तो यह मेरे विचार है, और न ही मैं इससे सहमत हूॅं,। लेकिन यह वही जमात है, जिसकी देश के अंदर कोरोना के कुल संक्रमित मरीजों में लगभग 35 प्रतिशत की भागीदारी है। उक्त व्यक्त भावनाओं से कुछ अंश तक सहमत हुआ जा सकता है अथवा नहीं यह निर्णय मैं आप सबके विवेक पर छोड़ता हँू।       
 इस संदर्भ में मध्यप्रदेश के भोपाल की एक कार्य योजना का यहां उल्लेख करना भी सामयिक ही होगा। मिसरोद (भोपाल) से बाहर सीधा भोपाल इंदौर की रोड़ को जोड़ने वाला लम्बा फलाई ओवर व आठलेन रोड़ बनाते समय रास्ते में आये समस्त लगभग 100 मंदिरों मठो को हटाया गया। लेकिन इसके विपरीत कमला पार्क में राजाभोज केवल स्टेआर्क फलाई ओवर का निर्माण करते समय मस्जिद का जरा सा हिस्सा आने के कारण डिजाइन को ही बदलना पड़ा, मस्जिद के पुल के निर्माण के रास्ते में आने वाले भाग को हटाया नहीं गया। यह शिवराज की भाजपा सरकार का उठाया गया कदम था जो मुस्लिम तुष्टिकरण या मुस्लिम भय के परिणाम स्वरूप था, आप स्वयं ही समझियें। ऐसा ही एक मुस्लिम तुष्टिकरण से संबंधित आदेश रायसेन कलेक्टर का है। ‘‘रमजान’’ में मुस्लिम समाज को रोजे के लिये आवश्यक सामग्री पहुंचाने के निर्देश अधीनस्थ प्रशासनिक अधिकारियों को दिये। लेकिन ऐसे ही निर्देश नवरात्री के समय उपवास रखने वाले हिन्दुओं के लिये नहीं दिये गये। 
उपरोक्त दोनों घटनाएं व मध्यप्रदेश की सरकार की उक्त कार्य प्रणाली, क्या इस बात को सिद्व नहीं करती हैं कि भाजपा मुस्लिम विराधी पार्टी नहीं है, बल्कि वास्तव में छदम मुस्लिम विरोधी छाप लिए हुये है? क्या भाजपा में अल्पसंख्यक मोर्चा व संघ में मुस्लिम राष्ट्रीय मंच का गठन भी यही इंगित नहीं करता है ? इन घटनाओं ने भाजपा के उक्त मिथक मुस्लिम विरोधी को चकनाचूर कर दिया है, जिसे देश स्वीकार भी कर लेता यदि यह वास्तव में देश हित में होता। लेकिन वस्तुतः दोनों घटनाओं में समय पर कड़ी व प्रभावी कार्यवाही न करना राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रि हित के बिल्कुल विरूद्ध है। भाजपा की उक्त अकर्मण्यता क्या उसकी नीति में कुछ बदलाव की सूचक है? या यह भी कोई राजनीति का भाग है, यह तो भाजपा ही जाने । लेकिन यह स्पष्ट है कि भाजपा के कट्टर समर्थको को छोड़ भी दें तो भी, एक सामान्य नागरिक जो भाजपा की कई नीतियों का समर्थक नहीं है, लेकिन वह यह अवश्य मानता है देशहित के विरूद्व काम करने वाले मुस्लिम कट्टवाद जिसके कारण ही मुसलमानों के मन में देश के प्रति घृणा फैलाई जाती है, इनके खिलाफ समय पर सही व कड़क प्रभावी कार्यवाही कर सकती है तो वह एकमात्र पार्टी भारतीय जनता पार्टी ही है। ऐसी सोच वाले नागरिकों को निश्चित रूप से भाजपा के बदलते रूख से निराशा ही हाथ लगेंगी। भाजपा को इस पर गहराई से गहन आत्ममंथन करने की आवश्यकता है। अंततः भाजपा की अब मुस्लिम तुष्टीकरण या मुस्लिम भयाक्रात (मुस्लमानों से ड़र) की नीति है, यह समय ही तय करेगा।
 धन्यवाद!

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