शनिवार, 25 अप्रैल 2020

‘प्रधानमंत्री जी का राष्ट्र के नाम संबोधन ! कितनी आशा ! कितनी निराशा!‘‘


कोविड-19 (कोरोना) के भारत में आने के बाद हमारे देश के प्रधानमंत्री का यह चैथा संबोधन हूआ है । यह तो तय ही था की लाॅक डाउन कुछ समय के लिये आगे बढेगा।  कुछ दिन पूर्व ही प्रधान मंत्री की देश के मुख्यमंत्रियों के साथ कुछ विडीयों कान्फ्रेसिंग के दौरान 10 से ज्यादा मुख्यमंत्रियों ने न केवल लाॅक डाउन बढाये जाने की वकालत की थी, बल्कि तीन प्रदेश के मुख्यमंत्रियों ने तो प्रधानमंत्री के संदेश आने के पूर्व ही लाॅक डाउन की अवधि 30 अप्रैल तक बढा दी थी । किसी भी मुख्यमंत्री ने स्पष्ट रूप से लाकडाउन बढाने का विरोध नहीं किया था । प्रश्न यह है कि जनता अपने मन में जो आकांक्षाये, छूट की मंशा इस संदेश के लिये पाली थी, क्या उसकी पूर्ति या आंशिक पूर्ति हुई है तथा प्रधानमंत्री द्वारा समय पूर्व उठाये गये कदमों का,जैसा उन्होने स्वकथित किया है, का निष्पक्षता से विश्लेषण किया जाना आवश्यक है ।
आप जानते ही हैं । विगत दिवस प्रधानमंत्री ने यह बात कही थी कि अब ‘‘जान है तो जहान है‘‘ के आगे अब जान है ‘‘और‘‘ जहान भी सूत्र पर कार्य किया जायेगा । लेकिन प्रधान मंत्री के आज के संदेश में कम से कम 07 दिन तो जान है और जहान भी है का सूत्र नजर नहीं आयेगा । अभी 20 तारीख तक तो ‘‘जाॅन है तो जहान है‘‘ पर ही सरकार आगे कार्यशील रहेगी। प्रधानमंत्री ने यह तो स्पष्ट कर दिया है कि अगले 20 दिन 02 मई तक देश में लाॅक डाउन की स्थिति रहेगी। 07 दिनों बाद नागरिकों द्वारा लाॅक डाउन का कडाई से पालन करने की स्थिति में कोरोना मरीजों की संख्या न बढने पर सामान्य दैनिक जीवन दिनचर्या के लिए आंशिक छूट पर विचार किया जायेगा और तदानुसार जान है ‘‘और‘‘ जहान है को लागू किया जा सकता है । यधपि सरकार ने दूसरे दि नही लम्बी चैेडी एडवाइजरी जारी कर दी लेकिन उसमें भी कई अपूर्णतायें जैसे कारपेंटर,प्लम्बर,इलेक्ट्रिसियन को छूट दी गई है लेकिन उसको कार्य करने के लिये आवश्यक सामान जिनसे क्रय कर सकें उन दुकानों को छूट नहीं दी है । 
प्रधानमंत्री ने देश के नाम संदेश में प्रारम्भ में ही एक बडी महत्वपूर्ण बात कही है कि देश में कोरोना का प्रथम मरीज आने के पूर्व ही सरकार ने विदेशों से विमानों से आने वाले यात्रियों की सक्रिनिंग चेंकिंग प्रारम्भ कर दी थी ।  लेकिन जानकारों का कहना है कि वस्तुतः यहा पर सरकार ने अदूरदर्शिता का परिचय और सावधानी से काम नहीं लिया। जैसा कि आपको मालूम ही है कि देश में कोरोना का प्रथम मरीज 30 जनवरी को केरला प्रदेश में आया था । यघपि चीन में हुबई प्रदेश की राजधानी वुहान में अक्टूबर में ही वहां के डाॅक्टर ने कोरोना बीमारी की पुष्टि कर दी थी । लेकिन चीन ने विश्व को प्रथम कोरोना रोगी की जानकारी सर्वप्रथम 30 दिसम्बर को दी थी । 07 जनवरी को वुहान में रहने वाले समस्त विदेशी नागरिकों को यह सूचना जारी कर दी गई थी कि आपका वीजा की अवधि कम की जा रही है, और आप 03 दिन के अन्दर अपने-अपने देश लौट जाएं । तदानुसार 10 जनवरी को भारत में आइटीबीपी के दो जहाजों द्वारा लगभग 560 व्यक्ति भारत वापस आयें । भारत में प्रथम कोरोना रोगी आने के पूर्व तक यह स्पष्ट हो चूका था कि विश्व के लगभग 30 देशों में एक लाख व्यक्ति कोरोना के रोग से संक्रमित हो चुके थे । 30 जनवरी को सरकार के सामने कोरोना की आगे आने वाली कुुछ भयावहता का चित्रण तो सामने आ चुका था । लेकिन शायद सरकार इस कोरोना बीमारी की गंभीरता को तत्समय समझ नही पाई । इस कारण उस समय सरकार ने प्लेन से उतरने वाले यात्रियों की मात्र थर्मल रीडिंग ली गई और साथ में उनसे यह घोषणा पत्र भरवाया गया कि वे स्वयं घर में 14 दिन कोरोनटाईन में रहेगें । यह निश्चित रूप से पर्याप्त सावधानी नही थी । 
हम सब जानते है कि हमारे देश में शपथ पत्र या स्व घोषणा (सेल्फ डिक्लरेषन) का कितना महत्व नागरिक लोग मानते है और उसका पालन करते है । इसके अतिरिक्त हवाई यात्रियों को भी शायद यह जानकारी रही होगी कि उनकी थर्मल चेकिंग होगी । इसलिये शायद पेरासिटामाल दवाई का अधिकांशतः उपयोग करने के कारण एयरपोर्ट पर कोरोना के सम्भावित संक्रमित व्यक्ति अधिकांशतः नहीं पकडे गये । नागरिकों सहित सरकार यह जानती थी कि विदेशों से आने वाले यात्रियों के द्वारा ही देश में कोरोना का आना सम्भव है । तब सरकार को 30 जनवरी के बाद से ही बाहर से आने वाले विमानों को देश में या तो उतरने ही नहीं देना था व उन्हें वापस भेज देना चाहिये था । अथवा यात्रियों को उतार कर  उन्हें अपने नियत्रण में लेकर उनकी जाॅच कर 14 दिन तक एयरपोर्ट व आस पास स्थित होटलों व अन्य स्थानों में रिपोर्ट आने तक उन्हें रोक कर कोरोनटाईन में रखना चाहिये था । तब निश्चित ही भारत में एक भी कोरोना संक्रमित रोगी नहीं होता और न ही सक्रमण फैलता । तब देश को लाॅक डाडन किये बिना ही हम न केवल देश के नागरिकों के स्वास्थ्य को सरुक्षित रख पाते, बल्कि देश का आर्थिक स्वास्थ्य भी वैसे ही सामान्य गति से चलता रहता जैसा कि पूर्व में चल रहा था । यहां एक उल्लेखनीय बात यह भी है कि विश्व स्वास्थ्य संगठने ने 30 जनवरी को ही पी एच आई सी सी की एडवाइजरी जारी कर दी थी ।   
एक प्रश्न अवश्य यह पैदा होता है कि जो लगभग 1500000 व्यक्ति (एक अनुमान के अनुसार) जो विदेशों से अन्तर्राष्ट्रीय उडानों द्वारा भारत में आए थे, उनके प्रति भारत सरकार का क्या दायित्व था। एक अनुमान के अनुसार लगभग 80 प्रतिशत लोग भारतीय नागरिक या भारतीय मूल के विदेशों में रहने वाले व्यक्ति थें और शेष विदेशी नागरिक थे । भारत से जाने वाले भारतवंशी अपने सुनहरे भविष्य अवसर और समृध्द जीवन के लिये वे विदेशों में जा कर या तो नौकरी कर रहे थे या व्यवसाय कर रहे थे । उनमें से कुछ लोग वहां के नागरिक भी बन गये थे । ऐसे समस्त भारतीयों को भारत सरकार ने जबरदस्ती विदेश नहीं भेजा था। वे स्वयं अपनी इच्छा से भारत से गये थे । इसलिये भारत सरकार का कोई कानूननी दायित्व न हाने के बावजूद, भारतीय होने के कारण भारतीय संस्कृति के आभा मंडल फलस्वरूप भारत सरकार का यह नैतिक दायित्व था कि वे अपने मूल के लोगों की जान माल की रक्षा करें । शायद इसी कारण से उन्हे न केवल भारत आने से रोका नहीं गया बल्कि सरकार ने स्वयं पहल करके विशिष्ट व चार्टर्ड उडानों के द्वारा उन्हें अपने देश में लाया भी।  
लेकिन निश्चित रूप से इस प्रारम्भिक चूक के बाद केन्द्रीय सरकार बल्कि प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में पूरे राष्ट्र ने समस्त राज्यों की सरकारों सहित कोरोना को सक्र्रंमित होने से रोकने के लिए जिस तेजी से कदम उठाये वह काबिले तारीफ है । इसी कारण विश्व में इस समय सबसे सूझबूूझ और कठोर निर्णय लेने वाले नेता के रूप में नरेन्द्र मोदी को सराहा गया है । विश्व स्वास्थ संगठन ने भी बारम्बार प्रधान मंत्री मोदी की भूरी भूरी प्रशंससा की है । साथ ही विश्व के ताकतवर देश अमेरिका,इग्लैण्ड,ईजराईल इत्यादि देशों ने भी हमारे देश के प्रधान मंत्री के नेतृत्व को सराहा जो निश्चित रूप से देश के लिये एक गौरव की बात है । मोदी के साथ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एक सामान्य व्यक्ति (स्वयं सेवक) से होते हुये उन्होने प्रधान मंत्री पद को महान बनाया । वे ‘‘महान‘‘  होकर प्रधान मंत्री पद पर नहीं बैठे जबकि इस देश में महान होने के कारण प्रधानमंत्री पद पर बैठने की परम्पराये रहीं है । 
प्रधानमंत्री ने स्थिति को सामान्य लाने के लिये एक छुपी हुई चेतावनी भी नागरिकों को दी है। यधपि यहां उनका कुछ विरोधाभास दिखता है । एक तरफ वे कहते है मुझे देश के नागरिकों पर पूर्ण विश्वास है ओर उनको धन्यवाद भी देता हूें कि उन्होने लाॅक डाउन का पालन किया है । तब सात दिवस बाद छूट देने के लिये छुपी हुई चेतावनी देने की शायद आवश्यकता नहीं थी । लेकिन जब हम स्वयं देखते है देश के कुछ नागरिकगण अपने उत्तरदायित्व का पूर्ण निर्वाहन निश्चित रूप से नहीं कर रहे है जैसा कि मीडिया भी दिखा  रहा है।  इस कारण से सम्पूर्ण जनता को भुगतना पड रहा है और आगे भी पड सकता है । इसलिये प्रधान मंत्री की यह चेतावनी हमारी स्वयं की कार्य पघ्दति को देखते हुये सामान्य स्थिति लाने के लिये समायोचित ही है । 
एक बात इस कोरोना से पुनः सिध्द होती है कि कोई भी व्यक्ति या चीज पूर्ण नहीं होता है । कोरोना एक बुरे भयानक सपने के रूप में हमारे आखों के भीतर समा गया हेै । लेकिन इसके बावजूद इस भयंकर बुरी बीमारी से भी कई फायदे भी हमारे देश को हुये है। जैसे पेट्रोलियम उत्पाद के मूल्यों में अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में आई भारी गिरावट के कारण व उसके  उपभोग में कमी के कारण उसकी खपत कम हुई है, जिससे विदेशी मुद्रा की बचत हुई है । वाहनों के आवागमन की कमी के कारण वायु प्रदुषण में कमी के साथ-साथ सडक दुर्घटनाओं में कमी व उससे मरने वालों की संख्या में भी काफी कमी हुई है । जानवरों, पक्षियों को ज्यादा खूला स्वच्छ वातावरण मिला हैं । कार्बन आक्साईड में कमी, औधेागिक कचरे में कमी पारिवारिक संबंधों में प्रगढता व जीवन का आनन्द, बिजली,पानी की बचत सहित ‘‘ स्वच्छ भारत अभियान‘‘ को भी मजबूती मिली है । 
ठीक इसी प्रकार एक व्यक्ति में भी गुण दोष होते है । व्यक्तित्व पूर्ण रूप से कभी  गुणात्मक या नकारात्मक नहीं होता है। यही सिध्दांत मोदी जी पर भी लागू होता है जिस कारण प्रारम्भ में समय पर आवश्यक कदम उठाने में महत्वपूर्ण चूक होने से उत्पन्न परिस्थितियों को निपटने के लिसे उन्हें समस्त आवश्यक कदम तेजी से उठाकर उक्त चूक के दुष्परिणाम को नियंत्रित किया है । वैसे हमारे देश में पूर्व में गांधी जी, नेहरू जी जेसे महान व्यक्तियों ने भी एतिहासिक भूले की है ।                 
अंत मे सरकार को कोरोना समाप्त करने के लिये उठाये जाने वाले कदमों के साथ इस बात पर गम्भीरता से विचार करना होगा कि यदि सरकार ने कोरोना बीमारी के साथ साथ (बाद में नहीं) हो रही आर्थिक बदहवासी की नाकेबंदी नही की तो इसके  दुष्परिणाम जो तुरंत दिखाई न देकर चार छैः महीने बाद दिखेगें तब इस आर्थिक मंदी ब्रेक डाउन से उत्पन्न बेराजगारी, भुखमरी मानसिक तनाव व इन सबके कारण खराब होने वाली कानून  व्यवस्था के कारण ज्यादा जाने (जीवन) समाप्त होने की आशंकायें उत्पन्न हो सकती है । तब भी सरकार का जान है तो जहान है सिध्दात का उदेश्य असफल ही हो जायेगा ।
वैसे सरकार सहित हम सब नागरिकों को दक्षिण कोरिया से सबक लेने की आवश्यकता है जहां पर लाॅक डाउन किये बिना न केवल कोरोना को नियंत्रित किया गया बल्कि देश में कल आम चुनाव सम्पन्न कर पिछले 28 साल के इतिहास से सर्वाधिक वोट 62.96 प्रतिशत डाले गये जो समस्त विश्व के लिये एक दिशा ही नहीं चुनौती भी है ।

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