मंगलवार, 16 जून 2020

‘‘मोहम्मद साद‘‘ ‘‘कैमरे में कैद‘‘ लेकिन जेल में....? कब? ‘‘मोहम्मद साद‘‘ क्या अपराधियों का ‘‘आइकॉन‘‘ तो नहीं बन गया है?


 पुलिस का कार्य अपराध की जांच करके अभियुक्त को पकड़ कर न्यायालय से सजा दिलवा करके अंततः ‘कैदी‘ बनाकर जेल में ‘‘कैद‘‘ रखने तक का होता है। हद तो तब हो गई जब, पुलिस की लालफीताशाही और लेटलतीफी के चलते मीडिया ने, तबलीगी मरकज के मुखिया मौलाना मोहम्मद साद को शुक्रवार को दिल्ली की अबू बकर मस्जिद में नमाज पढ़ते समय अपने ‘‘कैमरे में कैद‘‘ कर लिया। जिस (गिरफ्तारी) ‘कैद‘ का कार्य पुलिस अभी तक नहीं कर पाई है, उसके लिये मीडिया को धन्यवाद! लेकिन ‘बेशर्म‘ पुलिस को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता हैं कि, मीडिया ने एक ऐसे अभियुक्त की ‘तलाश’ की, जिसकी जांच से लेकर गिरफ्तार करने तक के लिए पुलिस तथाकथित अधिकारिक रूप से तलाश? कर रही है। क्योंकि पुलिस ने साद के विरूद्ध लुक आउट नोटिस भी जारी किया है। यद्यपि साद ‘फरार’ चल रहें है, लेकिन पुलिस ने उन्हे भगोड़ा घोषित नहीं किया है। मीडिया की उक्त कार्यवाही के बाद भी पुलिस ने साद के विरूद्ध कोई कार्यवाही नहीं की? कोई भी जांच एजेंसीज इस संबंध में कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है। यद्यपि साद के वकील का यह दावा है कि पुलिस को उनकी लोकेशन मालूम है व साद पुलिस के निरंतर संपर्क में हैं। मीडिया ने साद की स्थिति (लोकेशन) बतला कर पुलिस को जांच में सहयोग ही प्रदान किया है। लेकिन पुलिस की मीडिया पर इतनी मेहरबानी अवश्य हुई कि, पुलिस ने उसकेे कार्य क्षेत्र में अनावश्यक रूप से दखल देने के लिए मीडिया के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की।
आखिर हम कैसी कानून व्यवस्था में रह रहे है? जी रहे हैं? देश की राजधानी दिल्ली में पुलिस की जांच कार्य प्रणाली और कानून व्यवस्था ऐसी हो जाए जहां कि, एक अभियुक्त की जब  भी मन, इच्छा और विवेक जागृत होने पर ही वह थाने में जाकर अपना बयान दर्ज करा कर जांच में सहयोग करें, व इस कार्य के लिये पुलिस उसका अहसान मानें। फिर पुलिस उसके गले में माला पहना कर मालायुक्त फोटो को देश में वायरल कर सफलता के लिए अपनी पीठ थपथपाऐं। सफलता शायद इस बात की, कि बिना किसी हिंसा (वायलेंस) व सांप्रदायिक तनाव के एक मुस्लिम अभियुक्त के विरुद्ध सफलतापूर्वक कार्रवाई कर ली? मोहम्मद साद को लेकर पुलिस का अभी तक का आचरण व रवैया लगभग ऐसा ही रहा है।
यह बात तो पुलिस के कार्य संस्कृति (वर्किंग कल्चर) की हो गई। लेकिन जरा कान खोल खोल के और आंखें फाड़ फाड़ के भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ. सैयद जफर इस्लाम को जानिए,  सुनिए, व उनके कथन (टीव्ही चेनल ‘‘आज तक’’ की बहस में) को समझ कर, उसे अपनी अंतरात्मा में उतारिए? जरूर वह कहते हैं, पुलिस अपना कार्य कर रही है और जब पुलिस, क्राइम ब्रांच, सीबीआई, एनआईए आदि या अन्य जांच एजेंसियां जो कि तबलीगी मरकज (मौलाना मोहम्मद साद से संबंधित) जांच में लगी हुई है, की जंाच के दौरान पुलिस कार्यवाही पर टिप्पणी करना उचित नहीं होगा। यह कथन ठीक उसी प्रकार का है, जब किसी प्रकरण न्यायालय में विचाराधीन होने पर उस पर टिप्पणी करते हैं। इस प्रकार जफर इस्लाम ने तो मौलाना मोहम्मद साद साहब की पुलिस जांच और न्यायालय में चल रही कार्रवाई को बराबरी से लाकर एक ही प्लेटफार्म पर रख दिया। उनकी इस नई खोज के लिए भाजपा को साधुवाद। यदि आज विधि विशेषज्ञ पूर्व केन्द्रीय मंत्री स्वर्गीय अरुण जेटली जिंदा होते तो, कानून की ऐसी धज्जियां उड़ाने वाली उक्त व्याख्या शायद संभव नहीं हो पाती?
दिल्ली पुलिस प्रशासन द्वारा मोहम्मद साद एवं विभिन्न जांच एजेंसियों द्वारा तबलीगी मरकज (जमात) के विरूद्ध की जा रही जांच की प्रक्रिया पर भाजपा के प्रवक्ता के द्वारा लगाये गए तड़के ने अपराधियों के मन व हौसलों को इतना ऊंचा उठा दिया है कि, अब उन्हें बेखौफ अपराध से बचाव में मौलाना मोहम्मद साद एक आइकॉन के रूप में दिखने लगा है। ज्यादा समय नहीं बीता है, जब लॉकडाउन के नियम तोड़ने के अपराध में यूपी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष को 24 घंटे के अंदर ही गिरफ्तार कर लिया गया था। लेकिन साहब! यहां तो ‘‘मौलाना मोहम्मद साद साहब’’ हैं, जो साहब के साथ ‘मौलाना’ भी है, इसलिए जांच की प्रक्रिया, पद्धति और दिशा भी वही तय करेगें। साद के गंभीर अपराधों में लिप्त व नामजद होने (जिसमें उन्हें आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती हैं) के बावजूद उन्हें यह विशेषाधिकार प्राप्त है कि, जांच के लिए न तो पुलिस उनके घर पर छापा मारकर गिरफ्तार करेगी और न ही वे ‘‘कोतवाली’’ जाकर अपने बयान दर्ज कराकर जांच में सहयोग करेंगे। बल्कि एक सफेदपोश अभियुक्त? (व्यक्ति) के समान पुलिस उनको एक नोटिस (प्रेम पत्र) जारी करेगी, जिसका जवाब ‘‘साहब‘‘ होने के कारण उनका ‘‘वकील‘‘ देगा। आगे भी नोटिस और जवाब की यह श्रंखला चलती रहेगी। ठीक उसी प्रकार जैसा कहा जाता है, कि कानून अपना कार्य करता है। आपराधिक न्याय शास्त्र के जांच के तरीके के ऐसे नए फंडे (सिविल कार्यवाही समान) की ईजाद के लिए दिल्ली पुलिस निश्चित रूप से बधाई की पात्र हैं?
भाई साहब! यदि कानून अपना कार्य करता होता तो, फिर उसकी न्यायिक, प्रशासनिक या अन्य किसी तरह की समीक्षा व देखरेख की आवश्यकता ही क्या है? अवधि वाधा विधि (लॉ आफ लिमिटेशन) के नियम, पुलिस की आपराधिक जांच प्रक्रिया में लागू नहीं होते है। इसलिए आप दिल्ली पुलिस से यह प्रश्न भी नहीं पूछ सकते कि, मोहम्मद साद के नमाज के लिए कम से कम आधे घंटे मस्जिद में रहने के बावजूद उसने उसके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की? उसे गिरफ्तार क्यों नहीं किया जा सका ? यदि उसे गिरफ्तार करना ही नहीं है तो, उस ‘‘बेचारे साहब‘’ को पूरे देशभर में बदनाम क्यों कर रहे हैं? कह दीजिए! आजीवन कारावास के आरोपों सहित आपका आरोपों से युक्त प्रथम सूचना पत्र (एफआईआर) गलत है? या जांच के दौरान यह निष्कर्ष निकाल लिया गया है कि, यह एफ.आई.आर नस्ती करने योग्य है? सिर्फ उनके एक बयान की आवश्यकता भर है? जिस दिन ‘वो‘ बयान हमे उनकी सहुलियत अनुसार दे देंगे, हम यह फाइल नस्ती कर देंगे? आप उनकी गिरफ्तारी की चिंता क्यों कर रहे हैं? मीडिया वालों को भी ऐसी रिपोर्टिंग कैमरे में कैद करने के पहले, अपने पास कम से कम एक स्थाई विधिक सलाहकार जरूर रखना चाहिए। ताकि उन्हें यह जानकारी हो सके कि एफ.आई.आर. में दर्ज किस अभियुक्त की फोटो कैमरे में कैद करना है और किसको नहीं? क्योंकि पुलिस को जिस व्यक्ति को गिरफ्तार करना है, उसकी फोटो ही मीडिया के कैमरे में कैद होनी चाहिए? अन्य किसी की नहीं? वकील होने के कारण इस पूरी कानूनी जांच की प्रक्रिया व व्यवस्था पर मेरा मन बड़ा व्यथित कुपित और क्रोधित है। यही तो मेरे पास रह गया है, जिसे मैं व्यक्त कर सकता हूं। इससे ज्यादा लड़ने की क्षमता व शक्ति मेरे पास अब नहीं रह गई है। लेकिन ईश्वर से यही प्रार्थना करता हूं कि, राजनीति का इतना घालमेल पुलिस प्रशासन में न होने दंे, जिससे अपराधियों में अपराध करने के पूर्व पुलिस और कानून के डंडे़ का ड़र बिलकुल ही समाप्त हो जाए तथा वह अपराधियों को और ज्यादा अपराध करने के लिए और प्रेरित न कर सकें।
धन्यवाद!

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