सोमवार, 1 जून 2020

क्या ‘‘कोरोना’’ ने ‘‘नौकरशाही’’ को कुंठित तो नहीं कर दिया है?



लॉकडाउन-4 समाप्त! लॉकडाउन-5 प्रारंभ नहीं। बल्कि इसकी जगह देश अनलॉक-1 (नॉकडाउन-1) के नये दौर में देश प्रवेश कर रहा हैं। यह नया दौर कैसा होगा, यह तो भविष्य ही बतलायेगा। आइये, तब तक नौकरशाही द्वारा जारी अपरिपक्व आधे-अधूरे आदेशों निर्देशों के संबंध में गुजरे लॉकडाउन का थोड़ा अवलोकन कर लें। ‘देश’ व ‘जीवन’ का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं बचा है, जहां कोरोना वायरस ने अपने डंक, जहर को फैलाकर किसी न किसी को बीमार कर के अपना प्रभाव न दिखाया हो। अफरशाही भी उससे अछूती नहीं रही है। इस कोरोना बीमारी के संकट कालखंड की पिछले 68 दिनों की अवधि में केंद्रीय व राज्य सरकारों के नौकरशाहों द्वारा इस कोरोना संकट से निपटने के लिए समय-समय पर जारी आदेश, निर्देश, एडवाइजरी पर एक सरसरी तौर पर नजर डालें। यह स्पष्ट हो जाएगा कि नौकरशाही स्वतः इस वायरस के डंक से ग्रसित होकर किस बुरी तरह से विवकेपूर्ण संवेदनशील व प्रभावी गंभीर निर्णय लेने में अक्षम व असफल हुई है। 
सर्वप्रथम प्रवासी मजदूरों के संबंध में केंद्रीय सरकार के निर्णयों का अवलोकन करें। पहले सरकार ने यह नीतिगत घोषणा की, कि जो मजदूर जहां पर कार्यरत हैं, वे वही रहेंगे। उनको लॉक डाउन की अवधि की मजदूरी/तनख्वाह नियोक्ता देगा। क्या सरकार या नौकरशाह (ब्यूरोक्रेसी) ने आज तक इस बात की चिंता, या पर्यवेक्षण अथवा देख-रेख की, कि सरकार के निर्देशों का कितना पालन हो पाया है? यदि सरकार ने वास्तव में इन्ही निर्देशों का कड़ाई से पालन करवा लिया होता तो, जो दुर्दशा मजदूरों की पिछले दो महीने से पूरे देश में ‘‘न भूतो न भविष्यति’’ जैसी हो रही है, वह नहीं होती। वैसे समस्त पक्षों की जमीनी व्यवहारिक स्थिति को देखते हुए सरकार का उक्त निर्णय न केवल गलत था, बल्कि अव्यावहारिक भी था। शायद इसीलिए सरकार ने उक्त नीतिगत निर्णय की समीक्षा की बात कभी भी नहीं की। देश के ‘जागरूक मीडिया व ‘समाज सुधारकों ने भी सरकार से इस संबंध में कोई प्रश्न नहीं पूछा। यदि सरकार इस निर्णय की समीक्षा करती तो, निश्चित रूप से इसका एक बेहतर व्यवहारिक हल सामने आता। वह शायद यह होता कि मजदूरी/तनख्वाह का पूर्ण दायित्व तीनों पक्ष बराबर से बांट कर वहन कर लेते। इससे सरकार, नियोक्ता व श्रमिक में से किसी एक पर पूरा भार नहीं आता और तीनो पक्ष परिस्थतियों संतुष्ट भी होते। यदि ऐसा निर्णय किया जाता तब ‘‘प्रवासी मजदूरों’’ की यह ‘‘नई’’ श्रेणी (जो पहली बार सुनी) भी हम को सुनने को नहीं मिलती। सरकार व नौकरशाही के गलत व असफल निर्णय की यह एक बानगी मात्र है।
समस्त प्रवासी श्रमिकों मजदूरों के संबंध में ही केंद्रीय अब सरकार के दूसरे निर्णय को भी देखें। सरकार ने पहले यह नीतिगत निर्णय लिया था कि समस्त श्रमिक अपने कार्यस्थल पर ही रहेंगे। बाद में विदेशों से भारतीय नागरिकों को स्वदेश वापिस लाने की व्यवस्था (वंदे भारत योजना) के चलते तथा मजदूरों की रहने और खाने-पीने की व्यवस्था चरमराने से श्रमिकों के अपने कार्य स्थल पर ही रहने के सरकार से नीतिगत निर्णय की धज्ज्यिा उड़ने लगी। श्रमिकों के मन में भी अपने गृह नगर जाने की भावना दिनों-दिन प्रबल होती गई। उस समय तक लॉक डाउन के कारण यात्री ट्रेनें बंद थी। तब सरकार ने लंबे समय के गहन सोच-विचार के बाद (अचानक नहीं) 30 अप्रैल को यह निर्णय लिया कि राज्य सरकारें सड़क माध्यम से इन प्रवासी मजदूरों को अपने गृह नगर वापिस ला सकती हैं। यह एक और अदूरदर्शिता पूर्ण, अव्यवहारिक निर्णय था, जो आपके सामने है। 
फिर बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी की केन्द्र सरकार से स्पेशल टेªन चलाने की मांग  के बाद 24 घंटे में ही सरकार या संबंधित अधिकारियों की चेतना, विवेक और बुद्धि जागृत हो गई और उन्हें यह महसूस हुआ कि करोड़ों की संख्या में जाने वाले प्रवासी मजदूर का ‘बस‘ से जाना ‘‘बस‘‘ में (संभव) नहीं है। इसलिए उन्होंने श्रमिक ट्रेन योजना का शुभारंभ किया। प्रश्न यही पैदा होता है कि, योजना जन्य इतनी बड़ी त्रुटि के लिए यदि अफसर जिम्मेदार थे, तो सरकार ने उनकी गलती को जनता के सामने लाकर दंडित क्यों नहीं किया? ऐसा करके सरकार को अफसरों की बलि लेकर अपनी पीठ थपथपाने का मौका भी मिल जाता। आखिर इस तरह के गलत निर्णयों के साथ खिलवाड़ कब तक चलता रहेगा? और यदि उक्त गलत निर्णय की जिम्मेदारी सरकार की थी तो, सरकार को सार्वजनिक रूप से इन गलतियां को स्वीकार करना चाहिए था। 
लोकतंत्र में निर्णय तो चुने हुए प्रतिनिधि लेते हैं और ब्यूरोक्रेसी उसको लागू करती है। परन्तु यह एक सांकेतिक (सिंबॉलिक) आदर्श स्थिति है। जबकि वास्तव में निर्णय प्रायः चुने हुए प्रतिनिधि के नाम पर नौकरशाह (ब्यूरोक्रेट्स) ही लेते हैं और उन पर जन प्रतिनिधियांें के निर्णय का अमली जामा पहनाया जाता है। प्रत्येक स्थिति में दोनों का चोली दामन का साथ है। इसलिए हर निर्णय के लिए दोनों तब तक संयुक्त रूप से जिम्मेदार हैं, जब तक कि वे एक दूसरे के खिलाफ कार्रवाई या आवाज नहीं उठाते। श्रमिक टेªन के संबंध में भी पहले दोनों राज्यों की स्वीकृति की शर्त को लगाया जिसे बाद में श्रमिक टेªन पहुंचने वाले राज्य की स्वीकृति की शर्त में बदला गया। पहले ही सही निर्णय क्यों नहीं लिया जा सका ?
बिना सोचे विचारें, अविवेक पूर्ण निर्णयों की इस संख्या की एक बानगी और देखिए। उत्तर प्रदेश में एक जिला मजिस्टेªट ने रेड़ जोन में कफर््यू लागू करने की घोषणा की। उक्त घोषणा के बाद उक्त घोषित क्षेत्र में बिना मानव दूरी बनाए नागरिकों की बाजार में एकदम से भीड़ बढ़ गई। देर रात्रि को प्रशासन ने उक्त आदेश के संबंध में यह स्पष्टीकरण दिया कि कफर््यू घोषित क्षेत्र में समस्त आवश्यक सेवाएं व खाद्य पदार्थो की पूर्ति होम डिलीवरी द्वारा की जाएगी। फिर कुछ समय बाद स्पष्टीकरण आया कि पूरे रेड़ जोन में कर्फ्यू घोषित नहीं किया गया है बल्कि सिर्फ हॉटस्पॉट/कन्टेनमेंट एरिया में ही है। जरा सोचिए प्रशासन ने अफरा तरफी के बाद जो स्पष्टीकरण जारी किए वही स्थिति कर्फ्यू आदेश जारी करने के पहले से ही उनके समक्ष नहीं थी क्या? बिना सोचे विचारे निर्णयों के अनेक एक उदाहरणों में से एक यह भी है।
प्रवासी मजदूरों के लिए चली श्रमिक ट्रेनों के संबंध में यात्रा किराए के बाबत दिनांक 01.05.2020 को रेल विभाग द्वारा जो निर्देश जारी किए गए थे, उनमें भी इतनी अस्पष्टता थी कि रेल्वे को तुरंत ही स्पष्टीकरण/संशोधित आदेश जारी करने पड़े। पहले जब श्रमिक ट्रेन चलाने का निर्णय लिया गया था, तब उसमें श्रमिकों के लिए किराए के छूट का कोई हवाला नहीं था। भेजने वाला राज्य (मूल राज्य) और गंतव्य राज्य दोनों की सहमति से ही रेल्वे ट्रेन की क्षमता का 90 प्रतिशत मांग किए जाने पर ही ट्रेन चलने की नीति घोषित की गई। किराया, टिकटें रेल्वे, राज्य सरकारों द्वारा दी गई सूची अनुसार छाप कर राज्य सरकार को देंगी, जो किराया वसूल कर श्रमिकों को देंगी। वह वसूला हुआ किराया राज्य रेल्वे को जमा करेगा। इस पर बवंडर मचने पर यह स्पष्टीकरण दिया गया कि 85 प्रतिशत किराया रेलवे स्वयं वहन करेगा और शेष 15 प्रतिशत किराया ही राज्य सरकारें वहन करेंगी। इसी प्रकार बाद में 12 मई से स्पेशल टेªन चलाने की घोषणा हुई। तब पहले यह कहां गया कि टिकटें सिर्फ ऑनलाईन आई.आर.सी.टी. बेबसाइट पर ही मिलेगीं और फिर कुछ समय पश्चात ही यह संशोधन कर दिया गया कि रेल्वे के कांउटर से भी टिकिटें मिलेंगी। स्पष्ट है, रेलवे अधिकारी भी निर्णय लेने के पूर्व उनके सामने उत्पन्न हुई परिस्थितियों को ध्यान में रखकर सही व पूर्ण आदेश जारी नहीं कर पाए। इसीलिए बार-बार उनको आदेशों में तत्काल अथवा कुछ समय बाद ही संशोधन करना पड़ रहा है। आखिर कोरोना वायरस ने रेलवे कर्मचारियों को कोई छूट थोड़ी प्रदान की है? जिसका प्रभाव उनके दिमाग पर न पड़े?  
मध्यप्रदेश की सरकार ने भी एक हफ्ते पूर्व यह निर्णय लिया था कि रेड़ जोन, कंटेनमेंट एरिया छोड़कर शेष क्षेत्रों के बाजार दाये-बाये (लेफ्ट-राईट) आधार पर खुलेगें। इसके लिए पेंट से निशानदेही (मार्किग) भी कर दी गई। हजारों रूपये खर्च होने के बाद दो दिन पश्चात उक्त आदेश संशोधित कर प्रतिदिन समस्त व्यवसाइयों के लिए बाजार खुलने के आदेश जारी कर दिए गये। आधे अधूरे निर्णय का यह भी एक उदाहरण है। 
इस प्रकार आधे-अधूरे अदूरदर्शी व अस्पष्टता लिये हुये निर्णयों की कोरोना काल में बाढ हैं, जिस पर सरकार भी ध्यान नहीं दे पा रही है। शायद कोरोना वायरस से संक्रमण का प्रभाव ही इस स्थिति के लिए जिम्मेदार है। इसीलिए क्या यह कहना उचित नहीं होगा कि, कोरोना के संकट काल खंड में नौकरशाही का विवेक और बुद्धि बीमार भी होकर कहीं कुठित तो नहीं हो गई है?   

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