सोमवार, 22 जून 2020

आखिर कब तक ऐसे ही ‘‘धोखे’’ खाता रहेगा भारत?

3488 किलोमीटर लम्बी भारत-चीन सीमा पर गुलाम रसूल गलवान के नाम पर प्रसिद्ध ‘‘गलवान घाटी‘‘ पर दोनों पक्षों के बीच हो रही चर्चा के बीच ही ‘‘चर्चा’’ ही सैनिकों के बीच खूनी संघर्ष में बदल गई। इसमे हमारे (निहत्थे?) कमाडिंग आफीसर कर्नल सहित 20 सैनिक शहीद होकर देश के लिए बलिदान हो गये। यद्यपि विदेश मंत्री के अनुसार हमारे सैनिक निहत्थे नहीं थे, लेकिन 1993, 96 व 2005 के समझौते से हथियार नहीं चलाने सेे बंधे थे। इस घोर अमानवीय कृत्य से फिर एक बार यह स्पष्ट हो गया है कि, विश्व के अन्य देशों की तुलना में चीन कभी भी हमारा विश्वसनीय साथी या पड़ोसी न कभी रहा है और न रहेगा। ‘नेेहरू‘ के जमाने में ‘‘हिन्दु चीनी भाई भाई के नारे‘‘ की जबरदस्त भावनापूर्ण नारों के बावजूद 1962 में चीन द्वारा भारत को दिये गये विश्वासघाती युद्ध के गहरे जख्मों को हम न तो भूले है और न ही भूल सकते हैं। चूंकि हमारे लगभग 43180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर चीन का आज भी अवैध कब्जा विद्यमान है। तब के घाव आज भी हमारे दिल में खंजर के समान चुभ रहे हैं। इन्हें निकालने के लिए हमारे देश की संसद मंे पारित सर्वसम्मत प्रस्ताव आज भी उसके क्रियान्वन की राह जोेह़ रहे हैं। 40 वर्षो बाद भी प्रस्ताव के क्रियान्वन की ‘‘चिंता’’ कहीं हमारे इतिहास के ‘‘शोध’’ का विषय न बन जाय। इसकी चिंता करने की गंभीर आवश्यकता है। इस संबंध में हमंे पाकिस्तान से अवश्य सीख लेना चाहिए, जो हमसे दो बार युद्ध में बुरी तरह से पराजित हो जाने के बावजूद भी ‘‘कारगिल’’ ‘‘ऊरी’’ ‘‘पुलवामा’’ जैसी अल्प युद्ध घटनाएँ करता रहा है। 
वर्ष 1962 में पीठ पर छुरा घोपना जैसे जघन्य विश्वासघात के बावजूद, चीन ने कम से कम 2 बार (1967, 1975 में) वास्तविक नियन्त्रण रेखा पर (एल.ए.सी.) पुनः पीठ में छुरा घोप कर हमारे सैनिकों के साथ खूनी संघर्ष किया हैं। पड़ोसियों व अन्य देशों पर दादागिरी जताकर उनके क्षेत्र हड़पते रहना ही चीन की कूटनीतिक राजनीति हैं। हम अभी भी सिर्फ वास्तविक नियन्त्रण रेखा की ही बात (एल.ए.सी) कर रहे है; लेकिन अन्तर्राष्ट्रीय नियन्त्रण रेखा एल.ओ.सी (मेक मोहन लाईन) की बात बिल्कुल भी नहीं कर रहे है। हमने कभी भी वास्तविक एल.ए.सी. का उल्लंघन कर उसे पार नहीं किया है। यही हमारे सैनिक सूत्रांे व सरकार का भी कथन है। 6 जून को मेजर जनरल स्तर की हुई वार्ता में हुये समझौते के बावजूद भी चीनी सेना वापस  उसकी सीमा लौटने के लिये पीछे नहीं लौटी, जिस मूल कारण से ही शायद उक्त सैनिक संघर्ष हुआ। हर बार की तरह इस बार भी सैनिक संघर्ष के माध्यम से चीन ने बार-बार बदलती हुई नियन्त्रण रेखा को पुनः बदलकर नई एक काल्पनिक नियन्त्रण रेखा पैदा की है। फिर चीन उस नई नवेली निर्मित (काल्पनिक) एल.ए.सी. को ही वास्तविक नियन्त्रण रेखा मानकर यथास्थिति बनाए रखने के लिये ही बातचीत करने को तैयार हो जाता है। हमेशा इसी प्रकार 4 कदम आगे व 2 कदम पीछे हटने की कारगर रणनति अपनाकर वह हमारी सीमा में अपनी घुसपैठ को बढ़ाते जाकर उसे तत्समय वैध बनाने का प्रयास करता है। 
इस सम्राज्यवादी विस्तारवादी रणनीति के तहत ही चीन ने, गलवान घाटी में हिंसक सैनिक संघर्ष करने के बाद, उस स्थान से पीछे हटने के बजाए, उसी को यथा स्थिति बनाये रखने के लिये भारत से फिर से बातचीत कर रहा है। अब तो उसने उसी गलवान घाटी पर अपना दावा ही ठोक दिया है। आज हमारी विदेश नीति, सैन्य नीति व अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति कसौटी पर है कि, हम चीन को पुरानी वास्तविक नियन्त्रण रेखा पर किस तरह कितने पीछे वापस भेज सकते हैं। हमारे विदेशी मामलों के जानकार एवं मीडिया बार-बार यह कह रहे है कि 01 अप्रैल 2020 की स्थिति पर वापस जाने के लिए चीन से परस्पर बातचीत हो रही है। मैं इस बात को बिलकुल भी नही समझ पा रहा हूं कि 1 अप्रैल 2020 को आधार वर्ष (सही दिन) मानने का आधार क्या है। कहीं इसका यह मतलब तो नहीं कि, 2014 के बाद (मोदी जी के प्रधानमंत्री पद पर आरूढ़ होने के बाद) या अधिकतम 1962 के युद्ध के बाद चीन ने हमारी सीमा की ओर आगे बढ़कर नई नियन्त्रण रेखा तो स्थापित नहीं कर ली है? और अब उसे ही वास्तविक नियन्त्रण रेखा सिद्व करना चाहता हैं? यह बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न है। इस पर आज तो नहीं; लेकिन स्थिति सामान्य हों जाने पर सरकार को तुरंत स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
हमें इस बात को भी याद रखना होगा कि, चीन से सामरिक मोर्चे पर स्थिति से निपटने के लिए पाकिस्तान तुल्य ही वही रणनीति नहीं पाली जा सकती है। पाकिस्तान व चीन दोनों देश यद्यपि हमारे पड़ोसी देश हैं। परन्तु हम कभी कभी यह भूल जाते है कि दोनांे की सैन्य, भौगोलिक और अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति में बहुत विरोधाभास है। इसलिये चीन के साथ सामरिक नीति बनाते समय हमें ‘‘पाकिस्तान’’ को ‘‘भूल’’ जाना होगा। आप इस पर से समझ लीजिए कि हमारे साथ गलवान में हुई खूनी सैन्य घटना पर विश्व भर से कोई प्रतिक्रिया ही नहीं आयी। और आयी भी तो, उसमे हमारा सीधा समर्थन नहीं किया गया। कहां गया कि ’’स्थिति पर नजर रखी जा रही है’’। यदि यह घटना पाकिस्तान के साथ हुई होतीे तो, भारत के साथ चंद कुछ मुस्लिम देशों को छोड़कर  विश्व का रवैया खुल कर प्रतिक्रिया स्वरूप समर्थन करने का रहता। यद्यपि भारत की अधिकारिक नीति भी मिलजुल कर बैठकर सीमा विवाद का हल निकालने की ही है। लेकिन इस मिलजुल कर बैठे चर्चा के दौरान ही तो गलवान में यह खूनी हिंसक हुआ। 
बेशक सम्पूर्ण देश, समस्त राजनीतिक पार्टीयाँ मजबूती के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व मे सेना के साथ खड़ी हैं। इसलिए आज का समय न तो सरकार को सलाह देने का है और न ही सरकार से इस संबंध में कोई ‘सैन्य’ प्रश्न पूछने का। अलावा देशहित में प्रधानमंत्री को छुपे हुये बताकर बाहर निकलें कथन व बचकानी हरकतों से, राहुल गांधी जो खुद छिपे हुये हैं, को बचना होगा। वे कम से कम अपनी मां से ही कुछ सीख लें। जिन्होंने तुलनात्मक रूप में इस समय संतुलित बयान दिया है कि, देश के इस संकट की घड़ी में कांग्रेस पार्टी सरकार व सेना के साथ खड़ी हुई है। यद्यपि कांग्रेस अपने ‘प्रश्न’ को उचित ठहराने के लिये 10 जुलाई 2013 को भाजपा प्रवक्ता रविशंकार प्रसाद द्वारा तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से पूछे गये इसी तरह के प्रश्न का सहारा ले सकती है। 
देश के प्रधानमंत्री के 56 इंची सीने का संदेश किसी एक देश के लिए संकेतक नहीं है। वरण उन समस्त देशों के लिये है, जो भारत की सीमाआंे पर बुरी नजर रख कर कुटिलता एवं धोखे से सीमा को प्रभावित करने की चेष्ठा करते है। मेरा यह अनुरोध है (यह कोई सलाह नहीं है) कि जब प्रधानमंत्री यह कहते है हम किसी को उकसाते नहीं है और जो ‘‘हमे उकसाता है हमे उसे यथोचित जवाब देना आता है’’; बेहतर होता इस लाइन के बदले प्रधानमंत्री यह कहते कि हमारा कार्य न तो धमकाना है और न ही हम किसी की धमकी में आते है। हम अपने देश की सीमा व देश की अखण्डता व सम्प्रभुता की रक्षा प्रत्येक क्षण पूरी ताकत व क्षमता के साथ करते हैं। भविष्य में भी इसी ताकत को और बढ़ाते रहेगंे। हमारी सुरक्षा की नीति किसी के उकसावे पर निर्भर नहीं है। यह बात पूरे विश्व को समझ लेनी चाहिए।
शी जिनपिंग के (17.09.2014 को अहमदाबाद में) भारत दौरे के समय झूला झूलने से लेकर ‘‘मोदी व जिनपिंग की केमिस्ट्री‘’ की जो चर्चा हुई, क्या वह इतिहास को ही पुनः दोहराने वाली स्थिति नहीं है? 1962 में भी इसी प्रकार नेहरू और ‘चाऊएनलाई’ के समय ‘‘हिंदू चीनी भाई भाई’’ की भावना को इसी प्रकार पीठ के पीछे से खंजर मार कर तार-तार कर दिया गया था। उस इतिहास को हम कैसे भूल सकते है? इन छह सालों में हमारे प्रधानमंत्री पांच बार चीन हो आए और मौके बेमौके शी जिनपिंग से अठारह बार मिलें हैं। धोखेबाज चीन ने मोदी जिनपिंग की चर्चित केमिस्ट्री की आड़ में पुनः विश्वासघात किया है। विश्वासघात की इन दोनों घटनाओं में एक मूल अंतर है। नेहरू के समक्ष उस समय चीन के धोखे का कोई पूर्व उदाहरण नहीं था। वह 1954 में सहअस्त्वि के लिए बने पंचशील के सिंद्धातों से आत्ममुग्ध थे और उनके पास सर्तक होने का कोई अवसर ही नहीं था। लेकिन उसके बाद भी चीन के विश्वासघात (धोखे) के बड़े उदाहरण 1967, 75 के खुनी सैनिक संघर्ष तथा 2017 डोकलाम की घटना सबके सामने थी। वैसे चीन की अति विस्तारवादी नीति के तहत ही वर्ष 1963 काराकोरम पास, 2008 तीया पंगनक, 2008 चाबजी घाटी, 2009 डूम चेली, 2012 डेमजोक, 2013 राकी नूला आदि में कब्जा किया। बावजूद इस सबके आज (15-16 मई की रात्रि को) हम पुनः चीन से धोखा खा गये। यह विश्वासघात अब हमारे लिये भविष्य में अत्यन्त ही चिंता का विषय होना चाहिये। वैसे  सैनिकों के बलिदान की कीमत पर चीन हमसे लगातार विश्वासघात कर रहा हैं ।यदि  यह विश्वासघात  नेताओं के बलिदान  के कारण होता है  तब शायद  सैनिकों को  नेताओं से  यह पूछने की आवश्यकता नहीं होती  कि चीन हमारे साथ  लगातार धोखा क्यों कर रहा है (जैसा कि  नेता  सैनिकों के बलिदान पर प्रश्न पूछते हैं) क्योंकि तब नेता विश्वासघात का मौका ही नहीं देता| एक बात और चिंताजनक है कि चीन ने गलवान घाटी में घातक सैन्य साजो सामान का भारी जमावड़ा कर रखा है व गलवान नदी पर निर्माण कार्य भी किया है।  
गलवान घटना को सिर्फ सैनिक दृष्टि से देखना उचित नहीं होगा। वैश्रिक महाशक्ति बनने का दरवाजा आर्थिक सुद्रणता के रास्ते से होकर ही जाता हैं और इस दिशा में भारत के तेजी से बढ़ते कदम ओर वैश्विक राजनीति में भारत का बढ़ता प्रभुत्व चीन कैसे स्वीकार कर सकता है। गौर करने वाली बात यह है कि भारत के साथ पड़ोसी देशों के वर्तमान में चल रहे विवाद दो माह में ही प्रारंभ हुए है जो पश्चिम मंे पाकिस्तान द्वारा सीमा पर गोलीबारी की घटनाएं बढ़ गई। तो पूर्वोत्तर में नेपाल को उकसाकर नए सीमा विवाद के जन्म देने में भी चीन ने कसर नहीं छोड़ी और साथ ही लद्दाख में स्वयं सीमाओं पर अतिक्रमण कर तीन ओर से सीमा विवाद को अंजाम देने में जुट गया। दरअसल इसके पीछे भी चीन की सोची समझी रणनीति है कि विवादित देशों में अथवा युद्धरत देशों में निवेश करने से निवेशक दूरी बना लेते है ऐसे में नए निवेश के इस प्रारंभिक दौर में चीन इन विवादों को तुल देकर भारत की आर्थिक महाशक्ति बनने की राह में रोड़े अटकाने मंे जुट गया। एक और कारण है चाइनीज वायरस से दुनियाभर में मची तबाही से खराब हो रही चीन की छबि और फैलती नफरत के वातावरण की ओर से ध्यान बटाना। 
चीन के संदर्भ में अंतिम। साँप दुनिया का सबसे अविश्वसनीय प्राणी है। वह पलटवार करता हैं। जो सपेरा उसे दूध पिलाता है, उसे भी ड़स लेता है। सांप-सांप (ताइवान) को भी खा लेता है। सर्पिणी अपने बच्चों (पाकिस्तान) को भी नहीं छोड़ती। ‘‘अजदहा’’ यानी ड्रैगन इन्हीं सांपो का पुरखा हैं। चीन तो साँप के बाप का भी बाँप ड्रैगन है। पलटकर ड़सने का उसका अनवरत इतिहास रहा है। अतः हमें अब ‘‘गाल बजाने व गाल फुलाने’’ की नीति को बदलना ही होगा। 
इस समय देश में चीनी बाजारों के बहिष्कार की मुहीम भी जोरों पर है, जो जरूरी भी है। अर्थात चीन को अंतिम छोर तक निपटाने के लिये राष्ट्रीय भावना के साथ राष्ट्रीय आकांक्षा की भावना को भी चरणबद्ध तरीके से बढ़ाना ही होगा।

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