गुरुवार, 7 मई 2020

कोरोना वीरों का सेना द्वारा सम्मान ‘‘सही’’। लेकिन ‘‘समय’’ ‘‘तरीका’’ व ‘‘औचित्य’’ कितना सही?

दो दिन पूर्व देश की सेना के तीनों अंगों के प्रमुख सहित चीफ आफ डिफेंस स्टाफ जनरल बिपिन रावत ने एक संयुक्त पत्रकार वार्त्ता की। इसमें तीन मई को पूरे देश में सेना के तीनो अंगो के द्वारा कोरोना वीरों योद्धाओं के सम्मान किये जाने की घोषणा की गई। तदानुसार तीन मई को वायु और नौसेना की एयरक्राफ्ट द्वारा डिब्रुगढ़ से कच्छ व श्रीनगर (कश्मीर) से त्रिवेन्दम (केरल) तक, विमानांे की फ्लाई पास्ट कर, फूल बरसा कर, रोशनी कर, बैंड बजाकर उन्हें प्रणाम कर, शुक्रिया अदा कर, उनकी हौसलाजाही की। इस प्रकार इन कोरोना वीरों के इन विपरीत परिस्थितियों में दिये गये अभूतपूर्व योगदान को याद किया गया। ये कोरोना वीर स्वास्थ्य कर्मी, पुलिसकर्मी, मीडिया के लोग व डिलेवरी बाय है। ये लोग पूरे देश में अपनी जान की परवाह किये बिना हम नागरिकों को लगातार सुरक्षित रख कर जीवन प्रदान कर रहे हैं। उनका यह कृत्य व सर्मपण किसी भी रूप में कम नहीं हैं, खासकर, तुलनात्मक रूप से, उन युद्ध में लड़ने वाले सैनिकों या सीमा के सीमा प्रहरियों से, जो दुश्मन देश द्वारा आक्रमण या सीमा का उल्लंघन किए जाने पर सीमा की रक्षा करते-करते, हसतें-हसतें अपनी जान दे देते हैं। 
कुछ अर्थों में तो इन कोरोना वीरों का कार्य इन सैनिकों से भी ज्यादा है। वह इस अर्थ में, जहॉं सैनिक व सीमा प्रहरी, शत्रु सैनिकों का जीवन समाप्त करने के उद्देश्य से इस मानसिकता के साथ अपना फर्ज व दायित्व निभाते हैं कि, उनकी मृत्यु तो कभी भी संभव है। परिवार का प्रत्येक सदस्य भी इस मानसिकता के साथ घर के अपने उस सदस्य को उक्त ड्यूटी पर भेजता है, जाने देता है। जबकि ये कोरोना वीर, योद्धा खासकर स्वास्थ्यकर्मी गण तो कोरोना वायरस के आने के पूर्व तक सामान्यतया मानसिक तनाव के बिना दूसरों का जीवन बचाते हुए कार्य करते रहें, इसलिए उन्हें भगवान का रूप भी कहा जाता रहा है। लेकिन संक्रमित कोरोना के आने के बाद स्वास्थ कर्मियों के मन में प्रत्येक क्षण मृत्यु के भय के मानसिक तनाव के साथ जो जान की बाजी लगाकर भी अपना दायित्व निभा रहे हैं, वह निश्चित रूप से वंदनीय है, और इसके लिए उन्हें सैल्यूट किया जाना चाहिए। निश्चित रूप से ऐसे योद्धाओं को सम्मान व नमन कर उनका उत्साहवर्धन किए जाने पर कोई प्रश्न चिन्ह नहीं है। लेकिन एक प्रश्न अवश्य यह उत्पन्न होता है कि, क्या सेना के लिये, यही एक तरीका था, उनके सम्मान का?
सेना द्वारा जो आज प्रतीकात्मक सम्मान किया गया, उसका वह रूप सही है? बिना भावना में बहे उस पर विचार करने की आवश्यकता है। सम्मान का एक प्रतीकात्मक लेकिन दृढ़ भावना लिये हुये तरीका सेना के लोग पूरे देश में एक निश्चित समय निश्चित कर इन वीरों के सम्मान में जो जहाँ भी है, वहीं दो मिनिट खड़़े रहकर भी सम्मान व्यक्त कर सकते थे। एक तरीका प्रत्येक जिलो में कोतवाली व अस्पतालों में सैनिक जाकर राष्ट्रगान गाकर भी सम्मान व्यक्त कर सकते थे। अन्य और प्रतीकात्मक सकारात्मक तरीके पर भी विचार किया जा सकता था। इस प्रकार एक बड़े खर्चे से भी बचा जा सकता था और सम्मान भी हो जाता। आखिर सम्मान प्रतीकात्मक रूप से ही तो किया जाता है। 
प्रधानमंत्री की अपील पर देश के नागरिकों ने पूर्व में भी दो दो बार इन वीर योद्धाओं के हौसलाजाई के लिये उनके सम्मान के समर्थन में तालियां, थालियां बजाई व दिएँ जलाये। प्राथमिक रूप से देष की आंतरिक व्यवस्था में सेना द्वारा इस तरह के सम्मान किये जाने की आवष्यकता क्या है? इस पर पृथक से बहस हो सकती है। विशेषकर इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए जब उसी दिन ही जम्मू-कष्मीर के हंदवाडा में आंतकवादियों के साथ में हुई मुठभेड़ में हमारी सेना के एक मेजर एक कर्नल एक लांस नायक व एक नायक सहित एक पुलिस सब इंस्पेक्टर शहीद हो गए। सेना द्वारा जो फूल बरसाए जा रहे थे वे न केवल कोरोना शहीद वीरों के के प्रति श्रद्धांजलि है, बल्कि वह पुष्पवर्षा उन कोरोना योद्धा की हौसलाजाही के लिए भी बरसाए जा गयेे हैं। यह पुष्पवर्षा हौसलाजाही के कारण सुख की भी प्रतीक है, तो इस कोरोना संक्रमण काल में कर्त्तव्य निभाते हुये शहीदों के प्रति श्रद्धांजली भी मानक है। इसलिये उसी दिन सुबह ही जब सेना व पुलिस के पांच अफसर और जवान शहीद हो गए थेे तो सेना द्वारा ही दूसरी जगह पुष्प वर्षा कर सुख व हर्ष व्यक्त करना कहां तक उचित होगा, प्रश्न यह है? इसीलिए यदि इस कार्यक्रम को निरस्त नहीं भी किया जाता तो कम से कम  स्थगित तो अवश्य किया जाना चाहिए था।
संयुक्त रूप से सेना के सीडीएस प्रमुख द्वारा पत्रकार परिषद बुलाकर उक्त निर्णय की जानकारी देश की जनता को सीधे देना क्या उचित है? वैसे इसके पूर्व पत्रकार वार्ता सायं 6 बजे किये जाने की पूर्व घोषणा के तरीके व औचित्य पर भी गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। क्योंकि उक्त सायं 6 बजे होने वाले पत्रकार वार्ता की घोषणा से पूरे देश में सन्नाटा आंशका व भययुक्त कोतुहल श्रोताओं नागरिकों के मन में संचारित हुई। आखिर सेना प्रमुख को आज आंतरिक या बाह्नय सुरक्षा को गंभीर आंशका के न रहते हुये लगभग शांति की स्थिति में पत्रकार वार्ता बुलाने की आवश्यकता क्यों पड़ गई। यह भी एक अलग बहस का विषय हो सकता है। यह कार्य तो देश के रक्षा मंत्री या प्रधानमंत्री भी कर सकते थे और शायद उन्हें ही करना चाहिए था। देश की सेना को मीडिया के माध्यम से जनता से सीधे, कम से कम बात (युद्ध के संकटकाल को ही छोड़कर) शांतिकाल में ही करना चाहिए। प्रजातंत्र में चुनी हुई सरकार को ही देष की आंतरिक व बाह्य सुरक्षा मामलों सहित समस्त मामलों में जनता से सीधे बात करना चाहिए, ताकि लोकतंत्र मजबूत हो सके। अन्यथा यह एक प्रकार से सेना की देश के उन आंतरिक कार्यों में सीधे (क्षेत्राधिकार के बाहर) भागीदारी होगी। इसका निर्णय तो वास्तव में सरकार को लेना चाहिए। सेना को देश की सीमा की रक्षा व विदेशी आक्रमणकारी आक्रांतो के आक्रमण से देश की रक्षा करना तथा आंतरिक सुरक्षा में सरकार द्वारा बुलाए जाने पर उस स्थिति से निपटना के साथ ही प्राकृतिक आपदाओं के समय अपना सहयोग देने तक ही सेना को सीमित रखना चाहिए।
सेना कोरोना वीरों के सम्मान में की गई कार्यवाही देश के कुछ भागों से आई आलोचना पर जनरल बिपिन रावत की आई प्रतिक्रिया तो और भी दुर्भाग्य पूर्ण है व शालिनतापूर्ण नहीं है। उनका यह कथन था कि उत्साहवर्धन किया जाना आवश्यक था और कुछ पढे़ लिखे व्यक्तियों अनपढ़ होते है, और कुछ अनपढ़ पढे़ लिखे होते है। जनरल रावत आलोचना करते समय शायद यह भूल गये कि हौसला अफजाई की सबसे बड़ी आवश्यकता उसी दिन शहीद हुये कर्नल की वीरागना शेरनी पत्नी की भी जानी थी। वह साहसी विधवा ने आासुओं की एक बूंद गिराये बिना अपने निवास को ही कर्म भूमि और युद्ध भूमि मानकर अपने भावों व कृत्य से वीरागना होने का परिचय दिया। जनरल रावत ने एक टेलीफोन उक्त वीरागना को कर उनको दो शब्द सांत्वना के उन्हे नहीं कहें। यदि वे उनके दुख में व्यक्तिगत रूप से शामिल होते तो उनका यह कदम तत्समय ज्यादा उचित व सामयिक होता। 
अंत में एक बात और। वास्तव में आज यदि देश का प्रत्येक नागरिक अपने अधिकारों की चिंता किए बिना नागरिक कर्तव्यों को पूर्ण रूप से निभा दे तो, इस देश का प्रत्येक ऐसा नागरिक वीर योद्धा ही है, और तब शायद ऐसे सम्मानों की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। क्योंकि तब समस्त नागरिक एक ही श्रेणी में में हो जाएंगे और परस्पर एक दूसरों की ओर नजर कर परस्पर सम्मानित हो लेगंे। 

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