गुरुवार, 21 मई 2020

‘‘बस’’ की ‘‘राजनीति!’’ ‘‘लोकतंत्र’’ की ‘‘जिजीविषा’’ (जीवित रहने) का धोतक है।

 
पिछले 3 दिनों से उत्तर प्रदेश में 1000 बसों पर राजनीति चल रही है, लेकिन बस, सिर्फ ‘‘बस’’ नहीं चल पा रही है। कोरोना संकट काल में खाली पड़ी सड़कों पर जीवन को गति देने वाली सार्वजनिक परिवहन की एक मुख्य ईकाई ‘बस’ का चक्का जाम की स्थिति को देखना भी एक आत्म संतुष्टि हो सकती है। अथवा शायद सत्ता पक्ष के अहं की तुष्टि का जरिया तो नहीं है? भाजपा (सत्ता पक्ष) व कांग्रेस (विपक्ष) दोनों ‘बस’ एक दूसरे पर राजनीति करने व राजनीति चमकाने का आरोप लगा रहे हैं। लेकिन इस बीच एक तीसरा पक्ष विपक्ष (मायावती) जो इस नाटक में भागीदार ही नही है, वह दोनांे पक्ष पर गंदी राजनीति करने का आरोप लगा देती है। परन्तु तब ज्यादा आश्चर्य होता है, जब मीडिया दोनों पक्षों को राजनीति न करने की बिन मांगी सलाह भी दे देता है। कोरोना वायरस संकट काल में कई नागरिकों के मन में निराशा भरे भाव सवार हो जाने के कारण वे आत्महत्या के विचारों की ओर ढकेले जा रहे हैं। लेकिन मीडिया भी उक्त सुझाव देकर क्या आत्महत्या की ओर अग्रेसित  नहीं हो रहा है? अथवा मीडिया का यह सुझाव भी कहीं कोरोना के संकट काल की गंभीरता को तो प्रदर्शित नहीं कर रहा है? आइए इन गंभीर आरोपों प्रत्यारोपांे व मीडिया के गंभीर सुझाव की गंभीरता पर आगे विचार कर लें।
सबसे बड़ा प्रश्न आज हमारे सामने यह है कि क्या ‘‘राजनीति’’ मात्र आरोप प्रत्यारोप का ही माध्यम है? राजनीति करना पाप है? जिस लोकतंत्र की हम विश्व में दुहाई देते थकते नहीं हैं, हमारे इस वर्तमान लोकतंत्र की खुराक (भोजन) उसकी ताकत, उसका मेरुदंड क्या है? यह राजनीति ही इस वर्तमान लोकतंत्र की शक्ति, ताकत, भोजन, पहचान सब कुछ है। इसलिए मीडिया राजनीतिक दलों को इस ‘राजनीति’ को छोड़ने की सलाह देकर अनजाने में ही सही, कहीं लोकतंत्र को खत्म करने का रास्ता तो नहीं बता रहा है? और यदि हाँ तो लोकतंत्र के खत्म हो जाने से मीडिया कहां रहेगा? इसलिए मै यह कहता हूं कि मीडिया को राजनीतिक दलों को ऐसी आत्मघाती सलाह देने से बचना चाहिए था?
आइए अब यह देखें कि ‘‘बस’’ पर ‘‘राजनीति’’ किसने प्रारंभ की है? सर्वप्रथम कांग्रेस की राष्ट्रीय महामंत्री श्रीमती प्रियंका वाड्रा गांधी की तरफ से एक चिट्ठी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी को लिखी जाती है कि, वे 1000 बसें प्रवासी मजदूरों को उनके गृह नगर पहुंचाने के लिए देने को तैयार हैं, बताईयें कब और कहा भेजें। वैसे यह कार्य कोई सामाजिक कार्यकर्ता, उद्योगपति करता तो राजनीति नहीं होती व इतना जी का जंजाल नहीं बनता। हमारे देश के परिपक्व होते लोकतंत्र में यह मान लिया गया है कि कोई भी राजनेता बिना ‘‘राजनीति’’ के सेवा भावना से ओतप्रेत होकर सामाजिक सेवा या सेवा के कोई भी कार्य नहीं कर सकता है। राजनीति रूपी क्रिकेट के मैदान में बिना सिक्का उछाले टॉस किए बिना, प्रथम पारी खेलना स्वयं निश्चित कर ओपनिंग बैट्स वूमैन के रूप में प्रियंका गांधी उतरी। जब इस देश में ऐन केन प्रकारेन श्रेय लूटने की राजनीति का बोलबाला हो, तब भी प्रियंका गांधी आगे बढ़कर स्वयं अपनी ‘‘राजनीतिक’’ पहल के श्रेय लूटने का दावा क्यों नहीं कर रही है, यह भी एक ‘‘संतोष मिश्रित’’ आश्चर्य का विषय है। 
प्रवासी मजदूरों की समस्या केवल उत्तर प्रदेश में ही सीमित नहीं है। महाराष्ट्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़, पंजाब जैसे कांग्रेस शासित प्रदेशों में भी व्याप्त है। प्रियंका वाड्रा के भीतर अपनी पार्टी की सरकारों को प्रथम प्राथमिकता देते हुए उनके प्रति यह सेवा भाव की भावना क्यों जागृत नहीं हुई? यही से तो राजनीति प्रारम्भ होती है। शायद उनका यह दावा हो कि राजस्थान, पंजाब और छत्तीसगढ़  में प्रवासी मजदूरो की यह समस्या नहीं है। महाराष्ट्र की समस्या के लिए शायद प्रियंका इसलिए भी आगे नहीं बढ़ी है क्योंकि वह ‘मिश्रित’ सरकार है तथा प्रियंका वाड्रा ‘मिलावट’ में नही शुद्धता में विश्वास करती है। अथवा यह मान लिया जाए कि उनका अपनी सरकारों के तथाकथित अकर्मण्यता के चलते उनसे मोह भंग हो गया है। 1000 बसे राजस्थान दिल्ली से आने की बात कांग्रेस ने कहीं है। सर्वप्रथम तो उक्त बसें राजस्थान और दिल्ली में ही क्यों नहीं लगाई गई? उन प्रदेशों की सरकारों को क्यों नहीं चिट्ठी लिखी गई? राजनीति का क्रम यहॉ से आगे बढते जा रहा है। लेकिन प्रियंका वाड्रा राजनीति करते-करते यह भूल गई या उनसे चूक हो गई कि जिस पक्ष के साथ वह क्रिकेट की राजनीति जैसा खेल खेल रही हैं, अपनी बैटिंग की पारी आने पर वह भी चौके छक्के लगाने में निपुण व तत्पर है। प्रियंका का विरोधी पक्ष अर्थात वर्तमान  का सत्ताधारी पक्ष तोे पक्ष विपक्ष दोनों की ही राजनीति में पारंगत है, क्योकिं वह सफलतापूर्वक विपक्ष की राजनीति करते हुये ही सत्ता में पंहुचा है। अतः वह राजनीति करने में प्रियंका से कहीं ज्यादा सक्षम व बलवान है। अपनी पारी शुरू करते ही उसने यह दर्शा भी दिया है।
ओपनर बैट्समैन के रूप में उतरे योगी ने  सामने के छोर पर खड़े बैट्समैन के द्वारा प्रस्तावित इन 1000 बसों की सूची मांग कर चौका जड़ दिया। फिर इस सूची का सत्यापन कराकर उसमें कुछ टैक्सी, ऑटो, ई रिक्शा, टाटा मैजिक, एंबुलेंस, गुडस वाहन इत्यादि शामिल बताकर पुनः दूसरा चौका जड़ दिया। प्रियंका वाड्रा ने मानवीय भूल,टाइपिंग त्रुटि जताकर अपने बॉलर से स्पिन गेंद फिकवा कर बैट्समैन को आउट कर दिया। लेकिन योगी कहां यही रुकने वाले थे। उन्होंने बसों की फिटनेस, इंश्योरेंस, रजिस्ट्रेशन, ड्राइविंग लाइसेंस इत्यादि दस्तावेजों की मांग कर छक्का ही मार दिया। लंच ब्रेक हो जाने के कारण अभी खेल रुका हुआ है।
कोरोना के संकट  काल का यही तो रोना है। यह राजनीति नहीं है, भाई साहब! सवाल सैकड़ों मजदूरों की जिंदगी का प्रश्न है।उनकी जान (जीवन) इन बसांे के द्वारा घर पहुंचने पर नहीं अटकी हुई है जनाब, बल्कि इन कागजी घोड़ो में अटकी हुई है। यदि खुदा न खास्ता कोई  दुर्घटना हो जाए तो आप लोग ही सबसे पहले हमारे कान उमेठने आ जाएंगे। राजनैतिक रेला, मेला रेला जैसे उत्सव के समय लगने वाली बसों  के संबंध में परमिट से लेकर मोटर यान अधिनियम के कितने प्रावधानों का पालन आरटीओ कितना करवाते है? लेकिन आज तो कोरोना का संकट काल है। यही तो राजनीति है, महोदय। हम राजनीति नहीं कर रहे हैं? हमनें मानवीय दृष्टिकोण अपनाया हुआ है। यदि हम भी राजनीति में उलझे होतेे तो हम प्रियंका वाड्रा से इन बसों के संबंध में प्राथमिक उपचार पेटी (फर्स्ट ऐड बॉक्स) की मांग सहित मोटर वाहन अधिनियम के समस्त प्रावधानों का शत-प्रतिशत पालन करवाते। हमारी सदाशयता पर शंका मत कीजिए? हम मजदूरों के प्रति निश्चित रूप से संवेदनशील हैं? और यह संवेदनशीलता प्राथमिक उपचार की पेटी की पूर्ति की मांग न करके दिखाई है। क्योंकि जो मजदूर गरीबी और भूख के कारण मृत्यु और आत्महत्या की दशा में खड़ा है, उसको यह प्राथमिक उपचार पेटी क्या सहायता दे पायेगी?
बसों के कागजों के सत्यापन के बाद 879 बसों के कागज ही सही पाए गए। यद्यपि अभी उपमुख्यमन्त्री दिनेश शर्मा ने (79़140़78) 297 कबाड़ी बसों, ड्राइवरांे के खानंे का कोई प्रबन्ध न होना आदि कर्मियों .का उल्लेख कर रहे है। लेकिन शेष रही बसों के लिये वे अभी भी कुछ भी नही कह रहे हैं। अब सरकारी वाहनों (राजस्थान सरकार) व निजी वाहनों का मुददा उठाया जा रहा है। ध्यान कीजीये! मन्दिर में दान का शुद्विकरण (फिल्टर) दान पेटी में नहीं होता है। समस्त प्रकार के स्त्रोत से उपार्जित धन में आता है। टैक्स चुकाया हुआ या कर चोरी का, लूट का, आंतकवाद के पैसे का दान। तब उत्तर प्रदेश की सरकार के जो मिला, जैसा मिला को स्वीकार करते हुये उसका उपयोग श्रमिको के हित में कर शेष समस्त कमियों को जनता के बीच उजागर कर दें। समस्या कहाँ है? लेकिन है। कुप्रबंध व अधूरे कागजातों के चलते मजदूरों की सुरक्षा का प्रश्न उठाते समय माल वाहन में जा रहे श्रमिकों व पैदल भूखे व बिना हयूमेन डिस्टेटिंग के चल रहे श्रमिक पर ध्यान उन प्रश्न कत्ताओं का नहीं गया? तब दोषी व्यक्तियों के विरूद्ध एक भी कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की गई। 
लेकिन बात जब राजनीति के ‘‘क्रिकेट’’ की हो तो,उसका मजा चौके छक्के के बिना नहीं आता है। योगी जी नहीं चाहते हैं कि वे इक्के दुक्के द्वारा रन बटोरें। वे चौका छक्का ही मारना चाहते हैं, इसलिए 879 या लगभग पांच सौ सही बसो का आंकड़ा, 1000 का जब हो जाएगा, तभी बस चलवा कर छक्का मारेंगें। यह ‘‘राजनीति’’ नहीं है महोदय। यह तो (राजनीतिक) खेल है। आज की राजनीति में तो मात्र दुश्मनी ही होती है। ’खेल’ कहां होता है। खेल तो खिलाड़ी से लेकर दशकों तक को आनंद ही आनंद देता है। लेकिन हां! कभी-कभार खेल-खेल में भी राजनीति हो जाती है। ‘‘खेल’’ में ‘‘राजनीति’’ का उदाहरण हमारे सामने भारत-पाकिस्तान के बीच क्रिकेट खेल का है। तो क्या उसका एक छोटा सा प्रतिबिंब उत्तर प्रदेश की बस तमाशा बिन ‘बस’ राजनीति भर नहीं है?मैं नहीं जानता। वर्त्तमान राजनीति की असीमित सीमा की एक बानगी और देखिये! प्रथम सूचनापत्र दर्ज करने में भी राजनीति प्रियंका वाड्रा के विरूद्ध एफ.आई.आर. न कर उनके निज सचिव के विरूद्ध की गई। क्या उत्तर प्रदेश सरकार निज सचिव को रिसपांड कर रही थी, या प्रियंका वाड्रा को जिम्मेदार मान रही ? 
अंत में एक बात और। अभी-अभी कांग्रेस के बस के वापस जाने के निर्देश के बाद अभी स्थगित हुये खेल में प्रियंका राजनीति करते हुए जनसेवा करने का आभास (वास्तविकता कितनी?) दिला रही है। जबकि योगी जी राजनीति करते हुए नकारात्मक दिखाई दे रहे हैं। कायदे से आपको सिर्फ ‘‘आम खाने से मतलब होना चाहिए था, गुठली गिनने से नहीं।’’ वैसे भी आप किसी व्यक्ति की आस्था को ‘‘वैष्णों देवी’’ से बदल कर ‘‘तिरूपति बालाजी’’ में करने के लिये विवष नहीं कर सकते हैं। उसी सिद्धांत के द्वारा इन बसों को उत्तर प्रदेश या अन्य कांग्रेसी शासित प्रदेशों में भेजने का कथन किया गया हैं वैसे यह देखने की बात होगी कि प्रियंका वाड्रा की ये वापिस जाती बसे रास्ते में मिलने वाले मजदूरों को बैठायेगी अथवा नहीं। ‘‘खेल’’ तो अभी सिर्फ स्थगित हुआ है, राजनीति इस खेल को समाप्त नहीं होने देगी।

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