मंगलवार, 5 मई 2020

"कोटा के छात्रों को अपने-अपने प्रदेशों में लाने का निर्णय क्या आत्मघाती तो सिद्ध नहीं हो रहा हैं?"


लगभग पूरा विश्व कोविड-19 कोरोना से पीडित होकर प्रताड़ित हैं। कोरोना के संक्रमण को रोकने के लिये केन्द्रीय सरकार से लेकर राज्य सरकारें दिन प्रतिदिन बदलती परिस्थितियों को देखते हुए न केवल आवश्यक कदम उठा रही हैं, बल्कि  समय-समय पर जारी आदेशों में आवश्यक संशोधन भी कर रही हैं। लेकिन सबसे बड़ी समस्या जो शायद प्रांरभ से ही महसूस की जा रही है, वह यह है,कि सरकार या प्रशासन के स्तर पर जो भी आदेश निर्देश जारी किए जा रहें हैं, वे सिर्फं सामने दिख रही सिर्फ समस्यों को ध्यान में रखकर ही समाधान हेतू जारी किए जा रहे हैं,। लेकिन उन आदेशों से उत्पन्न हो सकने वाले प्रभाव,दुष्प्रभाव (साइड इफेक्टस) तथा बाय प्रोडक्टस पर विचार नहीं किया जा रहा है जिस कारण से पूर्ण समाधान कारक न होकर न केवल उन उद्श्यों की पूर्ण प्राप्ति नही हो पा रही है, बल्कि नई नई समस्याएं भी पैदा हो रही हैं। यही स्थिति छात्रों के वापसी के मुद्दे को लेकर हुई हैं।

लाक डाउन के पूर्व, भारत सरकार ने विदेशों में रह रहे बहुत से भारतीयों को विशिष्ट हवाई उड़ानों के द्वारा अपने देश में वापस लाया था। इस कारण कुछ समय पश्चात मजदूरों के हितो के लिए भी ऐसे ही कार्यवाही किये जाने के लिए एक दबी सी आवाज  उठी थी। लेकिन तब वह आवाज ध्यान आकर्षित नहीं कर पाई थी। जब कोटा के विद्यार्थियों को सर्वप्रथम उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री घोषित राष्ट्रीय लाक डाउन की नीति के विरूद्व बस भेजकर अपने प्रदेश में वापस लाऐ और तत्पश्चात मध्य प्रदेश की सरकार ने भी ऐस ही किया। तब प्रवासी मजदूरों की ओर से देश के अधिकांश भागों में यह मांग तेजी से उठने लगी कि उन्हें भी कोटा के छात्रों के समान अपने-अपने प्रदेशों में भेजे जाने की अनुमति दी जाकर व्यवस्था की जावे। इस मांग को इस कारण से भी और बल मिला कि उनके रूकने, खाने पीने की व्यवस्था ठीक से नहीं हो पाई व समय व्यतीत होते होते चरमरासी गई। इसके अतिरिक्त वर्तमान स्थितियों के कारण उत्पन्न आशंकाओं के बादल के चलते घर के बाहर लंबे समय से रहने के कारण मानसिक दबाव व मानसिक तनाव से उत्पन्न हतोउत्साह के कारण प्रवासी मजदूरों की वापसी की मांग पिछले 3दिनों में इतनी तेजी से उभरी कि सरकार को उनकी मांग मान कर कुछ सावधानियों व शर्तो के साथ लाक डाउन में ढील देनी पड़ी। यहाॅं पर उक्त समस्या सुलझी अथवा नहीं यह तो अगले कुछ दिन में पता लगेगा। लेकिन इसने एक नई समस्या को अवष्य जन्म दे दिया, जिस पर भी गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता हैं।
एक अनुमान के अनुसार देश में लगभग 9 करोड़ प्रवासी मजदूर हैं, जिनमें से  कुछ लागोें को छोड़ भी दिया जाए तो भी, करोड़ों की संख्या में इन प्रवासी मजदूरों का विस्थापन किया जाना है। यह वास्तविकता के धरातल पर उतर पाएगा, ऐसा संभव लगता नहीं हैं। एक तो सरकार ने सिर्फ बसो के माध्यम से उन्हें ले जाने की शर्त जो लगाई, यदि उसकी अक्षरतः पालन भी किया जाता तो महीनों इस व्यवस्था पालर्नाथ लग जाते। लेकिन सरकार को शीघ्र ही सुध आगई व दुसरे ही दिन लेख लिखते लिखते सरकार ने अपने उक्त आदेश में संशोंधन कर श्रमिक रेल प्रारंभ कर दी, जिसके लिए उन्हें धन्यवाद। लेकिन सरकार के इस संशोधित आदेश के बावजूद यह मतलब कदापि नहीं निकलेगा की सरकार औद्योगिक गतिविधियों को सामान्य लाने में फिलहाल व निकट भविष्य में इच्छुक नहीं है, इसके विपरीत भी यदि सरकार की औद्योगिक क्रिया कलाप प्रारंभ करने की की इच्छा भी हो, तब भी इन प्रवासी मजदूरों के वापस अपने अपने गांव में प्रदेशों में जाने से औद्योगिक क्रियाएं, उत्पादन प्रक्रिया कैसे प्रारंभ हो पाईगी, यह एक बहुत ही बड़ा प्रश्न है। इस पर शायद सरकार ने गंभीरता से विचार नहीं किया है। इसलिए सरकार को प्रवासी मजदूरों के आवागमन में ढील देने के बावजूद उनको रोकने के लिए निम्न आवश्यक कदम उठाया चाहिए।
प्रथम उनके खाने-पीने व रहने की व्यवस्था में तुरंत सुधार किया जा कर उन्हें उनके कैंपों में इस बात की समझाईश दी जावे कि शीघ्र ही औद्योगिक उत्पादन व निर्माण प्रक्रिया प्रांरभ हो रही हैं, जिस कारण से आपका रोजगार (एंप्लाॅयमेंट) जारी रहेगा ताकि आप अपने घर को भी सहायता भेज पाएगें। इसलिए आप सामुहिक रूप से अपने प्रदेशो में वापिस जाने को टालें।। यह भी बताया जाए कि आपके अपने प्रदेशों में रोजगार न होने के कारण आप दूसरे प्रदेशों में रोजगार के अवसर तलाशते हुए आए थे, आज भी आपके प्रदेश में रोजगार के उतने प्रर्याप्त अवसर उपलब्ध नहीं हो पांएगे जिससे आपको रोजगार मिल पाए। इसलिए भी आपका रूकना आप के हित में ही हैं। मजदूरों के मन में उत्तर विश्वास दिलाने के लिए सरकार को तुरंत निर्माण व उत्पादन की गतिविधिया प्रांरभ कर दे देना चाहिए ताकि, उनके डगमगाते विश्वास को विराम लगा कर कुछ हद तक उनका पलायन रोका जा सके। तभी हम देश की आर्थिक स्थिति को गिरने से कुछ संभाल पाएगें अन्यथा जैसा कि मैं बार-बार पूर्व में भी लिखता रहा हॅू व प्रसिद्व आर्थिक विशेषज्ञ नारायण मूर्ति (इन्फोसिस के पूर्व चेयरमेन) ने भी अभी कहा है कि आर्थिक व्यवस्था से उत्पन्न हालात इस रोग की तुलना में ज्यादा मृत्यु के कारक बनेंगे । तब आपके दोनो उद्वेश्य जान व जहान बचाने में असफल हो जावेगें ।

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