बुधवार, 9 सितंबर 2020

इलेक्ट्रानिक मीडिया में ‘‘बहसों’’ पर ‘‘प्रतिबंध’’ क्यों नहीं लगा देना चाहिए?


हाल में ही टीवी चैनल ’’आज तक’’ की ’’दंगल’’ बहस (डिबेट) पर कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव त्यागी की अचानक तबीयत बिगड़ने (हृदय घात) से उन्हें तुंरत आनन-फानन में अस्पताल ले जाया गया, जहां उनकी दुखद मुत्यु हो गई। इसके बाद आए ’’हृदयाघात’’ से हुई मृत्यु  के पश्चात मृतक की पत्नी ने साबित पात्रा को ’हत्यारा’ कहते हुए यह कहा कि पति  के आखिरी शब्द थे ‘‘इन लोगों ने मुझे मार डाला‘‘।

‘‘आज तक‘‘ टीवी समाचार चैनल मैं बेंगलुरु हिंसा पर जो बहस चल रही थी, उसमें शामिल एंकर रोहित सरदाना के प्रश्न व प्रतिउत्तर व कांग्रेस प्रवक्ता राजीव त्यागी व भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा के उत्तर और फिर प्रतिउत्तर, तीखी बहस,  तू तू मैं मैं, के साथ जो हुई निश्चित रूप से स्तरहीन थी। संबित पात्रा यह कहते हुए नजर आ रहे हैं ’’हमारे घर के जयचदो ने हमारे घर को लूटा है। अरे नाम लेने में शर्म कर रहे हो, वह घर  जला रहे हैं और यहां पर जयचंद नाम तक नहीं ले पा रहे हैं‘‘। एक ’’’टीका’ लगाने से कोई असली ’हिंदू’ नहीं हो जाता।’’ टीका लगाना है तो दिल में टीका लगाओं । त्यागी जी बीच-बीच में कहते रहे कि मै जवाब देना चाहता हूॅ, लेकिन अपेक्षा दरगुराज कर दी गई। खासकर के संबित पात्रा का राजीव त्यागी को बार-बार ‘जयचंद’ संबोधित करते हुये बोलने ने निश्चित रूप से ’’बहस’’ के स्तर को न सिर्फ गिराया हैं, बल्कि वे स्वयं भी स्तर की सीमा से बाहर हो जाते है। इस देश में ‘‘जयचंद‘‘ बोलना इतना आसान हो गया है? क्या राजीव त्यागी वास्तव में ‘‘जयचंद‘‘ थे? यदि उक्त जानकारी संबित पात्रा को थी, जैसा कि उन्होंने कहा, तो फिर वे उनके साथ डिबेट में बैठे ही क्यों ? उनके खिलाफ पुलिस में कार्रवाई क्यों नहीं करवाई गई ? अथवा वर्तमान में क्या जयचंदो की परिभाषा बदल गई है? 

यह पहली बार नहीं हैं, जब इस तरह की डिबेट आये दिन विभिन्न टीवी चैनलों में चल रही होती है। बल्कि प्रायः सभी टीवी चैनलों में टीवी डिबेट कहीं ’दंगल’, ‘हल्ला बोल’, ‘मुझे जवाब चाहिये’, ‘पूछता है भारत’, ’पांच का पंच’, ‘ताल ठोक के’, ’आर पार’ ‘राष्ट्र की बात’, ‘मुद्दा गरम हैं’, ‘सबसे बड़ा सवाल’ इत्यादि नामों से प्राईम टाईम पर लाईव प्रसारित की जाती हैं। सिवाए, एनडीटीवी को छोड़कर जिसनें कुछ सालों से इस तरह की बहसों को अवश्य बंद कर दिया है। इन सब बहसों में विषय शब्दों, वाक्यों, ईशारों, भाव भंगिमा इत्यादि सभी को सम्मिलित कर प्रायः स्तरहीन बहसे होती है, जो प्रायः उपरोक्त दिये गये ’’नामों’’ को सार्थक सिद्ध करती है। इसलिये आज के समय की आवश्यकता है कि यदि हम समय रहते इन बहसों में खासकर राजनैतिक व धार्मिक विषयों व ‘‘हिन्दू-मुस्लिम‘‘ को लेकर होने वाली बहसों पर प्रतिबंध लगा देना चाहिये। यदि अभी भी हम नहीं चेते तो, हम उस खराब स्थिति में पहुंच सकते है, जहां से फिर वापिस लौटना मुश्किल होगा। 

यदि आप इन डिबेटों के विषय मजमून और एंकर के साथ उनमें भाग लेने वाले वक्ताओं, प्रवक्ताओं, विशेषज्ञांें को देखेगें और बहस में चल रही प्रश्नोत्तरी पर आप जरा सा भी ध्यान देगें, तो आपको बहुत ही स्पष्ट रूप से यह दिखेगा कि ये डिबेट मात्र देश की एकता, अखंडता, धर्मनिपेक्षता, सांप्रदायिक सदभाव, शांति, सुरक्षा इत्यादि सभी को तोड़ने वाली होती है। इनमें किस तरह के ‘‘लोगों’’ को ‘बहस’ में बैठाता जाता है, उन्हे ध्यान से जरूर से देखिए। अक्सर कोई न कोई अलगावादी, कश्मीर विरोधी, घृणित अपराध में लिप्त अपराधी, भ्रष्टचारी, आर्थिक अपराधी व देशद्रोही, साम्प्रदायिक व्यक्ति कई बार के धोर भारत विरोधी जहर उगलने वाले पाकिस्तानी प्रवक्तागण। ऐसे लोगों को मीडिया अपना सर्वाधिक प्रसारित होने वाला मंच जैसा कि वे दावा करते है, देकर इन जहरीले बातें व विषय को  आम जनता के दिमाग में ठूस ठूस कर भरकर बौद्धिक रूप से उन्हें प्रायः विक्षिप्त कर देश के प्रति उनकी आस्था प्रेम व विश्वास को धक्का नुकसान पहुंचाते रहते है। लेकिन आश्चर्यजनक रूप यह विपरित तथ्य उजागर यह होता है कि, समस्त टीवी एंकर उक्त सब उल्लेखित मुद्दों को देश व समाज हित पक्ष में बताकर, लेकर ही उठाते है व बहस करवाते है, ऐसे चैनल हमेशा दावा करते है। लेकिन कभी भी उनके परिणाम सुखद न होकर हमेशा ही दुष्परिणाम आते है। इसका एक बड़ा कारण यह होता है कि वे ’सार्थक’ बहस करवाते कब हैं? बहसों में भाषा की मर्यादा का उल्लंघन करना तो मानो लोकप्रियता का पैमाना हो गया है। बात केवल भाषा की मर्यादा तक सीमित नहीं रह गयी है। एक प्रसिद्ध न्यूज चैनल के लाइव डिबेट शो में तो हद ही हो गयी, जबकि सभ्यता की सारी मर्यादाओं को ताक पर रख कर एक मौलाना ने बहस के दौरान एक महिला वक्ता को थप्पड़ ही जड़ दिये थें। 

प्रश्नों के उत्तर जब परस्पर विरोधी पक्ष देते है, तो वे अपनी सर्वोच्च्ता स्थापित करने के लिए कुछ ऐसी बातें जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे कह जाते है, जिनका संबंध विषय वस्तु से दूर दूर तक नहीं होता है। उक्त समस्त पक्षों के बीच मौजूद गहरी खाई को कम करने के बजाय वह खाई को बढ़ाने का कार्य ही करती है। अर्थात समाज में विभाजन का कार्य ही करती हैं। जबकि बहस का उद्देश्य सार्थक परिणाम निकालकर समस्त पक्षों को उसके निकट ले जाने का प्रयास होना चाहिए। बहुत कम अवसर ऐसे आते हैं  जब एंकर इस तरह की गैर जायज बातों को रोकते है या उस मुद्दे पर गलत बयानी कहने वाले व्यक्तियों को डिबेट से बाहर कर देते है या उनका माईक बंद कर देते है। न्यूज चैनलो पर चीख-चिल्लाहट भरी एंकरिंग ने संवाद और शास्त्रार्थ की सारी परम्पराओ को ताक पर रख दिया है। राष्ट्रवाद धर्म और सांप्रदायिकता के नाम पर टीवी चैनलो के स्टुडियो में एक किस्म का एंकर जेहाद जारी है। चौकाने वाली बात तो यह है कि एंकर सरकार से सवाल पूछने के बजाय विपक्ष से जवाबदेही करने लगें हैं और सरकार की ओर से वे खुद जवाब देते हैं।

एक और चीज आपके लिए ध्यान में अवश्य आयी होगी। लगभग समस्त डिबेटों में भागीदार लोगो की उन विषयों पर स्वयं की अपनी कुछ न कुछ कमिया अवश्य होती है। जिसका उत्तर उनके पास सामान्यतया नहीं भी होता हैं। चूंकि दर्शक उसे लाईव देखतें है, तब अपने को निरूत्तर दिखने से रोकने के लिये ही, अपने विपक्षियों की उन विषयों पर उनके पूर्व के इतिहास की गलतियों को सामने लाकर उसे अपना ‘गुण‘ बताकर स्वयं की ’असफल’ रक्षा करते है। इस प्रयास में कई बार इस तरह की अनर्गल बातें ‘जाने अनजाने’ में चाहे-अनचाहे वे कह जाते है, जो देश व समाज हितों के विपरीत व नुकसान दायक होता है। हॉलाकि शायद कई बार कहने वाला वक्ता का वह आशय नहीं भी होता है। लेकिन एंकर ऐसे शब्दों को लपक कर टीआरपी के चक्कर में उनकी हैंड लाईन चलाकर ब्रेकिंग न्यूज बना देते हैं। इसीलिए अब यह आवश्यक हो गया है कि देश हित में समस्त टीवी चैनल्स ‘एनडीटीवी‘ द्वारा अपनाये गये रूख को अपनाकर स्तरहीन अंतहीन डिबेट से बचें। क्योंकि वैसे भी ‘‘टेलीविजन रेटिंग प्वाइंट‘‘ (टीआरपी) के चक्कर में मीडिया ‘येलो जर्नलिज्म‘, ‘पेड न्यूज‘, ‘फेक न्यूज‘, व ‘मीडिया ट्रायल‘ की विकृतियों से ग्रस्त  होकर अपनी मूल कृति व कृत्य से दूर हो चुका है।

 धन्यवाद।

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