गुरुवार, 10 सितंबर 2020

‘‘केशवानंद भारती‘’’ ने ‘भारतीय‘ संविधान को ऐतिहासिक रूप से ‘‘पुर्नपरिभाषित’’किया।


एक आम सामान्य भारती (भारतीय) के लिए ‘‘केशवानंद भारती‘‘ ‘‘भारतीय नागरिक‘‘ होने के बावजूद एक अनजान सा नाम है। परंतु निश्चित रूप से विधिक क्षेत्रों में ‘‘स्वतंत्रता के अधिकारों’’ व ‘‘मानवाधिकारों’’ की लड़ाई लड़ने वाले प्रहरी कार्यकर्ताओं, ‘‘सक्रियतावादी’’ (एक्टिविस्ट) आदि लोगों के बीच जरूर ‘‘केशवानंद भारती‘‘ का नाम वर्ष 1973 के बाद से कभी न कभी किसी न किसी रूप में जरूर आया होगा। क्योंकि ऐसे लोग जब उन अधिकारों की लड़ाई व रक्षा के लिए उच्चतम न्यायालय जाते हैं, तब कहीं न कहीं अपने उक्त अधिकारों की लड़ाई के समर्थन में ‘‘केशवानन्द भारती‘‘ प्रकरण का हवाला जरूर देते है। वह इसलिए, क्योंकि वस्तुतः उनकी लड़ाई उन अधिकारों को समाप्त करने वाले उन कानूनों से होती है, जो यद्यपि विधायिका ने पारित तो किए होते हैं, लेकिन वे कानून उनके अधिकारों का ‘संरक्षण’ करने की बजाय ‘क्षरण’ ही ज्यादा करते है। इसलिए वे ‘‘केशवानंद भारती‘‘ मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गए निर्णय द्वारा ‘‘प्रतिपादित सिद्धांत’’(रूलिंग) "मूल ढांचा" का हवाला देकर उन कानूनों को संविधान के विरूद्ध बता कर अपने मुद्दे की लड़ाई को बल और मजबूती प्रदान करते हैं।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बात देश में 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू हुआ। इस नए संविधान के द्वारा देश में लोकतांत्रिक, अप्रत्यक्ष चुनावी व्यवस्था (प्रधानमंत्री के लिए) लागू करने के बावजूद, एक नागरिक की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकार तभी तक विद्यमान रह सकते हैं, जब तक संविधान उन अधिकारों की रक्षा की गारंटी देता है। केशवानंद भारती उच्चतम न्यायालय का वह प्रथम लीडिंग केस है, जो संविधान की रक्षा करने के साथ-साथ आपके संविधान प्रदत समस्त अधिकारों की रक्षा भी करता है। अभी तक जितने भी संविधान संशोधन हुये है, (लगभग 104) उनमें से वे संविधान संशोधन कानून जिनकें द्वारा संविधान के मूल तत्व (बुनियादी संरचना) पर जब कभी हथोड़ा चलाया गया है, तभी सर्वोच्च न्यायालय में उसकी सर्वोच्च व्याख्या (टेस्टिंग/बैरोमीटर) का लीडिंग (प्रमुख) केस केशवांनद भारती द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत ही होता है। इस कारण विधिक क्षेत्रों में कार्य करने वाले लोगों के दिमाग में उक्त केशवानंद भारती प्रकरण बैठ सा गया हैं।
आखिर केशवानंद भारती प्रकरण है क्या? इस को आगे थोड़ा समझते हैं। केरल के उत्तरी जिले कासरगोड इडलीनीर मठ के प्रमुख ‘‘केशवानन्द भारती‘‘ केरल सरकार के भूमि सुधार कानूनों को चुनौती देते हुए अंततः सुप्रीम कोर्ट तक गए थे। जहां पर उन्होंने 24, 25, 26 व 29 वें संविधान संशोधन कानून को चुनौती दी थी। 24 वें संविधान संशोधन कानून के द्वारा गोलकनाथ प्रकरण में प्रतिपादित  ऐतिहासिक सिद्धांत कि मूल अधिकारों में कमी संविधान संशोधन द्वारा नहीं की जा सकती है, को निष्प्रभावी कर दिया गया। 29 वें संविधान संशोधन कानून को इसलिए चुनौती दी गई थी, क्योंकि उसके द्वारा संविधान की "नौवीं" अनुसूची में केरल भूमि सुधार अधिनियम 1953 को शामिल करने के कारण उक्त कानून जिसके विरूद्ध मठ की जायदाद के लिए केशवानंद भारती मुकदमा लड़ रहें थे, को न्यायालय में कानूनन चुनौती नहीं दी जा सकती थी। उक्त मामलें की 68 दिनों तक सुनवाई चली थी। उनके वकील ‘‘नानी पालखीवाला"थे, व सहायक वकील फली.एस.नरीमन एवं सोली सोरबजी थे। पालखीवाला से उनके मुवक्किल केशवानंद भारती, मुकदमे के दौरान फैसला आने तक नहीं मिले थे। 
24 अप्रैल 1973 को मुख्य न्यायाधीश एस. एम. सिकरी की अध्यक्षता वाली 13 जजों की बेंच ने ( 1 के 7-6) बहुमत से ऐतिहासिक फैसला सुनाया था कि ‘‘संविधान में संसद सर्वोच्च’’ नहीं है। यद्यपि ‘‘संसद की शक्ति संविधान संशोधन करने की तो है, लेकिन संविधान की प्रस्तावना के मूल ढांचे (बेसिक स्ट्रक्चर) को कोई भी संविधान संशोधन द्वारा नहीं बदला जा सकता हैं।‘‘ तदनुसार उच्चतम न्यायालय ने उक्त संविधान संशोधन के कुछ भाग को शून्य घोषित कर दिया।  इस प्रकार पहली बार ‘‘संविधान’’ के माध्यम से ‘‘न्यायपालिका’’ ने स्वयं को विधायिका के ऊपर वैधानिक रूप से स्थापित कर दिया, जो स्थिति आज तक चल रही है। जिसका फायदा यह हुआ है कि विधायिका व तदनुसार कार्यपालिका भी अपने उच्चतम न्यायालय द्वारा रेखांकित"क्षेत्राधिकार" से बाहर जाने की हिम्मत नहीं कर पाती है। 
केशवानंद भारती के इस ऐतिहासिक निर्णय  में उच्चतम न्यायालय ने ‘‘न्यायिक समीक्षा‘‘ ‘‘पंथनिरपेक्षता‘‘ ‘‘स्वतंत्र चुनाव व्यवस्था‘‘ और ‘‘लोकतंत्र‘‘ को संविधान का मूल ढांचा बताया है। "संविधान की प्रस्तावना इसकी आत्मा है"। ‘‘बुनियादी संरचना‘‘ "लक्ष्मण रेखा" है, जिसे संविधान संशोधन द्वारा संशोधित नहीं किया जा सकता है। चुकि हमारे संविधान में "निषेधात्मक धारा" नहीं है (जैसा कि जर्मनी संविधान में एटर्निटी क्लॉज है)। जिसकी पूर्ति "उक्त निर्णय" करता है। उक्त निर्णय ‘‘न्यायिक सक्रियता’’ का भारतीय न्यायालय का पहला उदाहरण भी कहा जाता है। इस प्रकार उक्त प्रकरण केशवानंद भारती बनाम स्टेट ऑफ केरल (एआईआर 1973 एस.सी. 1461) के नाम से भारत में ही नहीं विश्वव्यापी रूप से प्रसिद्ध हुआ। क्योंकि इस अहम फैसले पर बांग्लादेश, अफ्रीका महाद्वीप में भी न्यायालयों ने भरोसा जताया। संयोगवश सचिन तेंदुलकर इस निर्णय के दिन ही पैदा हुये हैं।  
केशवानंद भारती केस के पूर्व आइसी गोलकनाथ व अन्य विरूद्ध पंजाब राज्य व अन्य (1967 एआईआर 1643) जो गोलकनाथ प्रकरण के नाम से प्रसिद्ध हुआ, के प्रकरण में उच्चतम न्यायालय के 11 जजों की फुल बेंच ने अपने पुराने निर्णय को पलटते हुए तत्समय पहली बार एक ऐतिहासिक निर्णय दिया था कि, संसद संविधान संशोधन के द्वारा नागरिक के मूल अधिकारों को कम नहीं कर सकती है। उच्चतम न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 13, 14, 19 31, 32, 243, 246, 248 एवं 368 पर विचार करते हुये उक्त निर्णय दिया था। इस निर्णय के द्वारा 17 वां संविधान संशोधन जिनके द्वारा पंजाब सिक्योरिटी एवं लेड़ टेन्यू अधिनियम 1953 (जिसे गोलकनाथ ने चुनौती दी थी) को संविधान की ‘‘नौवी अनुसूची’’ में ड़ालने के कारण, उक्त अधिनियम 1953 जो मूल अधिकारों को कम कर रहा है को, 17 वें संशोधन के कारण चुनौती न दे सकने के कारण संविधान संशोधन कानून को ही ‘शून्य’ घोषित कर दिया था। 
केशवानंद भारती प्रकरण ने, उक्त गोलकनाथ प्रकरण जो संसद को संविधान के मूल अधिकारों को कम करने से रोकता है, से आगे जाकर संविधान के मूल ढांचे पर किसी भी तरह की छेड़छाड़ करने से रोका गया। इंदिरा गांधी विरूद्ध राजनारायण के प्रकरण में केशवानंद भारती के मूल तत्व के सिद्धांत को अपनाते हुये 39 वां संविधान संशोधन अधिनियम को अवैध घोषित कर दिया गया। इस प्रकरण में उच्चतम न्यायालय एक कदम और आगे जाकर समानता व लिर्बटी (स्वतंत्रता) के अधिकारों को जो संविधान के मूल अधिकार में शामिल नहीं है, लेकिन संविधान की मूल तत्व (बेसिक स्ट्रक्चर) होने के कारण उसके साथ छेड़ छाड़ नहीं की जा सकती है, जैसा कि आपात्तकाल में पारित संविधान संशोधन कानून द्वारा किया गया था। इसी निर्णय को आगे मिनर्वा मिल्स लिमिटेड विरुद्ध भारत संघ (ए.आई.आर.1980 एससी 1789) में अनुसरण किया जाकर 42 वें संविधान संशोधन कानून जिसके द्वारा (प्रथम बार केशवानंद भारती के) मूल ढांचे के सिद्धांत को निष्प्रभावी कर असीमित संशोधन का अधिकार दिया था, के कुछ भागों को शून्य घोषित कर दिया। मूल ढ़ाचे के उक्त सिद्धांत को एल चंद्र कमा वि. भारत संघ, आर. आर कोहली वि. तमिलनाडू राज्य में ऊपर उल्लिखित "मिनर्वा प्रकरण" (जिसमें केशवानंद भारती प्रकरण का अनुसरण किया गया था) को अनुसरण करते हुये माना गया।  
उपरोक्त कारणों से केशवानंद भारती के फैसले को संविधान का रक्षक भी कहा जाता है। यद्यपि उक्त प्रकरण में केशवानंद भारती के अलावा अन्य पक्षकार भी थे व मूल विषय भी हटकर मठ की जमीन दूसरों को लीज पर देना से संबंधित था। एक अनोखी बात इस प्रकरण की यह भी रही कि स्वयं केशवानंद मठ की संपत्ति के जिस मुद्दे को लेकर लड़ रहे थे, उसमें वे हार गये और मठ को कोई फायदा नहीं हुआ। परन्तु उक्त निर्णय एक ऐतिहासिक नजीर बन गया। जिसमें आम भारतीय नागरिक को ऐतिहासिक स्थायी फायदा हुआ। इस प्रकार ‘‘केशवानंद भारती’’ न्यायिक निर्णयों के इतिहास में ‘‘एक मील का पत्थर’’ साबित हुये। ‘‘केशवानंद भारती’’ का ध्यान अभी इसलिए आया क्योंकि 79 साल की उम्र में केशवानंद भारती जो केरला के ‘‘शंकराचार्य‘‘ भी माने जाते हैं, का अभी हाल निकट में ही निधन हो गया हैं। 
उनको नमन! श्रंद्धांजली!

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