शनिवार, 12 सितंबर 2020

*‘‘उद्धव ठाकरे’’ क्या राजनीति में दूसरे ‘‘राहुल’’ तो नहीं ‘‘होते’’ जा रहे?

फिल्मी कलाकार ‘कंगना रनौत‘ के मुंबई स्थित ‘‘कार्यालय’’ के तथाकथित कुछ अतिक्रमण के भाग को तोड़ने हेतु ‘‘इंसटेट काफी’’ के समान ‘‘तुंरत-फुरंत, तत्वरित गति’’ से कार्यवाही की गई। इससे ‘‘राजनैतिक गलियारों’’ में चल रही इस बात को बेशक बल मिल गया कि, महाराष्ट्र की राजनीति के केंद्र बिन्दु ‘‘उद्धव’’ कहीं दूसरे ‘‘राहुल’’ तो सिद्ध नहीं होने जा रहे हैं? क्योंकि इसके पहले ‘‘पालघर’’ ‘‘अर्नब गोस्वामी,’’ ‘‘सुशांत सिंह राजपूत’’ और अब ‘‘कंगना रनौत’’ इन समस्त मामलों में शिवसेना का रवैया बहुत ही गैर राजनैतिक, गैर जिम्मेदाराना, (राजनैतिक रूप से) अपरिपक्व और अदूरदृष्ट्रि पूर्व रहा। शिवसेना को जहाँ (सुशांत मामले में) तेजी से कार्यवाही करनी थी, वहाँ पर तो उसका रवैया बिल्कुल ढ़ीला-ढ़ाला रहा। परन्तु जहां प्राकृतिक न्याय की दृष्टि से विक्टिम (शिकार) (जो मनाली से वापिस लौट रही थी) को समय दिया जाना चाहिये था, वहाँ ‘जल्दबाजी’ में कार्यवाही कर स्वयं को अनावश्यक विवाद में घसीट ले आयी। इस कारण से उन समस्त मामलों में सभी पक्ष तो एक तरफ हट गए और ‘‘शिवसेना ही मुख्य विलेन के रूप में हो गई या प्रस्तुत कर दी गई’’। 
इस बात का शिवसेना के पास कोई जवाब ही/भी नहीं है कि, मुंबई महानगर पालिका के पास ‘अतिक्रमण’ से संबंधित कितनी शिकायतें कंगना के विरूद्ध कार्यवाही करने के पूर्व तक लंबित थी? कंगना रनौत के विरूद्ध हुई शिकायत का कौन सा नम्बर था? क्या कंगना के पूर्व की लम्बित अन्य समस्त शिकायतों का निपटारा हो गया था? व ‘‘नियमों’’ का कितना पालन किया गया? इन प्रश्नों की निरूत्तर स्थिति के कारण शिवसेना की बहुत ‘भद’ और ‘किरकिरी’ हो रही है। जिस कारण से उपरोक्त समस्त मामलों पर समग्र रूप से विचार करने पर यह‘‘धारणा’’(परशेप्शन) बलवती व गहरी होती जा रही है कि ‘उद्धव’ याने कहीं ‘राहुल’ तो नहीं ? एक दबंग, दृढ़ व मजबूत ‘‘इंदिरा गांधी’’ जिन्हे उनके विरोधियों ने भी, कभी ‘‘मां दूर्गा’’ की संज्ञा तक दे ड़ाली थी, की छवि को जिस प्रकार राहुल गांधी ने अपनी मंदबुद्धि व अपरिपक्वता से ध्वस्त कर रखा है। ठीक उसी प्रकार महाराष्ट्र के ‘‘शेर बाला साहब ठाकरे’’ की छवि भी ‘उद्धव’ की कार्य प्रद्धति से निरंतर दिनोंदिन गिरती जा रही है। यद्यपि सामाजिक व व्यवहारिक रूप से उद्धव एक व्यवहार कुशल व्यक्ति जरूर है। 
आइये; कंगना रनौत पर कुछ चर्चा बढ़ाने  के पूर्व थोड़ी सी मीडिया की सुध भी ले लें! जो यहां पर जरूरी है। आखिरकार इस देश के ‘मीडिया‘ को हो क्या गया है?‘‘हाइपरसोनिक मिसाइल तकनीक’’ (डीएसटीडीवी) का सफल परीक्षण कर भारत विश्व का चैथा देश बन गया है, जिसकी कुछ समय तक, कुछ लाइन की न्यूज प्रसारित कर मीडिया ने अपने ‘दायित्व‘ की इतिश्री मान ली। भारत-चीन सीमा विवाद के बढ़ते तनाव के बीच दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच हुई ‘‘पंचशील सहमति’’ को एक दो लाइन में प्रसारित कर मीडिया ने अपने महत्वपूर्ण ‘‘समय को बचाकर‘‘ ‘‘रनिंग कंमेंट्री’’ के लिये रख लिया। कंगना रनौत मनाली  (हिमाचल प्रदेश) से ‘‘कितने बजे‘‘ निकली ‘‘और कहां कहां पहुंची‘‘ है और कल ‘‘मुंबई कब पहुंचेगीं,’’ रास्तों में क्या खाया पिया। इन सब ‘बकवास’ की क्रिकेट समान लिविंग कमेंट्री (आंखों देखा हाल) आपके पास पहुंचा कर ही मीडीया अपने दायित्व को पूरा मानेगा? अन्यथा आप जनता उन मीडिया के स्टूडियो को तोड़ नहीं देंगे? क्योंकि ‘सुशांत’ के बाद कंगना रनौत को इस समय देश की सबसे बड़ी ‘‘आइकॉन’’ जो बना दिया है? मीडिया के पास मिसाइल तकनीक की उपलब्धि की रनिंग कमेंट्री लगातार कुछ दिनों तक करने का समय नहीं है, जिसमें वह यह बतलाए कि उक्त टेक्नोलॉजी आवाज की गति से 6 गुना तेज (मैक्स-6) गति से दूरी तय कर सकती है। उक्त टेस्ट डीआरडीओं (रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन) ने उड़ीसा तट के पास डॉक्टर अब्दुल कलाम कांम्पलेक्स से स्वदेशी मानव रहित स्क्रैमजेट प्रोपल्जन सिस्टम का उपयोग कर हाइपरसोनिक स्पीड़ फ्लाइट का सफल टेस्ट किया है। इस टेस्ट की तैयारी करने में कितना समय व धन लगेगा? आदि-आदि।
आइए, अब कंगना रनौत व उन को दी गई सुरक्षा की बात कर लें। ‘कंगना रनौत‘ को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने ‘‘वाय श्रेणी’’ की सुरक्षा प्रदान कर दी हैं। जिसमें 11 पुलिस कर्मियों के साथ 2 पर्सनल सिक्यूरिटी आफीर्सस भी शामिल होते है। इस पर जनता के टैक्स चुकाए पैसा का खर्चा! कितना? प्रतिउत्तर में, कंगना रनौत ने गृहमंत्री अमित शाह को धन्यवाद भी दे दिया है। इस प्रकार लगभग 135 करोड़ की जनसंख्या वाले देश में लगभग 450 सुरक्षा प्राप्त व्यक्तियों के क्लब में शामिल होकर वे माननीय हो गयी है। कंगना रनौत फिल्मी दुनिया की बहुत सफल नहीं तो भी एक नामचीन अभिनेत्री जरूर है। परन्तु एक मामले में उन्होंने सफलता जरूर प्राप्त की है, वह समय-समय पर विवादित बयान देकर सुर्खियों में रहकर, सिर्फ बयानों में ही बयानी दुश्मनी पैदा कर लेती है। फिलहाल वे ‘‘बेखौफ बयानवीर‘‘ बनी हुई हैं। लेकिन ‘‘बेखौफ’’ बयानों का कदापि यह मतलब नहीं है कि, आप ‘‘खौंफ’’ पैदा कर सुरक्षा की मांग करने लगे। उन्होंने पूरी की पूरी फिल्म इंडस्ट्रीज पर ही यह आरोप जड़ दिया था कि, लगभग 99 प्रतिशत फिल्म उद्योग से जुड़े लोग ड्रग्स लेते हैं, जिस जानकारी को उन्होनें आज तक एनसीबी के साथ शेयर क्यों नहीं किया? अभी फिलहाल वे सुशांत प्रकरण में लगातार विवादित अनर्गल बयानों और ट्विटर्स के माध्यम से सोशल मीडिया में तरोताजा हैं। और मुंबई महानगर पालिका की कार्यवाही ने ‘‘आग में घी ड़ालकर’’उन्हें बेचारी राष्ट्रीय हीरोईन तक बना दिया है। किसी ने (मेरी नहीं) एक टिप्पणी की है, सुशांत प्रकरण के अनचाहे गर्भ से कंगना प्रकरण का जन्म हो गया है। इस तरह से अन्य कोई सामान्य नागरिक यदि‘‘विवादित बयान’’ देकर सिर्फ बयान बाजी के भीतर (प्लेटफार्म पर) दुश्मन पैदा कर ले तो, क्या केंद्रीय सरकार उस प्रत्येक व्यक्ति को ‘‘वाय या अन्य श्रेणी’’ की सुरक्षा प्रदान करेगी?चूंकि यह प्रश्न उठाया गया हैं कि, अन्य अतिक्रमणों पर कार्यवाही क्यों नहीं की गई? मतलब साफ है कि इस देश में ‘‘अपनी-अपनी ढफली’’ ‘‘अपना-अपना राग’’।  
संविधान में भारत के प्रत्येक नागरिक की सुरक्षा का दायित्व  सामान्यतया उस राज्य की सरकार पर ड़ाला गया जहां के वे नागरिक है। अतः कंगना रनौत को जान माल की सुरक्षा का कोई यदि खतरा है भी तो, उसकी सुरक्षा का  दायित्व भी महाराष्ट्र सरकार पर ही है। प्रारम्भ में कंगना द्वारा अपनी सुरक्षा के प्रति ड़र व आंशका व्यक्त करने पर उनकी सुरक्षा के बाबत महाराष्ट्र सरकार ने कंगना को सुरक्षा देने की पेशकश की थी। लेकिन कंगना ने यह कहकर उसे अस्वीकार कर दिया था कि, उसे मुंबई पुलिस पर भरोसा नही हैं। अतः उसे केन्द्र या मध्यप्रदेश पुलिस की सुरक्षा दिलायी जाए। केन्द्रीय सरकार ने कंगना रनौत को सुरक्षा देने के पूर्व महाराष्ट्र सरकार से इस संबंध में क्या कोई चर्चा की थी? क्या सुरक्षा एजेंसी (आई.बी. इत्यादि) से ‘‘खतरे‘‘ के संबंध में कोई रिपोर्ट ली गई ? और यदि खतरा है,तो कितना? कितनी सुरक्षा की आवश्यकता है। और इन सबसे बड़ा प्रश्न यह उत्पन्न होता हैं कि कंगना को वास्तविक रूप से किससे खतरा हैं? खतरा किस बात का है? जान का? संपत्ति का? सम्मान का? गाली गलौच का? या....  
आपको शायद याद होगा, जब महाराष्ट्र सरकार की सुरक्षा को कंगना ने अस्वीकार किया था, तब शिवसेना प्रवक्ता संजय राउत ने कहा था कि यदि उन्हे महाराष्ट्र आने से ड़र लगता है (जैसा कि कंगना का स्वयं का बयान था) तो वे मुंबई वापिस न आए। इस बात का बतंगड़ बना दिया गया। एक व्यक्ति लगातार उस सरकार पर असुरक्षा का आरोप लगा रही हो, जो सुरक्षा देने को तैयार है। लेकिन आरोप लगाने वाली व्यक्ति सुरक्षा के प्रस्ताव को (राजनीति के चलते?) मना कर देती है। तब ‘उस सरकार’ के पास ‘चारा’ क्या रह जाता है? संजय राउत के उक्त बयान में कोई प्रत्यक्ष धमकी नहीं थी। इसके बावजूद संजय राउत को उक्त बयान को लेकर कटघरे में खड़े करने का प्रयास किया गया। जब महाराष्ट्र सरकार पर कंगना का विश्वास उठ गया है व उनकी जान को खतरा है, तब मुंबई आने पर उनके जान के खतरे को दूर करने के लिये महामहिम राज्यपाल को महाराष्ट्र सरकार को भंग नहीं करना पड़ेगां? परन्तु कंगना ने पलटकर चुनौती देती हुये कहा है कि मैं मुंबई आ रही हूं, ‘‘किसी के बाप में हिम्मत है तो रोक लें‘‘। कंगना के आये लगातार ऐसे बयान सिर्फ ‘‘छुपे हुये राजनैति एजेंड़े‘‘ के परिणाम स्वरूप ही प्रतीत होते दिखते हैं। फिर चाहे ‘‘मुंबई की पीओके’’ से तुलना गृहमंत्री अनिल देशमुख की ओर इंगित करते हुये कहना कि पीओके से तालीबान में तब्दील हो गया। ‘‘सार्वजनिक रूप से, तू तड़ाके शब्दों’’ के द्वारा मुख्यमंत्री को संबोधित करना, फिल्मी इंडस्ट्रीज देश द्रोहियों से भरी हुई हैं, आदि-आदि। (बयानों की लम्बी फेहरिस्त है)
वर्तमान में मीडिया और देश की यही ‘‘नीति’’ बन गई है। और जब इस ‘‘नीति’’ पर ‘‘राजनेता’’ सवार हो जाते हैं, तब वह ‘‘राजनीति’’ कहलाने लगती है। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री, महामहिम राज्यपाल, महाराष्ट्र एवं पूर्व मुख्यमंत्री से लेकर ‘करणी सेना’, ‘आरपीआई’, ‘‘संत समाज‘‘ आदि तभी तो इस दौड़ में शामिल हो गये हैं। इसलिए सब कुछ जायज है। कंगना रनौत ने जिस प्रकार के लगातार आक्रमक विवादित बयान दिये है, क्या उसे किसी भी तरह उचित ठहराया जा सकता है? इस बयानों पर उक्त बयानवीर लोग कंगना को कटघरे में खड़े नहीं कर रहे है? सिर्फ उनकी राजनीति को सूट (अनुकूल) वाले बयानों को चुनकर राजनीति के "हवन कुंड" में अपनी आहूति देकर हवन की आग को ‘‘राजनीति चमकाने के चक्कर में’’ बुझने नहीं दे रहे है? निश्चित रूप से कंगना के प्रश्न व जवाब के शिवसेना के प्रत्युत्तर बचकाना व अपरिपक्व है, और उनका समर्थन नहीं किया जा सकता है। अरविंद केजरीवाल (थप्पड़ कांड) नरेंद्र मोदी (को चोर कहना) के प्रत्युत्तर में उनके ’मौंन’ से शिवसेना कुछ तो सीख ले ले?
लेकिन इससे कंगना रनौत का स्टेण्ड सही सिद्व नहीं हो जाता है। ‘क्रिया‘ की ‘प्रतिक्रिया‘ यदि गलत है, तो उक्त क्रिया स्वतः स्वय-मेव सही ही हो, यह आवश्यक नहीं है। प्रस्तुत प्रकरण में यही सब कुछ तो हो रहा हैं। इस संबंध में शरद पवार का रूख पूरी तरह से सामयिक, राजनैतिक परिपूर्णता लिये हुये परिपक्व है। शिवसेना को इससे सबक लेना चाहिये। परन्तु उपरोक्त घटनाओं के बावजूद शिवसेना द्वारा आगे कंगना के घर पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई करने के लिए नोटिस देना और गृहमंत्री अनिल देशमुख के द्वारा ड्रग्स एक्ट के अंतर्गत कंगना के विरुद्ध कार्रवाई करने के आदेश देना और फिर शिव सैनिकों द्वारा रिटायर्ड नौसेना अधिकारी द्वारा किए गए कथित व्हाट्सअप मैसेज पर हुड़दंग मचाना व मारापीटी करना। इन सब बढ़ती हुई कार्रवाईयों व घटनाओं से तो यही लगता है कि शिवसेना ने उपरोक्त लगातार हो रही फजीहत से कोई सबक नहीं लिया है। अर्थात उपरोक्त घटना उक्त ‘‘धारणा‘‘ कि ‘‘उद्धव राहुल हो गए‘‘ को ‘‘वास्तविकता‘‘ में बदल रही हैं। ‘‘सामना’’ (‘शिवसेना का मुखपत्र’) के अभी भी लगातार चलते (असफल) आक्रमण से शिवसेना की स्थिति आगे जाकर कहीं ऐसी न हो जाये कि वह जनता का ‘सामना’ करने की स्थिति में ही न रहे। तब ‘‘न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी’’। तब शायद कहीं शरद पवार को भी आगे यह न कहना पड़े कि ‘‘नादां दोस्त से दानां दुश्मन ज्यादा अच्छा होता है‘‘।
अंत में इस पूरे प्रकरण को इस एक लाइन में संपादित किया जा सकता है ‘‘जिस ‘‘सजी सजाई थाली‘‘ को शिवसेना ने पूर्व में भाजपा के सामने से ‘‘खींच‘‘ लिया था, आज उपरोक्त समस्त  घटनाओं के द्वारा पकी पकाई खीर भाजपा को सौंप दी, जिसे लपकने में भाजपा ने बिल्कुल भी देरी नहीं की। यह राजनीतिक परिपक्वता को दर्शाता है।

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