गुरुवार, 16 जुलाई 2020

कांग्रेस को ‘‘मुश्किल’’ से प्राप्त ‘‘सत्ता‘‘ को बनाए रखने का नुस्खा चाहिए!

 
मध्य प्रदेश के बाद राजस्थान में भी कांग्रेस की सत्ता की ‘‘चूले‘‘ हिल गई है। कुछ समय पूर्व ही मध्यप्रदेश में ऐसे ही घटनाक्रम ‘‘आपरेशन लोटस’’ के चलते कांग्रेस को सत्ता ही खोनी पड़ी थी। इसके पूर्व कर्नाटक, अरूणाचल प्रदेश, मणिपुर व गोवा में भी सत्ता के बनते ‘‘समीकरण‘‘ को कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व व उनके प्रतिनिधि गण अपने पक्ष में न कर पा सकने के कारण उन प्रदेशों में कांग्रेस सत्तारूढ़ नहीं हो पाई थी। ‘कारण अनेक‘ हो सकते हैं। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण कारण इन सब घटनाओं के पीछे जो साफ दिखता है, वह ‘‘सत्ता, शक्ति व अधिकार‘‘ (पावर) का केंद्रीयकरण हद से भी ज्यादा होकर सिर्फ ‘‘परिवार‘‘ के बीच में ‘‘सिमट कर हो जाना है। राजनीति में फैलाव व विस्तार के लिए ‘‘सिमटने की नहीं‘‘ बल्कि ‘‘विकेंद्रीकरण‘‘ की आवश्यकता होती है। चूँकि आपको ‘केंद्र‘ से ‘अंतिम छोर‘ तक जाना व पहुंचाना होता है। इस बात को जितनी जल्दी कांग्रेस का हाईकमांड मतलब ‘‘गांधी परिवार‘‘ समझ ले, उतना ही अच्छा न केवल कांग्रेस पार्टी के ‘‘स्वास्थ्य’’ के लिए है, बल्कि देश के लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष की प्रभावी मौजूदगी की आवश्यकता के लिए भी एक अच्छा कदम होगा।
कांग्रेस के लिए लोकतंत्रिय कदम क्या हो सकते है? याद कीजिए! जब मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभाओं के चुनाव हुए थे, तब राहुल गांधी ने तीनों प्रदेशों के जो दो दो प्रमुख दावेदार थे, उन्हें बुलाकर चर्चा कर मुख्यमंत्री पद पर उन्हीं ‘पसदीदा’ व्यक्तियों को बैठाया, जिनके पास वास्तव में भी कांग्रेस विधायक दल ‘‘(सीएलपी)‘‘ में बहुमत प्राप्त था। यदि दिल्ली से नियुक्ति (नॉमिनेट) करने के बदले, केन्द्रीय नेतृत्व कांग्रेस विधायक दल की बैठक बुलाकर विधायकों को अपना नेता चुनने की स्वतंत्रता दे देता, तब भी परिणाम वही आते, जो राहुल गांधी ने तय किए थे। लेकिन तब कांग्रेस को सबसे बड़ा फायदा यह होता कि, मुख्यमंत्री पद के जो अन्य दूसरे दावेदार थे, उनको अधिकारिक रूप से उन्हे अपनी हैसियत और औकात का पता भी लग जाता। तब वे हारे हुये दावेदार आगे ‘‘हाईकमान’’ के सामने कभी भी यह दावा नहीं कर पाते कि, उनको हाईकमान ने मुख्यमंत्री न बनाकर उनके साथ ज्यादती या पक्षपात किया है। सचिन पायलट के समर्थकों सहित लगभग पूरा मीडिया एवं विपक्ष के द्वारा बार-बार यह कथन किया जा रहा कि, सचिन पायलट की 6 साल की मेहनत से ही राजस्थान में कांग्रेस को बहुमत मिला है। इसमें कोई शक नहीं कि विधानसभा चुनाव की जीत में सचिन पायलट की मेहनत का महत्वपूर्ण योगदान है। लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अशोक गहलोत वहां के पूर्व में दो बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं। पूरे प्रदेश में उनकी एक मजबूत ‘‘धाकड़ पकड़’’ से कोई इंकार नहीं कर सकता है। अतः जीत सब के संयुक्त अथक प्रयासों के परिणाम से ही हुई है। इसीलिए यदि राजस्थान में तत्समय ही विधायक दल की बैठक बुलाकर विधायकों को अपना नेता चुनने का स्वतंत्रता (फ्री हेंड़) दे दी जाती तो, आज यह बड़ा संकट इस रूप में खड़ा नहीं होता। यद्यपि आज आंकडों की कमी के कारण यह संकट फिलहाल टला अवश्य है, लेकिन खत्म नहीं हुआ है। लोकतंत्र में मंुडियों की संख्या की गिनती का ही सबसे ज्यादा महत्व होता है।
यह स्पष्ट है, कि पूर्व में सीबीआई, आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा, जैसी संस्थाओं का दुरूपयोग कर अनैतिक रूप से राज्यपालों, के माध्यमों से कांग्रेस विपक्ष की सरकारों को गिराने का सफलतापूर्वक खेल खेलती रही है। तब उसे नैतिकता व शुचिता का ध्यान नहीं आया। आज वही खेल कांग्रेस की गलत नीतियों कुप्रबंध का फायदा उठाकर भाजपा जन, धन व बाहुबल के सहारे न केवल कांग्रेस के हाथ में आए सरकार बनाने के सूत्रों (सत्ता की चाबी) को विफल करने में कर रही है, बल्कि चुनी हुई सरकारों को गिरा कर अपनी सरकारे भी बना रही है। तब कांग्रेस के पास विरोध का कौन सा नैतिक अधिकार रह जाता है? देश की राजनीति की यही नियति व मजबूरी मजबूती के साथ आज हो गई है।
उक्त विषय से संदर्भित व सामयिक, देश की राजनीति में लोकतंत्र की स्थिति कैसी व क्या हो गई है? इसकी भी चर्चा कर ले। निश्चित रूप से देश का शासन संविधान द्वारा प्रदत्त लोकतंत्र पर ही टिका हुआ है। लेकिन राजनीतिक पार्टीयों में खासकर कांग्रेस में कितना लोकतंत्र शेष रह गया है? यह बतलाने की कतई आवश्यकता नहीं है? इसीलिए कांग्रस की दशा आज क्या हो गई है, वह सब भी आपके सामने ही है। लेकिन जनसंघ से लेकर भाजपा तक का सफर करने वाली भाजपा तो पार्टी के अंदर आंतरिक लोकतंत्र की दुहाई देते देते थकती नहीं थी। पानी पी पीकर कांग्रेस को इस मुद्दे पर हमेशा कोसती व घेरती रही है। आज उस लोकतंत्र की भाजपा में क्या स्थिति है, कोई तो बता दे? हाई पावर का चश्मा लेकर आंख गढ़ा गढ़ा कर देखने के बाद भी भाजपा के किसी भी फोरम में लोकतंत्र लगभग दिखता नहीं है। बल्कि ऐसा लगता है कि भाजपा ने लोकतंत्र को विभाजित कर ‘‘लोक’’ और ‘‘तंत्र’’ को अलग-अलग कर अपना लिया है। और अपनी सुविधानुसार जब कभी शैक्षणिक क्लासों में चर्चा में लोकतंत्र को दिखाना होता है, तब वह उक्त लोक व तंत्र को मिलाकर लोकतंत्र का प्रतीक जनता के सामने सफलतापूर्वक रख देती है। भाजपा इस बात को क्यों नहीं समझ पा रही है, जिस आंतरिक लोकतंत्र के लगभग समाप्त हो जाने से कांग्रेस की दुर्दशा हुई है। उसी गलती का अनुसरण करके भाजपा क्या कैसे उक्त संभावित  दुर्दशा से बच पायेगी? क्या भाजपा कांग्रेस की अनेक नीतियों जैसे मनरेगा, आधार कार्ड़, जीएसटी, एफडीआई, निजीकरण आदि आदि अनके नीतियां का अनुसरण करने के समान ही पार्टी के अंदर कांग्रेस की उक्त आंतरिक लोकतंत्र विहिन नीति को अपना रही है?  
इस बात को समझने के लिए भाजपा की पूरी राजनैतिक यात्रा को पीछे ले जाकर उस पर विचार करने की आवश्यकता है। ‘‘जनसंघ’’ व वर्ष 1984 में लोकसभा में मात्र 2 सीटों पर सिमट जाने वाली भाजपा में तत्समय सत्ता की संघर्ष की स्थिति न होने के कारण, लोकतंत्र की बात खूब जोर शोर से कही जाती रही। एक जमाना वह था, जब पार्टी बुला बुला कर कार्यकर्ताओं नेताओं को विधानसभा और लोकसभा की टिकटे देती थी। कुछ लोग मना भी कर देते थे। और उनमें से कई लोग अनिच्छा पूर्वक पार्टी के निर्देशों के पालनार्थ भी चुनाव लड़ते थे। मुझे ख्याल आता है, वर्ष 1977 में जब स्वर्गीय कुशाभाऊ ठाकरे जी ने मेरे स्वर्गीय पिताजी गोवर्धन दास जी खंडेलवाल से बैतूल लोकसभा चुनाव लड़ने का अनुरोध किया था। लेकिन तब मीसा में जेल में बंद होकर बाहर आने के बाद परिस्थितियां न होने से उन्होंने चुनाव लड़ने से मना कर दिया था। वर्ष 1989 में ठाकरे जी ने मुझसे भी ‘आरिफ बेग’़ (पूर्व केन्द्रीय मंत्री) के लड़ने के पूर्व, बैतूल लोकसभा से और तत्पश्चात  कैलाश नारायण सारंग ने बैतूल विधानसभा से मुझे चुनाव लड़ने के लिये कहा था। तब की तत्कालीन परिस्थितियों के चलते मैंने भी चुनाव लड़ने में असमर्थता व्यक्त की थी।   जनसंघ व (प्रारंभिक शुरूवाती दैार में) भाजपा ऐसे अनेकों उदाहरणों से भरी पड़ी हैं। कहने का मतलब मात्र यही है कि जब सक्षम व्यक्ति चुनावी राजनीति की दृष्टि से कम थे, और पद ज्यादा होते थे, तब भाजपा में आंतरिक लोकतंत्र निसंदेहः पूरे शबाब पर था। लेकिन जैसे-जैसे सत्ता का लोभ संर्घष बढ़ता गया, उससे उत्पन्न संकट से निपटने के लिये आंतरिक लोकतंत्र का भावना भी कम होती जाकर खत्म होती गई। जबकि सर्वथा आज यही कहा जाता है कि सत्ता का लक्ष्य प्राप्ति हेतु हम लोकतांत्रिक तरीके से आगे बढ़ रहे हैं। पिछले 20 सालों में शायद ही ऐसा कोई उदाहरण सामने आया होगा, जब भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व द्वारा राज्यों में नेता चुनने हेतु भेजे गए पर्यवेक्षकों के निर्देशों के विपरीत स्वतंत्र रूप से विधायकों को नेता चुनने की आजादी कभी मिली हो। नेता चुनने की जो पद्धति कांग्रेस में हाई कमांड के रूप में विद्यमान है, वही पद्धति नाम बदलकर हाई कमांड की जगह केंद्रीय नेतृत्व होकर अपनाई जाती रही है।
एक उदाहरण आपको बताता हूं, जिससे आपको भाजपा की पुरानी और वर्तमान कार्य प्रणाली में अंतर स्पष्ट रूप में समझ में आ जाएगा। याद कीजिए वर्ष 2000 में जब शिवराज सिंह चौहान विक्रम वर्मा (पूर्व नेता प्रतिपक्ष) के विरुद्ध ‘‘पितृ पुरूष’’ कुशाभाऊ ठाकरे की इच्छा के विरूद्ध मध्य प्रदेश भाजपा अध्यक्ष का चुनाव लड़े थे। लेकिन पितृ पुरूष की नाराजगी के चलते वे चुनाव हार गए। तभी भाजपा में अंतिम बार आंतरिक लोकतंत्र दिखा था। यद्यपि वह सत्ता का नहीं संगठन की सत्ता का लोकतांत्रिक मुकाबला था। लेकिन आज तो संगठन के चुनने में भी लोकतंत्र समाप्त हो गया है। चुनाव आयोग की आवश्यकता की पूर्ति हेतु ही संगठन के चुनाव में भाग्य अजमाइश  होता है। साध्वी सुश्री उमा भारती जब मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी थी, तब भी उनके नाम पर समस्त विधायक गण एकमत थे। लेकिन जब वह हटी (या हटाई गई?) तब तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर के विरुद्ध व उमाजी के पक्ष में विधायकों का बहुमत होने के बावजूद केंद्रीय नेतृत्व के निर्देश पर प्रमोद महाजन ने जर्बदस्ती शिवराज सिंह चौहान को बहुमत विधायकों की इच्छा के विपरीत मुख्यमंत्री बनाया था। उपरोक्त घटनाओं में मैं कहीं न कहीं उपस्थित था।
लोकतंत्र संविधान द्वारा प्रदत्त जनता की इच्छाओं की पूर्ति के लिये व तुलनात्मक रूप में एक श्रेण बढि़या प्रणाली है। लेकिन अब स्पष्टतः पार्टीयों में आंतरिक लोकतंत्र की बात तो दूर बल्कि स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनावी लोकतंत्र भी कहां व कितने रह गये है? जो गुजरते समय के साथ स्वयं गंभीर प्रश्नों के घेरे में आते जा रहा है। एक चिंता का विषय अवश्य बन गई है। इस चिंता को कौन दूर करेगा? यह तो भविष्य ही बता सकता है। लेकिन निश्चित रूप से जिन जिन कंधों पर यह जिम्मेदारियां है वे सब चिंता से वाकिफ हो कर भी ‘‘वाकिफ’’ इसलिए नहीं हो रहे हैं, क्योंकि कमजोर होते लोकतंत्र की इसी कमजोरी का अपने हितों में वे जब तब फायदा उठाना चाहते हैं। इसलिए जब तक जनता स्वयं आगे नहीं आएगी, यह चिंता कहीं लोकतंत्र की ‘चिता’ में न बदले जाए? जो देश के लिए सबसे बुरी बात होगी? अंत में एक लाइन में इस लेख को पूर्ण किया जा सकता है ‘‘लोकतंत्र को लोकतात्रिक तरीके से ही खत्म किया जा रहा है, यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा, जैसा कि अमेरिकन लोकतंत्र के संबंध में प्रसिद्ध लेखक स्टीवन लेविट्स्की एवं डेनियल जिब्लाट ने ‘‘हाऊ डेमोक्रेसी डाई’’ किताब में लिखा है।  

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