शनिवार, 4 जुलाई 2020

‘‘चीन’’ का नाम ‘‘क्यों’’ नहीं लिया ? भारतीय? राष्ट्रीय? कांग्रेस!


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘अचानक’ ‘‘लेह’’ (लद्दाख) की यात्रा द्वारा 11000 फुट की उंचाई पर स्थित अग्रिम चौकी ‘‘नीमू’’ पंहुचकर सैनिकों के बीच ‘‘दम’’ भर कर सेना की हौसला अफजाई की। यह कहकर कि ‘‘बहादुरी और साहस शांति की जरूरी शर्ते हैं, दुश्मन ने हमारे जवान की ताकत व गुस्से को देखा है‘‘। इस दौरे के बाद कांग्रेस के प्रवक्ता गण ट्वीट्स और टीवी चैनलों में बहसों के दौरान एक ही बात की बार-बार रट लगाए जा रहे हैं कि, प्रधानमंत्री जी ने चीन का नाम क्यों नहीं लिया। इसके पूर्व भी ‘‘मन की बात‘‘ या ‘‘राष्ट्र को संबोधित‘‘ करते समय या अन्य किसी भी मौके पर भारत चीन सीमा पर उत्पन्न तनाव की चर्चा करते समय, प्रधानमंत्री ‘‘चीन‘‘ का ‘‘नाम‘‘ क्यों नहीं लेते हैं? यह प्रश्न कांग्रेस बेशर्म होकर बारम्बार पूछ रही है। सीमा पर उत्पन्न वर्तमान  तनाव के संकटकाल के संदर्भ में, इस प्रश्न का कितना औचित्य है? या यह सिर्फ कांग्रेस की घटिया राजनीति मात्र तो नहीं है?
कांग्रेस ऐसा प्रश्न पूछ कर आखिर सिद्ध क्या करना चाहती है? प्रधानमंत्री ने जब तब समय-समय पर अपने संबोधन में ‘चीन’ का नाम लिए बिना ‘‘इशारों इशारों’’ में ही देश की सीमाओं की सुरक्षा के संबंध में चीन को परोक्ष रूप से गंभीर चेतावनी व आवश्यक चुनौती देते रहे है। ‘‘हमारे देश की 1 इंच भूमि पर भी कोई दुश्मन देश कब्जा नहीं कर सकता है’’। ‘‘मातृभूमि की रक्षा और सुरक्षा की हमारी क्षमता व संकल्प हिमालय से भी ऊँचा है।’’ बार-बार उक्त भावनाएं व्यक्त करके सफलतापूर्वक प्रधानमंत्री ने समस्त पक्षों को संदेश दिये हैं। दुर्भाग्यवश इन संदेशों की गूंज कांग्रेस के कान में नहीं ‘‘गूंजी’’? (शायद ‘आंख‘ ‘कान‘ बंद रखने के कारण?) परन्तु भारत को अपनी सीमा सुरक्षा के बाबत जो संदेश चीन के प्रति (विरूध्द) देना चाहिए था, पूरे विश्व में वह अवश्य गया है। जिसके प्रमाण में विश्व के कुछ प्रमुख देशों द्वारा उक्त संदेश का संज्ञान लेना है। बगैर नाम लिए ही संबंधित पक्ष को प्रभावी रूप से ‘संदेश’ के माध्यम से नसीहत देना ’’नरेंद्र मोदी’’ की एक ’’कला’’ है। कांग्रेस उस ‘कला’ से चिढ़ क्यों रही है? क्या सिर्फ इसलिए कि राहुल गांधी को वह कला नहीं आती है? परिस्थितिजन्य इशारों में संदेश देना भी कई बार एक प्रभावपूर्ण कला मानी जाती है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह होता है कि, हम जब इस तरह से दुश्मन देश का नाम लिए बगैर चर्चा करते हैं, तब विश्व पटल में नाम लेने से यदि कोई अंतर्राष्ट्रीय जगत में किसी देश को साधने में एक प्रतिशत की भी शंका होने की संभावना हो, तो वह समाप्त हो जाती है। अपितु इससे कुछ भी नुकसान नहीं होता है। चीन का नाम न लेने का एक फायदा यह भी हुआ कि, उक्त संदेश सिर्फ चीन के लिये लागू न होकर समस्त पड़ोसी दुश्मन देशों जिनमें पाकिस्तान भी शामिल है, को इंगित किये हुये लागू हो गया। इस बात को कांग्रेस क्यों नहीं समझना चाहती है?
कांग्रेस या कोई भी यह तो समझाएं कि, कड़क संदेश शब्दों से नहीं शब्दों में अंतर्निहित भावों और बोलने वाले व्यक्ति की भाव भंगिमा और शारीरिक हाव भाव (बॉडी लैंग्वेंज) पर ज्यादा निर्भर होता है। यदि प्रधानमंत्री विनम्रता के साथ चीन का नाम ले लेते या बिना किसी ‘‘भाव‘‘ या ‘‘भाव भंगिमा‘‘ के चीन का नाम ले लेते, तो क्या कांग्रेस संतुष्ट हो जाती? क्या उससे भविष्य के प्रश्न समाप्त हो जाते है? बजाएं उसके क्या कांग्रेस को यह प्रश्न अभी भी पूछना चाहिये कि चीन से 20 शहीदों का बदला लेने के लिये उनकी सैन्य नीति क्या है? चीन का नाम नहीं लेने से चीन के प्रति प्रधानमंत्री का संदेश क्या ‘‘कमजोर‘‘ हो गया है? कैसे? वैसे जब कांग्रेस की दृष्टि में चीन का नाम लिया ही नहीं गया है, तो चीन के प्रति संदेश कमजोर कैसे? क्या इससे प्रधानमंत्री की भारत चीन सीमा की एल.ए.सी की सुरक्षा की और चीन को उसी की भाषा में जवाब देने की तैयारी में कोई कमी आ गई है? वैसे भी आवश्यकतानुसार प्रधानमंत्री ने चीन का नाम लिया है। जैसे (सर्वदलीय बैठक के संबोधन में) इसलिए कांग्रेस का यह आरोप न केवल झूठा है, बल्कि अर्थहीन व स्तर हीन है।
ऐसा लगता है कि, राहुल गांधी में ऐसी वाकपटुता और इशारों में कड़ा संदेश देने की कला न होने के कारण राहुल की उक्त कमी को छुपाने के लिये, कांग्रेस प्रधानमंत्री की आलोचना कर रही हैं। इस तरह के प्रश्न पूछकर कांग्रेस जाने अनजाने में देश की संप्रभुता के प्रति उसकी आस्था पर (वह) स्वयं ही प्रश्न चिन्ह लगाकर कटघरे में खड़ी कर रही है, इससे प्रधानमंत्री की निष्ठा कतई प्रभावित नहीं होती। अतः ऐसे प्रश्न करना, राष्ट्रहित में कदापि उचित नहीं है। वास्तव में ऐसे समय कांग्रेस को राहुल गांधी के नाम से भारत चीन सीमा पर उपस्थित तनाव की स्थिति के संबंध में चीन का नाम लिए बिना प्रधानमंत्री से ज्यादा कड़क संदेश जारी करके देश की सार्वभौमिकता के प्रति अपनी सबसे पुरानी प्रतिबद्धता को सार्वजनिक कर, देशहित का कार्य कर अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। जिससे इस संकट की घड़ी में पूरा भारत देश एक है, एकजुट है, एकता के सूत्र में खड़ा है, यह संदेश चीन सहित पूरे विश्व को जाय। फिलहाल यही अनुरोध कर,मैं कांग्रेस से उक्त (नाम न लेने के) स्टैंड पर पुनर्विचार कर उक्त उनसे राग अलाप बदं करने की अपील करता हूं।
वैसे मैं कांग्रेस से एक प्रश्न अवश्य पूछना चाहता हूं कि उन्हें प्रधानमंत्री द्वारा अपने भाषण में सिर्फ चीन का नाम लेने मात्र में ही रूचि है, या वे चीन के विरुद्ध आवश्यक कड़क कार्यवाही चाहते है। कांग्रेस यदि यह गांरटी लेती है कि, प्रधानमंत्री के द्वारा अपने भाषणों में चीन का नाम ले लेने भर से सीमा पर उत्पन्न संकट समाप्त हो जायेगा। तो मैं निश्चित रूप से प्रधानमंत्री से अनुरोध करूगा कि वे लगभग रूग्ण अवस्था में बिस्तर पर पड़ी कांग्रेस (भाजपा ने कांग्रेस मुक्त भारत की बात कही हैं) की इच्छा पूर्ति अवश्य करें। ‘‘भाषण बाजी‘‘ और और धरातल पर काम करने में अंतर होता है, खासकर जब मामला सेना व देश की सुरक्षा नीति से संबंधित हो। यह बात तो उस कांग्रेस को, जिसकी सरकार ने तीन-तीन युद्ध झेले हैं, अच्छी तरह से मालूम होनी चाहिए। प्रधानमंत्री ने चीन का नाम क्यों नहीं लिया, यह प्रश्न पूछने की बजाए कांग्रेस को सार्वजनिक रूप से देश को तथा प्रधानमंत्री को यह मुद्दा बतलाना चाहिए कि, वर्तमान परिस्थिति में सीमा पर कौन से कदम उठाने आवश्यक थे, जो अभी तक सरकार ने नहीं उठाए हैं। ताकि सरकार उन ‘‘विस्तृत सुझावों‘‘ पर ‘‘गम्भीरता’’ से विचार कर सकें। ‘‘उंगलियां’’ उठाकर सरकार व सेना के मनोबल को गिराने/तोड़ने का कार्य अनजाने अनचाहे में न करें। जिम्मेदार विपक्ष के रूप में युद्ध के साए के संकट काल में ऐसे अनर्गल प्रश्न पूछते रहने की बजाए सरकार द्वारा अभी तक किए गए कार्यों की ‘‘समीक्षा’’ करके, उनमें सरकार से यदि कोई गंभीर त्रुटि हो गई है तो, सुझावों के साथ उन्हे इंगित करना ही वर्तमान घड़ी में राष्ट्र धर्म है।
प्रधानमंत्री ने लद्दाख दौरे के दौरान सेना की जवानों के बीच जो भाषण दिया, उसमें उन्होंने  चीन का नाम लिए बिना ही ‘‘विस्तारवाद का युग’ समाप्त हो गया, जिसने हमेशा ’’दुनिया भर की शांति को खतरा पैदा किया है’’ यह कह कर परोक्ष रूप से चीन की कड़ी आलोचना की है। चीन को तो यह बात तुरंत समझ में आ गई कि ‘‘विस्तारवादी’’ शब्द का प्रयोग तो उसी के लिए किया गया है। और इसलिए उसने अपनी ओर से जवाब देने में कोई देर नहीं की और कहां हमें विस्तावादी कहना आधारहीन है। लेकिन कांग्रेस को यह बात अभी तक भी समझ में नहीं आ रही है कि, प्रधानमंत्री ने बिना चीन का नाम लिए ही उस पर ऐसा गंभीर आरोप मढ़ दिया, जिससे वह तिलमिला उठा और तुरंत उत्तर देने को मजबूर हुआ। कांग्रेस को इस बात पर विश्वास करना चाहिए और भरोसा रखना चाहिए कि, वक्त आने पर प्रधानमंत्री अपने मुखारविंद से (जैसा कि कांग्रेस चाहती हैं) सिर्फ ‘‘चीन का नाम ही नहीं लेंगे, वरण आवश्यकता पड़ने पर सही समय पर ‘‘शस्त्रों की नोक के सामने‘‘ चीन का नाम रख करके शस्त्र चलवा कर, उसको माकूल जवाब भी देंगे। देश की अस्मिता एकता और स्वाभिमान से ओत-प्रोत हमारे प्रधानमंत्री के 56 इंच के सीने की प्रतिष्ठा का सवाल है। कांग्रेस को न केवल स्वयं में विश्वास पैदा करना चाहिए, बल्कि उतना ही विश्वास प्रधानमंत्री पर भी रखना चाहिए। वर्तमान समय में यही उसका कर्तव्य है। अन्यथा उसे ‘‘राष्ट्रीय’’ ‘‘भारतीय’’ (कांग्रेस) कहलाने का नैतिक अधिकार नहीं बचेगा। क्योंकि राष्ट्रीयता व भारतीयता का कोई भी निविष्ट (इनपुट) उक्त प्रश्न में नहीं है। 

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