शुक्रवार, 18 नवंबर 2011

''आरएसएस" एक ''गाली" या ''राष्ट्भक्ति" का प्रतीक?


राजीव खण्डेलवाल:
पिछले कुछ समय से कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव, मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं आगामी महत्वपूर्ण होने वाले उत्तर प्रदेश के चुनाव प्रभारी दिग्विजय सिंह देश में घटित विभिन्न घटनाओ/दुर्घटनाओ के पीछे वे आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ) जिम्मेदार मानने के आदी हो चुके है। विगत पिछले कुछ समय से उन्होने आरएसएस के खिलाफ एक (छिपे हुए एजेंडे के तहत?) मुहिम चला रखी है। एक कहावत है कि किसी भी झूठ को लगातार, दोहराया जाय तो वह सच प्रतीत होने लगती है और लोग भी कुछ समय के उसे सच मानने लगते है। एक बकरे का उदाहरण हमेशा मेरे जेहन में आता है- एक व्यक्ति बकरा लेकर बाजार जा रहा था उसे रास्ते में तीन विभिन्न जगह मिले विभिन्न राहगीरो ने उसे बेवकूफ बनाने के लिए उस बकरे को बार-बार गधा बताया जिस पर बकरा ले जाने वाला व्यक्ति भी उसे गधा मानने लगता है। इसी प्रकार दिग्विजय सिंह के कथन सत्य से परे होने के बावजूद वे लगातार झूठ इसलिए बोल रहे है कि वे भी शायद उपरोक्त सिद्धांत के आधार पर अपने ''छुपे हुए एजेंडे" को 'सफल' करने का 'असफल प्रयास' कर रहे जिस पर देश के जागरूक नागरिको का ध्यान आकर्षित किया जाना आवश्यक है।
वास्तव में आरएसएस एक सांस्कृतिक, वैचारिक संगठन है जिसका एकमात्र सिद्धांत राष्ट्र के प्रति प्रत्येक नागरिक के पूर्ण समर्पण के विचार भाव को मजबूती प्रदान कर राष्ट्र को परम वैभव की ओर ले जाना है। इसी उद्वेश्य के लिए वह सम्पूर्ण राष्ट्र में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उनके व्यक्तिगत और सामाजिक उत्थान के लिए लगातार वर्ष भर कार्ययोजना बनाकर हजारो स्वयं सेवको की कड़ी मेहनत से नागरिकों के सक्रिय सहयोग से उसे क्रियान्वित करने का संजीदगी से प्रयास करता है। आरएसएस के सिद्धांतो से आम नागरिको को शायद ही कोई आपत्ती कभी रही हो। लेकिन उनकी कार्यप्रणाली को लेकर व उक्त उद्वेश्यों को प्राप्ति के लिए कार्यक्रमों को लेकर अवश्य कुछ लोगो को भ्रांति है जिन्हे दूर किया जाना आवश्यक है। जब से आरएसएस संघटन बना है तब से तीन बार इस पर कांग्रेस के केंद्रीय शासन ने राजनैतिक कारणों से प्रतिबंध लगाया और कुछ समय बाद उन्हे अंतत: उक्त प्रतिबंध को उठाना पड़ा। आज तक संगठन की हैसियत से आरएसएस पर कोई आरोप किसी भी न्यायालय में न तो लगाये गये और न ही सिद्ध किये गये। व्यक्तिगत हैसियत से यदि कोई अपराध किसी सदस्य या व्यक्ति ने किया है तो इसके लिए वह व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से स्वयं जिम्मेदार है न कि संगठन जैसा कि यह स्थिति अन्य समस्त संगठनों, समाजो के साथ है। आरोप लगाने वाले व्यक्ति के संगठन के साथ भी यही स्थिति है। यह स्पष्ट है कि आरएसएस पर लगाये गये आरोपो के विरूद्ध दिग्विजय सिंह या उनके संगठन या सरकार द्वारा कोई वैधानिक कार्यवाही नहीं की गई है और न ही कोई जांच आयोग बैठाया गया है। (क्योंकि अपने देश में जॉच आयोग का गठन तो आरोप मात्र पर तुरंत ही हो जाता है) वे मात्र अपनी 'राजनीति' को चमकाने के लिए 'अंक' बढ़ाने के लिए आरएसएस पर आरोपो की बौछार दिग्विजय सिंह लगा रहे है। लेकिन यह उनकी गलतफहमी है कि इससे उनकी राजनीति चमकेगी। लंबे समय तक न झूठ स्वीकार किया जा सकता है और न ही सत्य को अस्वीकार किया जा सकता है। सुबह उठने से लेकर रात के सोने तक जीने के लिए आवश्यक हर सांस ले रहे है दिग्विजय सिंह कोउसमें आरएसएस के 'कीटाणु' दिख रहे है। लेकिन इससे हटकर जो सबसे दुखद पहलू यह है दिग्विजय सिंह विभिन्न जन आंदोलन को सहयोग देने का आरएसएस पर आरोप लगा रहे है क्या वे वास्तव में आरोप है व वे संगठन खुलकर उक्त आरोपों के प्रतिवाद में क्यों नहीं आ रहे है यह चिंता का विषय है। वास्तव में कोई भी राजनैतिक या गैर राजनैतिक संगठनो पार्टी द्वारा आरएसएस को सहयोग देना या लेना क्या कोई आरोप है क्योंकि आरएसएस कोई अनलॉफुल संगठन नहीं है, न ही उसे कोई न्यायिक प्रक्रिया द्वारा प्रतिबंधित किया गया है। लेकिन मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के चलते खासकर देश के सबसे महत्वपूर्ण और बड़ा राज्य उप्र को देखते हुए मुस्लिम वोट के धु्रवीकरण को देखते हुए कांग्रेस का आरएसएस पर आरोप लगाना एक फैशन हो गया है। इसके विपरीत अनेक राष्ट्र विरोधी संगठन आज भी कश्मीर से लेकर देश के विभिन्न भागो में कार्यरत है। उनके खिलाफ क्या कोई प्रभावशाली आवाज कांग्रेस ने कभी उठाई? कांग्रेस के असम के एक सांसद तो विदेशी नागरिक है व उनकी भारतीय नागरिकता की प्रमाणिकता की जॉच भी चल रही है लेकिन कांग्रेस ने उनके विरूद्ध अभी तक कोई प्रभावी कार्यवाही नहीं की। यदि अन्ना हजारे और बाबा रामदेव जिनके आंदोलन राष्ट्रीय जन-आंदोलन है जो देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, कालाधन एवं बुराईयों को दूर करने के लिए है ऐसे आंदोलन को यदि संघ का सहयोग प्राप्त है तो कौनसा देशद्रोह का अपराध इसमें अपघटित होता है या भारतीय दंडसंहिता के अंतर्गत क्या अपराध है या कौन सा राजनैतिक अपराध है? यदि नही तो बाबा रामदेव, अन्ना हजारे या श्री श्री रविशंकर जी को आगे आकर स्वयं ही साहसपूर्वक यह तथ्य स्वीकार करना चाहिए क्योंकि यदि वे किसी अच्छे कार्य में लगे है और चाहते है कि देश का प्रत्येक नागरिक, संगठन, संस्था पार्टी इस कार्य में लगे, सहयोग करे और आरएसएस उक्त आंदोलन में सहायता दे रहा है तो उन्हे सार्वजनिक रूप से उनके सहयोग को स्वीकार करने में आपत्ति या हिचक क्यों होनी चाहिए या फिर वे यह कहे कि आरएसएस एक राष्ट्र विरोधी संगठन है और हमें उनके सहायता की आवश्यकता नहीं है। अन्ना का आज मोहन भागवतजी के बयान के संबंध में दिया गया जवाबी बयान न केवल खेदजनक है बल्कि बेहद स्वार्थपूर्ण है। देश के सैकड़ो संगठनों ने अन्ना के आंदोलन का समर्थन किया लेकिन अन्ना का संघ के बारे में यह बयान कि ''मुझे उनके साथ की जरूरत क्या है" क्या अन्ना भी दिग्विजयसिंह समान संघ के 'अछूते' मानते है स्पष्ट करे। वास्तव में यदि दिग्विजय सिंह के कथन का वास्तविक अर्थ निकाला जाये तो यह बात आईने के समान साफ है कि दिग्विजय सिंह जो कह रहे है जिसे इलेक्ट्रानिक मीडिया आरोपों के रूप में पेश कर रहे है वह वास्तव में आरएसएस की प्रशंसा ही है। अन्ना, बाबा और रविशंकर जी के जनआंदोलन सामाजिक व आध्यात्मिक कार्यो को पूरे देश की जनता ने स्वीकार किया है, राष्ट्रहित में माना है। राष्ट्रउत्थान के लिए माना है इस तरह से दिग्विजय सिंह के आरोपो ने आरएसएस को राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रहित का कार्य करने का प्रमाण पत्र ही दिया है।
आपको कुछ समय पीछे ले जाना चाहता हूं। प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने काश्मीर विलय के समय व चीन युद्ध में आरएसएस की भागीदारी एवं भूमिंका की प्रशंसा की थी व उन्हे २६ जनवरी की राष्ट्रीय परेड में आमंत्रित किया था। काश्मीर से लेकर देश के किसी भी भाग में आये हुए राष्ट्रीय आपदा, संकट, बाढ़, सूखा में आरएसएस के स्वयं सेवकों की जो निर्माणात्मक व रचनात्मक भूमिका रही है उसे भी कांग्रेस के कई नेताओं सहित देश ने स्वीकारा है। यदि कुछ घटनाओं जैसा कि दिग्विजय सिंह कहते है मालेगांव बमकांड जैसे मे यदि कोई व्यक्ति जो आरएसएस का तथाकथित स्वयं सेवक कभी रहा हो, आरोपित है तो उससे पूरे संगठन को बदनाम करने का अधिकार किसी व्यक्ति को नहीं मिल जाता है। प्रथमत: जो आरोप लगाये गये है वे ही अपने आप में संदिग्ध है। राजनैतिक स्वार्थपूर्ति के तहत कई बार देशप्रेमी सगठन और व्यक्तियों को बदनाम करने की साजिश रची जाती है। यह कहीं भी न तो आरोपित है और न ही सिद्ध किया है कि तथाकथित आरएसएस के व्यक्ति के कृत्य के पीछे आरएसएस की संगठित सोच है, प्लान है जिसके तहत उस व्यक्ति ने संगठन के आदेश को मानते हुए उक्त तथाकथित अपराध घटित किया है। कांग्रेस में कई घोटाले हुए है कामनवेल्थ कांड से लेकर २जी स्पेक्ट्रम कांड के आगे तक सैकड़ों घोटाले आम नागरिकों के दिलो-दिमाग में है। क्या यह मान लिया जाए कि इन घोटालों के पीछे कांग्रेस पार्टी का सामुहिक निर्णय है जिसके पालन में मंत्रियों ने उक्त घोटाले किये? राजनीति में यह नहीं चल सकता कि कडुवा-कड़ुवा थूका जाए और मीठा-मीठा खाया जाए। यदि किसी राजनीति के तहत या राजनैतिक आरोप लगा रहे है तो उससे आप स्वयं भी नहीं बच सकते है और वह सिद्धांत आप पर भी लागू होता है। इसलिए मीडिया का खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया का उत्तरदायित्व बनता है कि वह इस प्रकार के बेतुके तथ्यों को जनता तक परोसने से पहले उसके वैधानिक, संवेधानिक और नैतिक जो दायित्व है उसकी सीमा में ही अपने कार्यक्रम प्रसारित करेंगे तो वो देश के उत्थान में वे एक महत्वपूर्ण योगदान देंगे। मीडिया के दुष्प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता है तो उसके प्रभाव को नकारने का प्रश्र ही कहा उठता है। मैं उन समस्त नागरिकों और संस्थाओं और पार्टियों से अपील करता हूं कि यदि अच्छा कार्य कोई भी व्यक्ति, संस्था या पार्टी करती है तो खुले दिल से उसकी प्रशंसा होनी चाहिए उसका सम्मान किया जाना चाहिए न कि उसकी आलोचना होते हुए मूक रूप से देखते रहना चाहिए।
अंत में एक बात और जो आरएसएस पर साम्प्रदायिकता का आरोप अक्सर दिग्विजय सिंह द्वारा जड़ा जाता है। वह वास्तव में गलत व एक तरफा है। किसी एक सम्प्रदाय (दिग्गी राजा के शब्दों में हिन्दु) को संगठित कर एक संगठन खड़ा करना साम्प्रदायिकता है तो यही सिद्धांत दूसरा सम्प्रदायों पर वे क्यों लागू नहीं करते है। क्या दूसरेसम्प्रदाय के लोगो ने अपना संगठन नहीं बनाया है। यदि हिंदु समाज की ही बात करे तो उसमें भी विभिन्न समाजो के सामाजिक स्तर पर अखिल भारतीय स्तर से लेकर जिले तक कई संगठन है। जब २५ करोड़ वैश्य समुदाय का अ.भा.वै. महासम्मेलन संगठन यदि साम्प्रदायिक नहीं है तो तब १०० करोड़ हिन्दुओ को संगठित करने वाला संगठन साम्प्रदायिक कैसे? साम्प्रदायिकता संगठन बनाने से नहीं विचारों से पैदा होती है। यदि एक सम्प्रदाय वाले लोग दूसरे सम्प्रदाय के लोगो को घृणा की दृष्टि को देखते है तो वह साम्प्रदायिकता है जिसे अवश्य कुचला जाना चाहिए?

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