शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

उन्हे थप्पड़ पड़ा ! सिर्फ एक ! अन्ना हजारे


राजीव खण्डेलवाल:
कृषि मंत्री शरद पवार पर एमडीएमसी सेन्टर में आयोजित एक गैर राजनैतिक कार्यक्रम में मिडिया कर्मियों से चर्चा के दौरान ट्रांसपोर्ट व्यवसायी युवक हरविन्दर सिंह ने अचानक शरद पवार के गाल पर थप्पड़ मार दिया जिसकी गूंज वहां उपस्थित लोगो को भले ही सुनाई न दी हो लेकिन उक्त गूंज को इलेक्ट्रानिक मीडिया ने सम्पूर्ण देश को सुनाया। इस पर त्वरित टिप्पणी करते हुए अन्ना हजारे ने जो उपरोक्त टिप्पणी 'उन्हे थप्पड़ पड़ा! सिर्फ एक!' की गूंज भी शायद उक्तथप्पड़ की गूंज से कम नहीं थी की गरमाहट अन्नाजी के दिमाग तक शायद पहुंची जिसे भाप कर उसका असर होने के पूर्व उन्होने तुरंत अपने उक्त कथन को वापिस लिये बिना उक्त घटना की उसी प्रकार आलोचना एवं निन्दा की जिस प्रकार देश में हो रही राजनीति में राजनैतिक लोग प्रतिक्रिया देते है जिससे स्वयं पंवार भी बच नहीं सकते हैं।
             कहा गया कि देश में बढ़ती हुई महंगाई के गुस्से से आक्रोशित व्यक्ति ने थप्पड़ मारकर अपना गुस्सा प्रदर्शित किया। अन्ना टीम की एक महत्वपूर्ण सदस्य किरणबेदी ने यह कहा यदि उचित लोकपाल विधेयक नहीं आया तो इसी तरह का गुस्सा प्रदर्शित होता रहेगा। टीवी चैनल्स में चर्चा में अपने आप को विशेषज्ञ मानने वाले राशिद अलवी ने यशवंत सिन्हा के महंगाई के मुद्दे पर दिनांक २२ नवम्बर को दिया गया यह बयान कि अगर सरकार महंगाई के मुद्दे पर सोती रही तो यह मुद्दा हिंसा का कारण बन सकता है के बयान को उक्त घटना के लिये दोषी ठहरा दिया। समस्त प्रतिक्रिया जाहिर करने वाले व्यक्तियों ने इस घटना का कड़ी शब्दों में निन्दा तो की लेकिन अपनी-अपनी राजनैतिक रोटिया सेकने का प्राकृतिक (नेचुरल) कार्य भी किया गया। अत: हरविन्दर सिंह ने थप्पड़ इसलिए मारा कि या तो वह महंगाई से बहुत परेशान था या वह जनलोकपाल विधेयक पारित करने में रूकावट एवं विलम्ब के लिये बेहद क्रोधित था ऐसा प्रतिक्रिया-वादियों ने प्रतिक्रिया देते समय स्थापित कर दिया। यहां मैं अन्ना और उनकी टीम की प्रतिक्रिया पर ही चर्चा करूंगा क्योंकि राजनीतिज्ञो की प्रतिक्रियाएं स्वभाविक रूप लिये हुए है और जनता उनसे पूर्ण रूपसे भलीभांति परिचित है।
             वास्तव में 'अन्ना' जैसे शख्स से उक्त तत्काल की गई प्रतिक्रिया की उम्मीद नही की जा सकती है। क्या एक थप्पड़ मारने से महंगाई या जनलोकपाल बिल के स्वास्थ्य पर कोई प्रभाव पड़ेगा? यदि वास्तव में उक्त घटना महंगाई के विरूद्ध प्रतीक मानी जाती है तो अन्ना से यह पूछा जाना चाहिए कि कितने थप्पड़ मारने पर महंगाई खत्म हो जाएगी तब तदानुसार इस देश में जीवित व्यक्ति की मूर्ति स्थापित करने की परम्परा स्थापित करने वाली मायावती के समान ही शरद पवार की भी एक भी मूर्ति बनाकर उसे उतने थप्पड़ जड़वाकर महंगाई को समाप्त कर दिया जाय तो देशहित में यह एक बहुत बड़ा कार्य होगा। अन्ना टीम इस बात का भी जवाब दे कि यदि महंगाई को थप्पड़ का प्रतीक मानते है तो पूरे देश में एक ही व्यक्ति ने थप्पड़ क्यो मारा? क्या देश में एक ही व्यक्ति महंगाई से पीडि़त है? आज के राजनैतिक सार्वजनिक जीवन में लुप्त होते है जा रहे सद्पुरूष अहिंसावादी गांधी 'अन्ना' जैसा व्यक्ति से इस तरह की प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं की जा सकती है क्योंकि यह प्रतिक्रिया उन्हे भी आम सार्वजनिक व्यक्तित्व के ऊपर नहीं रखती है। 
             मै अन्ना का बड़ा समर्थक हूं क्योंकि देश की मूक आवाम को आवाज प्रदान कर देश के स्वास्थ्य को सुधारने का सार्थक निस्वार्थ प्रयास उन्होने किया है। मैं शरद पवार की उतना ही घोर विरोधी हूं इसलिए नहीं कि वे कांग्रेसी है बल्कि देश के वे कृषि मंत्री है व देश की कृषि व्यवस्था, बाजार, अर्थ व्यवस्था पर विभिन्न विभिन्न समय पर मामला चाहे अनाज के भंडारण का हो, गन्ना के मूल्य निर्धारण का हो, बढ़ती हुए शक्कर के मूल्य का हो या अन्य कोई नीतीगत मामला हो जिसका सीधा संबंध महंगाई से रहा है उनके बयानों ने आग में घी डालने का ही कार्य किया जिससे उन्हे बचना चाहिए था। लेकिन इस का यह मतलब नहीं है कि इस देश में सामने खड़ी विकराल समस्याओं को उक्त घटना के प्रतीक के रूप में लिया जाये जैसे इलेक्ट्रानिक चैनल तथा देश के राजनीतिज्ञो ने लिया है। अन्ना शायद अपनी त्वरित प्रतिक्रिया की गरमाहट को महंसूस कर गये और इसलिए उस भाप की गरमाहट से जलने के पूर्व उन्होने अपन भाव में संशोधन कर उक्त घटना की कड़ी निन्दा की। लेकिन ज्यादा अच्छा यह होता कि उक्त त्वरित टिप्पणी को वापस ले लेते या उक्त टिप्पणी के बाबत स्पष्टीकरण देते। उक्त बात से एक बात जेहन में आती है सच ही कहा गया है कि जब आत्म विश्वास हद की सीमा पार कर जाता है तब वह 'अहंकार' में बदल जाता है। क्या अन्ना एवं उनकी टीम इस सत्य की शिकार तो नही हो गई है? पिछले कुछ समय से घटित घटनाये इसी तथ्य की और ही इंगित कर रही है। याद कीजिए संसद में सर्व सम्मति से पारित प्रस्ताव द्वारा किये गये अनुरोध को मानने से इनकार कर दिया गया जब तक प्रधानमंत्री की लिखित चिट्टी उन्हे प्राप्त हुई नहीं थी। याद कीजिए जंतरमंतर पर आन्दोलन प्रारंभ करने के पूर्व उन्हे गिरफ्तार कर तिहाड् जेल में रखा गया तब गिरफ्तारी आदेश वापस लेने के बावजूद वे एक दिन अवैधानिक रूप से जेल में कमरे में ही रहे और वही से बाहर जाने के लिए तब तक राजी नही हुए जब तक रामलीला मैदान में जगह नहीं दी गई। याद करें मोहन भागवतजी कें कथन के जवाब में उनका प्रत्युत्तर ''मुझे इनके साथ की क्या जरूरत"। याद कीजिए उस स्थिति को जब उन्होने बाबा रामदेव को अपने आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी करने की स्थिति नहीं बनने दी। याद कीजिए जब इन्होने उमा भारती जैसे राजनीतिज्ञो को (उमा केवल राजनीतिज्ञ ही नही बल्कि देश की एक प्रमुख आध्यात्मिक प्रखर प्रभावशाली वक्ता रही है) मंच के पास तक नहीं आने दिया था। याद करें रामलीला ग्राउण्ड पर आन्दोलन की समाप्ति के समय जब एक राजनैतिक आरोपित व्यक्ति विलासराव देशमुख प्रधानमंत्री का पत्र मंच पर आये तब उन्हे आपत्ती नहीं हुई। लेख लिखते-लिखते अन्ना हजारे का यह बयान ''एक थप्पड़ पर इतना गुस्सा क्यों? किसानों के पिटने पर नही गुस्साते यह बयान भी उनके अहिंसावादी छवि के विपरीत होने के साथ साथ उनके अहंकार को ही दर्शाता है। अत: यह स्पष्ट है कि अचानक प्राप्त हुई सफलता भी कई बार अहंकार को जन्म देती है और अच्छे आदमी को गलत दिशा में ले जाने का प्रयास करती है। 
             अत: यह थप्पड़ सिफ शरद पवार पर नहीं है। परिस्थितियों ने शरद पवार को थप्पड़ मारने का एक प्लेटफार्म अवश्य दिया लेकिन इसका एक अर्थ नहीं बल्कि आने वाले समय में अनेक प्रश्रवाचक चिन्ह इससे उत्पन्न होंगे।

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