शनिवार, 25 जनवरी 2020

साहस दिखाना व सच पर टिके रहना, आज की ‘‘राजनीति’’ में कितना मुश्किल?

देश के पूर्व कानून मंत्री, वरिष्ठ कानून विद, संविधान ज्ञाता व कांग्रेस के प्रमुख नेता कपिल सिब्बल का केरल साहित्य सम्मेलन में यह बयान कि, ‘‘संसद द्वारा पारित ‘‘सीएए’’ के कानून को कोई भी राज्य लागू करने से इंकार नहीं कर सकता है, यह असंवैधानिक होगा’’। उनके ऐसे बयान का स्वागत भी हुआ। लेकिन जैसी आशंका थी, उक्त बयान के कारण कुछ लोगों के द्वारा कांग्रेस पार्टी के घोषित लक्ष्य सेे तथाकथित विपरीत होने व मानने के कारण, एवं विशेष कर इससे सत्तापक्ष को कांग्रेस पर हमला करने का एक हथियार मिल जाने से तथा कांग्रेस की स्थिति असहज़ महसूस होने पर कपिल सिब्बल को पीछे हटना पड़ा/हटाया गया। तत्पश्चात उन्होंने ट्वीट के जरिये यह स्पष्टीकरण देने का प्रयास किया कि ‘‘सीएए असंवैधानिक है एवं प्रत्येक राज्य की विधानसभा को संसद द्वारा पारित संशोधन के विरूद्ध प्रस्ताव पारित करने का संवैधानिक अधिकार है, लेकिन उच्चतम न्यायालय द्वारा उसे संवैधानिक करार दिए जाने पर उसका विरोध करना मुश्किल हो जायेगा व उस स्थिति में उनके लिये यह परेशानी का सबब बनेगा’’।  
वस्तुतः पूर्व में कपिल सिब्बल ने जो कुछ कहा था, उसका पार्टी रूख से कुछ भी लेना-देना नहीं था। उन्हांेने मात्र संवैधानिक स्थिति को स्पष्ट किया था, जो सही भी है। लेकिन वरिष्ठ अधिवक्ता होने के अतिरिक्त वे पिछली यूपीए सरकार मंे कानून मंत्री भी रह चुके है, इसलिए उनके बयान को कांग्रेस का ही संस्करण मानकर कांग्रेस के विरोधियों ने उनकी आलोचना की। इसी कारण शायद कांग्रेस को अपने नेता को बैकफुट पर आने के लिये बाध्य करना पड़ा। वैसे सामान्यतया ऐसी स्थिति में पार्टी ऐसे बयानों को नेता का व्यक्तिगत मत बताकर अपना पल्ला झाड़ लेती रही है। 
कपिल सिब्बल ने यद्यपि यह तो कहा कि संवैधानिक रूप से इसका पालन अनिवार्य है, लेकिन साथ ही यह भी कह दिया कि यह संशोधन असंवैधानिक है। वस्तुतः इसे उच्च एवं उच्चतम न्यायालय में 144 याचिकाओं द्वारा चुनौती भी दी गई है। कांग्रेस पार्टी का यह मानना है कि यह (संशोधित) कानून नहीं लाया जाना चाहिए था। एक अधिवक्ता व कांग्रेस नेता दोनों ही रूप में कपिल सिब्बल सही ठहराये जा सकते थे व कांग्रेस के स्टैंड पर भी कोई आँच नहीं आती, यदि वे सिर्फ यहीं तक रूक जाते। लेकिन आगे जाकर उन्होंने विधानसभा द्वारा पारित प्रस्ताव को भी सही वैधानिक ठहरा दिया है, जिससे उनकी वकील वाली दृष्टि गलत सिद्ध हो गई।   
इसके पश्चात कांग्रेस के अन्य दो नेता पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद व हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने भी संसद द्वारा पारित कानून की संवैधानिक बाध्यता का उल्लेख किया है। राजनीति में आज स्पष्टवादिता व सत्य को स्वीकार करने का साहस बिल्कुल गीदड़ भभकी बन कर रह गया है। धारा 302 में फांसी की सजा का प्रावधान है। यदि यही उद्धरण किसी पार्टी नेता द्वारा किसी ऐसे राजनैतिक कार्यकर्ता के संबंध में जिस पर उक्त प्रकार का आरोप है (उसका उल्लेख करके) यदि वह यह कह दे कि आरोपी को फांसी की सजा भी हो सकती है, तो उसका यह बयान उसके विरूद्ध कदापि नहीं माना जाना चाहिए। बल्कि यह मानना ही उचित होगा कि वह मात्र कानून की वास्तविक स्थिति भर को व्यक्त कर रहा है। यही स्थिति कपिल सिब्बल ने भी स्पष्ट करने का प्रयास किया था, जिन्हे बाद में शायद दबाव के कारण पीछे हटना पड़ा। क्या इससे हम यह न समझें कि राजनीति में स्थिति आज इतनी ज्यादा बद से बदतर हो चुकी है?  
कपिल सिब्बल अपने ट्वीट के माध्यम से दिये गये स्पष्टीकरण में एक बात और बिल्कुल गलत कह रहे है कि, विधानसभा को संसद द्वारा पारित कानून के विरूद्ध कानून पारित करने का कानूनन संवैधानिक अधिकार है। साथ ही वे आगे यह भी कहते हैं कि यदि उच्चतम न्यायालय उक्त संशोधित कानून को वैध मानेगें, तब समस्या खड़ी हो जायेगी। इसका मतलब साफ है कि संसद द्वारा पारित किसी भी कानून को केवल उच्चतम न्यायालय में ही चुनौती दी जा सकती है, राज्य की विधानसभाओं में प्रस्ताव पारित करके नहीं। यही हमारा लोकतांत्रिक संसदीय संवैधानिक ढाचा भी हैं। इसलिए विधानसभा में सीएए के विरूद्ध पारित प्रस्ताव मात्र कागजी रहकर राजनैतिक स्टैंड व शिफूगा भर है, वह कानून नहीं माना जा सकता। यही बात कपिल सिब्बल अच्छी तरह से जानते है, तब वे इस बात को सार्वजनिक रूप से क्यों नहीं कह पा रहे है? तथा अपनी पार्टी के विधानसभाओं में सत्ताधीश नेताओं को क्यों नहीं समझा पा रहे है। यहीं पर आकर उनके स्वतंत्र वकील होने के अस्तित्व पर एक प्रश्नचिन्ह तो अवश्य लग जाता है। उनकी यही मजबूरी देश की राजनीति को गर्त में ले जाने की ओर एक और कदम है। 
कोई भी कानून जो प्रारंभ से ही शून्य है, उसे विधानसभा में पारित करने के बावजूद वह कानून नहीं बन सकता है। क्योंकि उसका प्रभाव प्रांरभ से ही शून्य ही रहेगा। इसीलिए विधानसभा द्वारा पारित होने के बावजूद न्यायालय में उसे चुनौती देने की भी आवश्यकता नहीं है। यानी संसद द्वारा पारित कानून के विरूद्ध विधानसभा द्वारा कैसे भी पारित कानून इसी श्रेणी में आता है। अतः विधानसभा मात्र एक कागजी प्रस्ताव ही पारित कर सकेगी, जिसकी कानूनी व संवैधानिक वैधता शून्य होगी। मात्र इस सीमा तक ही विधानसभा का अधिकार है, इससे आगे बिल्कुल भी नहीं। 
कपिल सिब्बल क्या इस तथ्य को स्पष्ट करने का कष्ट करेगंे कि संसद द्वारा पारित कानून के विरूद्ध विधानसभा किस कानूनी प्रावधान के अंतर्गत वैधानिक रूप से कानून पारित कर सकती है, जिसे लागू किया जा सकता है। विधानसभा द्वारा पारित प्रस्ताव संसद द्वारा पारित कानून के विरूद्ध होने के कारण क्या वह शून्य नहीं हो जावेगा? इसलिए यह मानना कि विधानसभा को संवैधानिक रूप से केन्द्र के कानून को वापिस लेने का प्रस्ताव पारित करने का अधिकार है, वार्तालाप हेतु व तकनीकि रूप से तो सही हो सकता है, लेकिन वैधानिक रूप से गलत है। ऐसे प्रस्ताव का वैसा ही असर होगा, जैसे विधानसभा एक प्रस्ताव पारित कर दे कि पाक अधिकृत कश्मीर को भारत में मिलाने के लिए केन्द्रीय सरकार पाकिस्तान पर हमला करें। 
राज्य की विधानसभा इस प्रस्ताव के द्वारा उस कानून के प्रति मात्र अपने विरोध को ही दर्शित कर पा रहे है, इससे ज्यादा इसका कुछ भी प्रभाव नहीं। लेकिन विरोध की यह प्रक्रिया निश्चित रूप से न तो नैतिक है, न कानूनी है, न वैधानिक है और न ही उचित है। राजनैतिक और शासन के स्तर पर इस पर विरोध दर्शाने का अधिकार प्रदेश को है, जो राज्य के लोग कर भी रहे है। लेकिन आप विधानसभा में बहुमत का दुरूपयोग करके लागू न किया जा सकने वाला कानून पारित कर संवैधानिक संकट उत्पन्न करके विधानसभा के विरोध को दर्ज नहीं करा सकते। इसके बजाए उक्त विरोध दर्शाने के लिए मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर पुनर्विचार करने की मांग कर सकते है। अधिकतम विधानसभा में पुनर्विचार का प्रस्ताव पारित कर सकते है। सिब्बल को अपनी पार्टी के मुख्यमंत्रियों को यह बात समझानी होगी। सीएए असंवैधानिक है, यह कहने भर का पूर्ण अधिकार प्रत्येक विरोधी का माना जा सकता है। परन्तु उसका विरोध राजनैतिक रूप से जनता द्वारा व कानूनी रूप से उच्चतम न्यायालय में जाकर ही किया जा सकता है। विधायिका अर्थात राज्यों की विधानसभाओं में कदापि नहीं। इस वस्तुस्थिति को सदैव ध्यान में रखने की गहन आवश्यकता है। 
राजनीति में गिरावट व राज का नीति से हटने का एक बहुत बड़ा कारण सत्य की अस्वीकारिता ही है। व्यक्ति एवं जो पार्टी, संस्था, सत्य को जितना स्वीकारेगा वह उतना ही सफल हो पायेगा, क्योकि सच (सत्य) बहुत ही कड़वा होता है, ऐसा कहा जाता है। सत्य का यही कड़वा तत्व आपके व्यक्तित्व पर दाग लगाता है, को दूर करने के लिये आपको मीठा तत्व अर्थात अच्छा (सद्) प्रयास करने होगें, तभी तो आपके व्यक्तित्व का सही विकास होगा, समाज, पार्टी, व अंततः देश का विकास हो सकेगा। इसीलिए कपिल जी देश हित में अपेक्षा है आगे आप राजनीति में सच (सत्य) को स्वीकार करने व लागू करने का साहस भी प्रदर्शित करेगें।      

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