गुरुवार, 29 जुलाई 2021

क्या ‘‘वरूण’’ भारतीय राजनीति में (विलुप्त होते) ‘‘गांधीज़’’ (नाम) की परंपरा के खेवनहार ‘‘सिद्ध’’ हो पायेगें।

 

प्रधानमंत्री (2.0) का प्रथम बहुप्रतिक्षित मंत्रिमंडल में जम्बों परिवर्तन व विस्तार काफी इंतजार के बाद अंततः हो गया। समस्त योग्य व राजनैतिक रूप से जरूरी व्यक्तियों का किसी भी मंत्रिमंडलीय फेरबदल में पूर्ण रूप से समावेशीकरण; संवैधानिक सीमाएं और राजनैतिक बाध्यताओं के चलते नहीं हो पाता है, यह एक राजनैतिक व व्यवहारिक कटु सत्य है। यह ‘निष्कर्ष’ सिर्फ वर्तमान में हुये मंत्रिमंडलीय फेरबदल से ही नहीं निकलता है, बल्कि इसका इतिहास काफी पुराने समय से चला आ रहा है। परन्तु इस फेरबदल में एक महत्वपूर्ण लोप (ओमिसन) ‘‘गांधी’’ नाम का जरूर हुआ है। वैसे तो ‘‘गांधीज़’’ नाम का स्वतंत्रता के पूर्व से ही कांग्रेस के पर्यावाची शब्द के रूप मंे हमेशा से जाना व जोड़ा जाता रहा है। वर्तमान में गांधीज़ की पुरानी पीढ़ियों में से कुछ नयी पीढ़ियों की गांधीज़ पंजा छोड़कर कमल का फूल लेकर पंजे से ही दो-दो हाथ करने में लग गये है। इनमें महत्वपूर्ण नाम स्व. संजय गांधी की पत्नि व पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी की छोटी बहु श्रीमति मेनका गांधी व उनके सुपुत्र वरूण गांधी का नाम उल्लेखनीय है। वैसे तो पूर्व में गांध़ी परिवार से रिश्तेदारी की वजह से जुड़े स्व. विजया लक्ष्मी पंडित पूर्व राज्यपाल, (इंदिरा गांधी की बुआ) पूर्व केन्द्रीय मंत्री स्व. अरूण नेहरू, (इंदिरा गांधी के भतीजे) व कुछ एक अन्य भी कांग्रेस छोड़ जनता पार्टी व भाजपा के साथ जुड़ चुकें थे। महात्मा गांधी की तीसरी-चौथी पीढ़ी का कांग्रेस से मोह भंग होने की प्रक्रिया भी चालू है। किस किस को सम्हालियेगा? जैसे कि ईरान की एक कहावत है, ’’तन हम दाग, दाग सूद, पंबा कुजा नेहाम’’। अर्थात् सब में दाग ही दाग, है कहाँ कहाँ फाया रखूं। 

‘‘गांधीज़’’ नाम की पृष्ठभूमि का विवरण देने के पीछे उद्देश्य मात्र यह कि ‘‘आयरन कट्स आयरन व डायमंड कट्स डायमंड’’ (लोहा-लोहे को, हीरा-हीरे को काटता है) के सिद्धान्त पर ही शायद भाजपा ने मेनका गांधी को भाजपा में शामिल कर केंद्रीय मंत्रिमंडल में  केबीनेट मंत्री बनाया था। लेकिन मोदी 2.0 के मंत्रिमंडल में मेनका गांधी को शामिल नहीं किया गया था। अब जम्बों मंत्रिमंडल की 78 मंत्रियों की सूची भी एक चर्चित गांधी नाम वरूण गांधी का नाम पढ़ने को नहीं मिला। शेष 4 रिक्त स्थान में यदि उनका नाम है तो, उसकी जानकारी फिलहाल जनता को तो है नहीं? मेनका गांधी के द्वारा प्रेस से चर्चा करते समय इस लगातार उपेक्षा पर उनकी झुझलाहट स्पष्ट रूप से झलकती है, जो स्वभाविक व सही भी दिखती है। उनने कथन किया ‘‘हम 600-650 के करीब सांसद है। ऐसे में प्रधानमंत्री कितनों को जगह देगें?’’ यह बयान देते समय वे शायद यह भूल गई कि मोदी 1.0 मंत्रीमंडल में उन्हे स्वयं को इन 600-650 सांसदों में एक मंत्री के रूप में शामिल किया गया था।  

प्रश्न यह कि क्या आज देश में गांध़ी नाम की उपयोगिता व आर्कषण समाप्त हो गया है? राजनैतिक हल्कों में कांग्रेस के रसातल में जाने का एक बड़ा कारण वर्तमान में राहुल गांधी के नेतृत्व को जिम्मेदार ठहराया जाता है। आज भाजपा में भी गांधी नाम की महत्ता शायद शून्य या समाप्त सी होती जा रही है। एक समय वरूण गंाध़ी भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री हुआ करते थे व उनके उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनाने की जोरदार मांग भी उठी थी। आखि़र इस बदलाव (व बदवहास) की स्थिति के पीछे के कारणांे को समझना ज्यादा मुश्किल नहीं होगा। ऐसा लगता है, भाजपा में आने के बावजूद मेनका व वरूण गांधी भाजपा की मेंटर (रीढ़) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जीवत संपर्क नहीं कर पाये, रख पाये। ’’यत्नम विना रत्नम् न लम्यतें’’। भाजपा की राजनीति में धूमकेतू समान बने रहने के लिये आवश्यक इस कटु सत्य को स्वीकार किया जाना चाहिए। 

ताजा उदाहरण आपके सामने अभी नये-नये भाजपा में आये, कभी पुराने जनसंघी रहे स्व. माधवराव सिंधिया (पहला चुनाव ‘जनसंघ’ टिकिट पर ही लड़ा था) के पुत्र एवं जनसंघ को मजबूत आर्थिक आधार देकर जनसंघ को खड़ा व विस्तार करने वाली स्तम्भ राजमाता स्व. विजयाराजे सिंधिया के पौत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया ने शायद अपनी उक्त पृष्ठभूमि के चलते संघ में भाजपा के ’’लाभकारी’’ प्रभाव को अतिशीघ्र समझ लिया। और उसी भाजपा प्रवेश के बाद से ही ‘‘समिधा’’ ‘‘झंडेवालान’’ (केशव कंुज) और ‘‘डां हेडगेवार भवन’’ संघ कार्यालय क्रमशः भोपाल, दिल्ली एवं मुख्यालय के अर्थ व महत्व को समझकर ‘‘दर्शन’’ व दार्शनिक लाभ प्राप्त करना प्रारंभ कर दिया। इसका सुखद परिणाम यह हुआ कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के जहां न केवल उनके समर्थकोें की लम्बी फौज को पार्टी ने सरकार व संगठन मेें विभिन्न पदों से न केवल नवाजा, बल्कि स्वयं उन्हे भी राज्यसभा में भेजकर सरकार में केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री भी बनाया गया। साथ ही महत्वपूर्ण मंत्रिमंडलीय समिमि का सदस्य भी बनाया गया। तात्पर्य यह है कि ’’जिसे पिया चाहे वही सुहगान’’। वैसे मुझे अच्छी तरह से याद है कि जब ‘‘दीदी’’ (सुश्री उमाश्री भारती) ने ‘‘भाजश’’ बनायी थी व मैं उनकी पार्टी का प्रदेश कोषाध्यक्ष बनाया गया था, तब दीदी बातचीत के दौरान कई बार मुझसे कहती थी ‘‘राजू संघ कार्यालय जाना मत छोड़ना। उन लोगों से विचार विर्मश करते रहना’’।

बात चूंकि ‘‘गांधीज़’’ नाम के भारतीय राजनीति में अस्तित्व को लेकर हो रही थी, वह अभी तो गर्दिश की स्थिति में ही है। वैसे तो हर व्यक्ति की राजनीति में एक निश्चित समयावधि होती है। लोकतंत्र में ‘वंशवाद’ की राजनीति के घोतक एवं पोषक यदि स्वयं या उनके उत्तराधिकारी बदलते समय व परिस्थितियों के अनुसार अपने को नहीं बदल पाते है, तो उनके अस्तित्वहीन का होना खतरा भी लगभग तय सरीका ही है। एक अमेरिकी कहावत के अनुसार ’’हमारी पहचान हमेंशा हमारे द्वारा छोडी गई उपलब्धियों से होती हैै। इसका मतलब यह नही कि ‘‘मेरा पिता ने घी खाया था तो मेरे हाथ सूंधो’’। गांधीज़ नाम के साथ शायद ऐसा ही हो रहा है। क्या यह संभव है कि कांग्रेस में भाजपाई गांधी वापसी होकर कांग्रेस हाईकमान ‘गांध़ी’ का परस्पर नेतृत्व बदला दे? अर्थात ‘वरूण’ गांधी को नेतृत्व सौंप दिया जाए। ’’एक तवे की रोटी, क्या पतली क्या मोटी’’। यद्यपि यह एक बहुत दूर की कौडी है। लेकिन राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं होता है, ऐसा माना जाता है। 

वरूण गांधी की भाजपा में उपेक्षा के कारण घर वापसी की बात तो मीडिया में व राजनैतिक हलको में चर्चा में है। जब भाजपा में  पंजा छाप भाजपाईयों को मुख्यमंत्री, केन्द्रीय मंत्री, राज्यपाल व महत्वपूर्ण पदों से नवाजा जा सकता है तो, कांग्रेस नेतृत्व इस दिशा में अपनी आंख क्यों नहीं खोलता है? खोलना चाहता है? ताकि वह भी अपने पुराने पंजाइयों को भी नेतृत्व दे सके, प्रतिष्ठित कर सके। वैसे कमल छाप कांग्रेसीयों की स्थिति कांग्रेस में बहुत कम है। राजनीति में कहा भी जाता है ‘‘द बेस्ट डिफेंस इज़ ए गुड़ आफेंस’’। इसी को फारसी में कहा जाता हैं कि ‘‘अवसर पर दुश्मन को न लगाया जाए थप्पड़ अपने ही मुँह पर लगता हैं’’। लेकिन कांग्रेस इस मामले में भी फिसड़ी ही साबित हुई है। अतंतः जब तक इस देश के राष्ट्रीय पटल पर कोई विपक्ष की भूमिका निभाने के लिये वात्तविक रूप में राष्ट्रीय पार्टी उभर कर सामने नहीं आती है, तब तक तो विपक्ष के नाम पर कांग्रेस को ही ढ़ोना मजबूरी होगी। 

मजबूत व सफल लोकतंत्र में एक पार्टी के अधिनायकवाद से मजबूत व सक्षम विपक्ष ही निपट सकता है। परन्तु वर्तमान में विपक्ष के नाम पर देश में लगभग शून्य की स्थिति है। यह देश के लोकतंत्र के लिये यह एक खतरे की घंटी है। शायद इसीलिए भाजपा खासकर संघ को इस बात पर सोचने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है कि वह ही अप्रत्यक्ष रूप से विपक्ष का रोल भी प्रभावी व बखूबी अदा करें। सरकार के स्तर पर, पार्टी के स्तर पर भाजपा द्वारा जो भी जन विरोधी नीति, कार्यक्रम व गलतियां हो रही है, चुनावी वादे धरातल पर पूरे नहीं उतर पा रहे है या नीति’ असफल सिद्ध हो रही है अथवा आम जनता सरकार की कार्यप्रणाली से संतुष्ट नहीं है। इन सब कारणों से उत्पन्न नाराजगी व असंतोष से विपक्ष के मजबूत न होने के कारण अंततः स्वयं जनता द्वारा उक्त नाराजगी को झेलने की आशंका के कारण उत्पन्न स्थिति भाजपा व संघ के नियत्रंण से बाहर हो सकती है। आखिर ’’खलक का हलक कौन बंद कर सकता हैं?’’

इसलिए ‘‘संघ’’ ने विभिन्न अनुषांगिक क्षेत्रों में कार्य करने के लिये अनेक संगठन खड़े किये है। किसानों के बीच काम करने वाला ‘‘भारतीय किसान संघ’’, मजदूरों के बीच ‘‘भारतीय मजदूर संघ’’, शिक्षकों के बीच ‘‘शिक्षकों संघ’’ ‘‘स्वदेशी जागरण मंच’’, ‘‘विहिप’’ आदि ऐसे अनेक अनुषांगिक संगठन है, जो जनता के विरोध व मूड़ को भाँपकर विरोध का नेतृत्व अपने हाथों में लेकर ’’सेफ्टी वाल्व’’ के समान स्थिति को अपने नियत्रंण में करते है, कर रहे है व करने का प्रयास करते है। अन्यथा मजबूत विपक्ष के अभाव में व अन्य कोई नेतृत्व न होने की स्थिति में जनक्रांति जैसा जेपी आंदोलन के समय जिस प्रकार की जन क्रांति व जन आंदोलन उत्पन्न हुआ था, वैसा उत्पन्न होने का खतरा भाजपा के सामने हमेशा बना रहेगा। इस पर भी नागरिकों व पाटियों को गहराई से सोचने की आवश्यकता है। और आज जब गांधीज़ समाप्ति की ओर है, तब 1947 के पहले के गांधी की पुनरावतारित करने की कल्पना करना आसान नहीं, बल्कि बेमानी होगी?

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