बुधवार, 12 अगस्त 2020

‘‘सु शांत‘‘ केस ‘‘मोहम्मद साद’’ के ‘‘केस‘‘ के समान कब ‘‘शांत‘‘ होगा?



लोकतंत्र का ‘‘चौथा प्रहरी‘‘ कहे जाने वाले देश के मजबूत मीडिया ने ‘‘सुशांत‘‘ का ‘विग्रह’ कर सुशांत की ‘‘सु‘‘‘‘शांति‘‘, को पूरी तरह से ‘‘अशांति‘‘ में बदल दिया है। कैसे! आइये आगे जानते हैं। 
सुशांत की आत्महत्या के दो महीनों से भी ज्यादा समय व्यतीत हो जाने के बावजूद ऐसा कोई दिन नहीं गया होगा, जब प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक या सोशल मीडिया प्रत्येक में, कुछ न कुछ छप रहा है, दिखलाया जा रहा है, बताया जा रहा है या बोला जा रहा है। क्या मीडिया की यह वैसी ही ‘‘सक्रियता’’ तो नहीं है, जैसा कि न्यायालयों के कुछ मामलों में आए न्यायिक निर्णयों व अपनाई गई प्रक्रिया को लेकर कुछ कानूनविद उसे ‘‘न्यायिक सक्रियता‘‘ का नाम दे देते हैं। इसी को तो ‘‘मीडिया ट्रायल‘‘ कहते है, जहाँ फैसला देने की अनाधिकारिक चेष्ठा की जाती हैं। इस मीडिया ट्रायल ने सामान्य व परिस्थिति जन्य स्थिति में सुशांत की ‘‘शांत मृत्यु’’ ‘‘आत्महत्या’’ जो स्वतः सुखत हैं, की ‘‘गैर अपराधिक‘‘ (दिख रही) घटना को, ‘‘आत्महत्या सिद्ध करने के लिए प्रेरित करने’’ से लेकर हत्या तक के अपराध में बिना किसी ठोस सबूत के बदल दिया है। कोरोनाजन्य बेरोजगारी तथा बाढ़ राहत प्रबंधन की विफलता से घिरी बिहार सरकार के लिए तो सुशांत प्रकरण मानो तपते रेगिस्तान में ‘‘नखलिस्तान’’ (ओएसिस) की बहार लेकर आया है। ऐसे बिहार में होने वाले ‘संभावित’ आम चुनावों के मद्देनजर ‘सुशांत’ की लगातार मीडिया कवरेज से इस बात को पुनः सम्बल मिल गया है कि, मीडिया हाउसेस और राजनीतिक पार्टियों के बीच कितना गहरा नेक्सस (बंधन, गठबंधन, गठजोड़, संबंध, कड़ी, मेल जोल, घाल मेल) विद्यमान होता है।
आखिर सुशांत का इस देश के राजनीतिक सामाजिक और सांस्कृतिक (कल्चरल) क्षेत्र में कितना(?) महत्वपूर्ण योगदान रहा है? परिणाम स्वरूप मीडिया भी लगातार अपना महत्वपूर्ण योगदान  दिए जा रहा है। सुशांत एक ‘‘उभरते हुए’’ और निश्चित रूप से ‘‘सफलता’’ की ओर बढ़ते हुए कलाकार थे, इससे कोई इंकार नहीं। उनकी दुखदाई असामयिक मृत्यु निश्चित रूप से फिल्म उद्योग के लिए एक नुकसान है। परन्तु यह घटना क्या मीडिया में उतनी सुर्खियाँ पाने की अधिकारिणी है, जितनी की टीआरपी व अन्य कारणों के चलते उसे दी जा रही है।  
क्या मीडिया कृपया यह बतलाने का कष्ट करेगा कि, तबलीगी जमात मरकज के अध्यक्ष मोहम्मद साद जिसको शुरू में देश भर की जनता को तेजी से कोरोना संक्रमित करने के लिए बहुत जोर शोर से इसी मीडिया ने जिम्मेदार माना था। स्वयं केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने तत्समय अपनी नियमित संवादाता सम्मेलनों में कोविड़-19 से संक्रमितों की कुल संख्या बतलाते समय देश में संक्रमित तबलीगी जमात मरकज के सदस्यों की संख्या को भी प्रथम से उल्लेख करते रहे। आज उसी मीडिया ने उसे किस ‘कोने’ में रखकर गृह मंत्रालय जिसने इस मामलें में अपनी ‘‘लाईट को स्विच ऑफ’’ कर रिया के सहयोग से विलुप्त कर दिया है? विभिन्न कानूनों के उल्लघंन करने के कारण भिन्न-भिन्न अपराधों के लिये एफआईआर दर्ज करने के सिवाय उसी ‘प्राथमिकी’ के तहत आज तक मोहम्मद साद से कोई पूछताछ तक नहीं की गई है। ‘‘लुकआउट नोटिस’’ जारी करने के बाद आगे उस पर क्या कार्यवाही की गई? जिस प्रकार ‘‘ईडी’’ सुशांत केस में घंटों लगातार बार-बार कई-कई व्यक्तियों से पूछताछ कर रही है। लेकिन ‘साद’’ के मामलें में ‘‘ईड़ी’’ की ‘‘मिनटों’’ की पूछताछ के लिए भी जनता तरस गई। शायद सुशांत केस में अति व्यस्तता के चलते मीडिया के पास प्रश्न पूछने का समय ही नहीं है। इस ‘‘अनबुझे’’ सवाल को जब तक मोहम्मद साद से पूछताछ कर गिरफ्तारी कर प्रकरण को न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में जाने तक मीडिया इसे लगातार क्यों नहीं उठा रहा है? यह समझ से परे है। सुशांत की तुलना में मोहम्मद साद की जांच देश हित में और देश के स्वास्थ्य के लिए ज्यादा जरूरी है। ‘‘अपोजिशन‘‘ (विपक्ष) भी एक बार अपनी ‘‘पोजीशन‘‘ लेकर चुप बैठ गया है। सरकार (‘‘शासन प्रशासन‘‘) ने तो शुरू से ही पूरी तरह ‘‘मौन‘‘ साध लिया था। मीडिया भी इस ‘‘चुप्पी‘‘ व ‘‘मौन’’ पर प्रश्न क्यों नहीं उठा रहा है? शायद मीडिया भी चुप बैठ गया है! क्यों? क्या मीडिया को मौन करा दिया गया है?
दुख विषय इस बात का है कि जनता भी ‘‘मौन’’ पर ‘‘मौन’’ है और ‘‘चिल्लाहट‘‘ पर ‘‘मौन मुस्कुराहट बिखेर‘‘ रही है। मैं भी ‘मौन’ हूं! लेकिन मेरी लेखनी ‘मौन’ नहीं है। लेख समाप्त करने के पूर्व सुशांत केस के कुछ तथ्यों का उल्लेख करना सामियिक होगा। ताकि उक्त प्रकरण की वास्तविक वैधानिक स्थिति आपके सामने स्पष्ट हो सकें।
सुशांत केस में महत्वपूर्ण पहलू पटना में सुशांत के पिताजी के के सिंह की शिकायत आवेदन पर तुरंत फुरंत में बिना प्रारंभिक जांच के प्राथमिकी दर्ज होना है। जिसने पूरे मामलें को ‘‘एक राजनैतिक’’ मोड़ दे दिया है। चंूकि सुशांत बिहार के मूल निवासी थे। जहां पर निकट भविष्य में आम चुनाव होने की प्रबल संभावनाएं है। (क्योंकि आम चुनाव की नियत समय देय (ड्यू) हो गई  है) सुशांत के पिताजी के के सिंह के द्वारा मुंबई पुलिस के पास प्राथमिकी दर्ज करने हेतु कोई लिखित शिकायत नहीं भेजने (बावजूद इसके कि मुंबई पुलिस उक्त प्रकरण में कोई कार्यवाही नहीं कर रही है) के बाद पटना पुलिस का अधिकतम अधिकार क्षेत्र व दायित्व मात्र उक्त लिखित शिकायत पर जीरों पर प्राथमिकी दर्ज कर मुंबई पुलिस को हस्तांतरित कर देना ही है। अधिकतम सिर्फ तथाकथित अवैध पैसे वसूली के आरोप (धारा 383) को लेकर ही पटना मे प्राथमिकी दर्ज की जा सकती है। 
मुंबई पुलिस द्वारा पटना एसपी को क्वांरटाइन कर देने से मुंबई पुलिस की कार्य प्रणाली के संदेह के घेरे में आ जाने से निश्चित रूप से निष्पक्ष जांच होने पर एक प्रश्नचिन्ह अवश्य लगा रहा है। सुशांत के परिवार के पास एकमात्र सही व कानूनी तरीका व विकल्प यही बचा था कि, मुंबई पुलिस के उक्त टाल मटोल रवैये के कारण उस पर अविश्वास की स्थिति निर्मित रहने से सही जांच के लिए वे न्यायालय का दरवाजा खट खटाते। जहां वे न्यायालय से प्रकरण की जांच के लिये एक एसटीएफ के गठन की मांग न्यायालय की निगरानी में जांच के लिए निवेदन कर सकते थे। अथवा सीबीआई जांच की मांग कर सकते थे। लेकिन सक्षम न्यायालय के न्यायिक आदेश के बिना पटना पुलिस क्रमांक देकर प्राथमिकी दर्ज नहीं कर सकती है। यह कानूनी व वैधानिक स्थिति उच्चतम न्यायालय ने कई बार अपने निर्णयों में स्पष्ट की है। ऐसा लगता है कि महाराष्ट्र सरकार के असहयोगात्मक रवैया खासकर पटना एसपी को क्वांरनटाइन कर देने के कारण उच्चतम न्यायालय संभवतः एक दो दिनों मे उक्त प्रकरण में एसटीएफ गठित कर हाईकोर्ट की निगरानी में जांच के आदेश दे सकता है। या न्याय हित में सीबीआई को प्रकरण जांच हेतु सौंप सकता है। परन्तु उक्त मामले को बिहार पुलिस को केस स्थानंतरित करने के आदेश की संभावना न के बराबर है। क्योंकि इसमें दूसरे पक्ष को भी न्याय मिलने में आशंका के बादल हमेशा छाये रहेगें। 

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