गुरुवार, 13 अगस्त 2020

यह देश की ‘‘नीति’’ नहीं ‘‘राजनीति’’ है और शायद यही ‘‘नियति’’ भी है।

राजस्थान में अंततः सचिन पायलट खेमे की घर वापसी हो गई। यही कहा जा सकता है कि, ‘‘न माया मिली न राम’’ और ‘‘लौट के बुद्धू घर को आए’’। ‘‘सुबह का भूला शाम को घर आये’’ की स्थिति पायलट की नहीं थी। लेकिन ‘‘बुद्धू‘‘ सिर्फ पायलेट ही नहीं बने, बल्कि राजस्थान की भाजपा पार्टी की ‘‘न खुदा ही मिला न विसाले सनम’’ की स्थिति होकर कुछ बुद्धू बनकर उन पर भी थोड़े बहुत छीटें पड़े। महाराष्ट्र में खायी ‘‘विफलता’’ से सबक लेेकर सावधानी बरतते हुये अतिरिक्त होकर अतिउत्साह न दिखाते हुये ‘मध्यप्रदेश’ जैसी नीति अपनाई गई, जिस कारण से पार्टी ने स्वयं को गुनाह बेलज्ज्त होने से स्पष्टरूप से बचा लिया। शायद आंकडों के साथ परिस्थितियाँ एवं सचिन के तुलनात्मक रूप से सिंधिया से कमोत्तर होने के कारण भाजपा को शायद अपेक्षित सफलता नहीं मिल पायी। 
विधानसभा सत्र प्रारंभ होने की पूर्व संध्या को ही राजस्थान भाजपा विधायक दल के नेता गुलाबचंद कटारिया का बयान आया है कि वे 14 तारीख को शुरू होने वाले मानसून सत्र में अशोक गहलोत सरकार के विरूद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाएंगे। क्या यह ‘‘खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे’’ को चरितार्थ तो नहीं कर रही है? ज्यादा समय व दिन नहीं बीते है, जब पत्रकारों द्वारा कूरेद-कूरेद कर पूछें जाने पर भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सतीश पुनिया एवं नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया ने अविश्वास प्रस्ताव लाने से साफ-साफ इंकार कर दिया था। यह कहकर कि न तो हमारे पास बहुमत है और न ही हमारा कोई इरादा अविश्वास प्रस्ताव लाने का है। बल्कि इसके विपरीत मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा राज्यपाल से विश्वास मत प्राप्त करने के लिए सत्र बुलाने के किये गये अनुरोध पर प्रदेश भाजपा द्वारा यह कहकर आपत्ति की गई थी कि, जब मुख्यमंत्री के पास बहुमत का आंकड़ा है और भाजपा अविश्वास प्रस्ताव नहीं ला रही है तब विश्वास मत की क्या एवं क्यों आवश्यकता है। भाजपा का यह कथन व रुख उस स्थिति में था, जब 18 विधायक सचिन पायलेट के साथ राजस्थान से दूर भाजपा की हरियाणा सरकार की ‘‘मेहमान नवाजी की सुर्दृढ़ निगरानी‘‘ में थे। जिनके खिलाफ उनकी सदस्यता समाप्त करने के आवेदन स्पीकर के पास लम्बित थे। पायलट समर्थकों 19 विधायकों के वापस आने के बाद, गहलोत और पायलट के आजू बाजू में एक साथ खडे़ होकर हाथ मिलाते हुए फोटो सेशन के पश्चात और पायलट के कांग्रेस में बने रहने के सार्वजनिक बयान के बावजूद अचानक भाजपा के पास कौन सा आंकड़ों का जादू आ गया है? जिसके चलते राजस्थान भाजपा ने गहलोत सरकार के विरूद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाने का निर्णय लिया है। दिमाग काम नहीं करता है। वैसे राजनीति में दिमाग कम ‘’साम’ ‘दाम’ ‘दंड’ ‘भेद’’ ही ज्यादा चलता है। तथापि यह बात भी उतनी ही सही है कि भाजपा को वैधानिक और राजनीतिक दृष्टि से कभी भी अपनी सुविधानुसार अविश्वास प्रस्ताव लाने का पूरा अधिकार है।
राजस्थान की ‘‘नेतागिरी में जादूगरी‘‘ चलती है। मुख्यमंत्री स्वयं ‘‘जादूगरी’’ का कथन कह चुके है व ‘‘सिद्ध‘‘ भी कर चुके है। देश की केंद्रीय सरकार व विभिन्न राज्य सरकारें सिर्फ कोरोना संक्रमितों के मामले में ही आंकडों के खेल की बाजीगरी नहीं कर रही है। बल्कि राजनीति में भी आंकड़ों का ‘‘खेल’’ बखूबी चला आ रहा है। राजस्थान की उक्त घटना ने इस बात को पुनः सिद्ध कर दिया है। अपने 76 अंक में बागी 19 जोड़ने के बाद भी भाजपा बहुमत का दावा नहीं कर रही थी। तो फिर कांग्रेस के 102 के अंक में वापस हुये बागियों की 19 संख्या और जोड़ने के बाद कुल ‘अंकगणित’ भाजपा को अविश्वास प्रस्ताव लाने का नैतिक अधिकार कैसे दे सकता है, जो अधिकार पहले अधिक सुविधा युक्त आंकड़ों के बावजूद ‘‘अंतरात्मा‘‘ के चलते नहीं था। यदि इन आंकडों में आपने जरा सा भी अपना दिमाग खपाया, तो आप चक्कर खा जायेगें और राजनितिज्ञों द्वारा पागल करार दे दिये जायेगें। इसलिए इन राजनैतिज्ञों की राजनैतिक बातों, चालों और संख्या बल के आंकडों को उनके बीच में ही रहने दीजिये और आप अपने दिमाग की शांति के लिए ‘‘दर्शक दीर्घा‘‘ से हट जाये। यही आपके हक व हित में होगा, दीर्घा में खड़ा दर्शन लाभ लेता हुआ मूक दर्शक को भी नेता अपनी भीड़ तंत्र का एक हिस्सा ही मानता है। क्योंकि शायद लोकंतत्र की दशा व दिशा तय करने वाले भी आपसे यही अपेक्षा चाहते है रखते है, व करते है। यद्यपि मैं आपको अवश्य उक्त सलाह दे रहा हूं। परन्तु स्वयं उसका पालन नहीं कर पा रहा हूं। शायद ‘‘पृष्ठभूमि‘‘ के चलते! ‘‘राजनीति का कीड़ा‘‘ काटने के कारण जाने अनजानेे में लेखनी तो ही ‘स्वयं‘ चल पड़ती है।  
धन्यवाद।

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