मंगलवार, 17 जनवरी 2017

आम बजट को प्रस्तुत करने के विरोध का कोई संवैधानिक, कानून या नैतिक बल नहीं!

                                                     
स्वतंत्र भारत के इतिहास में प्रारंभ से ही बजट पेश करने की परम्परा 28-29 फरवरी की रही हैं। पिछले वर्ष बजट पेश करने के बाद जी.एस.टी को यथा संभव 1 अप्रेल 2017 से लागू करने  के प्रयास (आज ही 1 जुलाई से लागू करने की आम सहमति बनी हैं) के तहत यह बात ध्यान में लाई गई कि बजट थोड़ा पहले पेश होना चाहिए ताकि उसके प्रस्ताव समय के पूर्व पारित होकर अविलंब नया आर्थिक साल शुरू होते ही 1 अप्रेल से प्रभावशाली ढंग से लागू हो सकंे। इस कारण जब इस वर्ष बजट प्रस्तुत करने की तारीख 1 फरवरी निश्चित की गई तब उसका किसी ने किंचित भी विरोध नहीं किया था। लेकिन जैसे ही उत्तर प्रदेश व चार अन्य प्रदेशो की चुनाव तारीख घोषित की गई तब विभिन्न राजनैतिक दलो ने उक्त प्रस्तावित 1 फरवरी केे बजट प्रस्तुतीकरण का इस आधार पर विरोध किया हैं कि उससे पांच प्रदेशों में होने वाले चुनावो में केन्द्रीय सरकार द्वारा बजट के माध्यम से संभावित विभिन्न लाभदायी योजनाओं की घोषणा के द्वारा अपने (सत्ताधारी) दल के पक्ष में वोटरो को प्रभावित व आकर्षित करके चुनाव परिणाम को प्रभावित करने का अनैतिक प्रयास किया जावेगा, जो न केवल अनुचित होगा बल्कि उससे सत्ताधारी पार्टी को एक पक्षीय फायदा भी पहंुचेगा। वास्तव में राजनैतिक पार्टियो का उपरोक्त विरोध पूर्णतः बेमानी हैं एवं केवल राजनैतिक हैं। जिस प्रकार चुनाव एक संवैधानिक व्यवस्था हैं उसी प्राकर बजट प्रस्तुतीकरण भी एक संवैधानिक व्यवस्था हैं। संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार केन्द्रीय चुनाव आयोग देश एवं प्रदेशों में समय-समय पर चुनाव कराते रहता हैं। स्थानीय निकाय संस्थाओं के चुनाव एवं सहकारी संस्थाओं के चुनाव भी देश के विभिन्न भागो में निरंतर चलते रहते हैं। अतः यदि उपरोक्त तर्क मान लिया जाये तो कोई भी चुनी हुई सरकार उसमें निहित पूर्ण संवैधानिक अधिकारों के साथ उसके सम्पूर्ण कार्यकाल में अपेक्षित विकास कार्यो के सम्पादन हेतु अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं कर सकती हैं। 
एक समय था जब देश एवं प्रदेशों में पांच वर्ष की एक निश्चित अवधि के लिये लोकसभा व विधानसभाओं के चुनाव पूरे देश में एक साथ होते थे। लेकिन समय के साथ अब पानी काफी बह चुका हैं व स्थिति बदल चुकी हैं। अब यदि पूरे देश की राजनैतिक स्थिति का आकलन किया जाय तो देश में लोकसभा से लेकर विधानसभा व विभिन्न निकाय व सहकारी संस्थाओं के चुनाव की प्रक्रिया लगभग पूरे पंाच वर्ष तक कही न कही सतत् चलती रहती हैं। फिर चाहे वह केन्द्रीय चुनाव आयोग, या राज्य चुनाव आयोग, अथवा स्थानीय चुनाव निकायों के मातहम ही क्यों न हो। कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि चुनाव के एक दम पहले वोटर को प्रभावित/आकर्षित करने की दृष्टि से विभिन्न लाभकारी योजनाओं की घोषणा से वोटर प्रभावित हो सकता हैं, और इस तरह चुनाव परिणाम भी प्रभावित हो सकते हैं। यह तर्क कानूनी व संवैधानिक दृष्टि से निश्चित रूप से सही नहीं हैं। शायद इसी सोच के अंतर्गत चुनाव आयोग भी 45 दिन पूर्व ही आचार संहिता लागू कर देता हैं जिसके तहत वह सरकारों को नई घोषणा व आफिसरों के स्थानांतरण करने से रोक देता हैं। हमारे देश में सर्व प्रथम आचार संहिता संभवतः 1962 के केरल विधानसभा के चुनाव में लागू हुई थी।  
एक चुनी हुई सरकार जो पांच वर्ष के लिये चुनी जाती हैं, का उक्त तर्क के आधार पर विरोध करने वाले राजनैतिक दल इस तथ्य से मॅंुह मोड़ लेते हैं कि जब तक सरकार को 45 दिनों पूर्व ही अपने पूर्ण अधिकारो का उपयोेग करने से रोक लगा कर (मतदाताओं को घोषणाओं से प्रभावित करे बिना) चुनाव में धन-बल, जाति व धर्म के उपयोग को सम्पूर्ण रूप से रोका नहीं जाता हैं, तब तक पूर्णतः निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं हैं। वास्तव में यह धारणा ही संविधान की मूल भावना के विरूद्ध हैंे। ’’कोई भी सरकार अपने घोषणा पत्र एवं नीतियो के क्रियान्वयन के आधार पर ही जनता के बीच जाकर वोट व पुनः जनादेश मांगती हैं’’ जो उसका संवैधानिक अधिकार हैं। आने वालेे कार्यकाल की पंचवर्षीय योजना के साथ ही वह जनता के बीच जाती हैं। मतदाताओं को यह राजनैतिक दलों द्वारा यह आश्वासन नहीं दिया जाता कि घोषणा पत्र की पूर्ति 4 वर्ष 320 दिवस में ही पूर्ण हो जायेगी और न ही जनता उसेे केवल 4 वर्ष 320 दिन के शासन करने के लिये वोट देती हैं। यहॉं यह भी विचारणीय हैं कि कोई सरकार यदि 4 वर्ष में अपने घोषणा पत्र को लागू नहीं कर पाई हैं तो क्या वह चुनाव के तुरंत पहले 45 दिनों में विभिन्न योजनाओं की घोषणा मतदाताओं के बीच विश्वास बनाने में सफल होगाी। क्या यह स्थिति एक गंभीर प्रश्न को जन्म नहीं देती हैं? क्या हमे हमारे मतदाताओं के विवेक व नैतिकता पर भरेासा नहीं हैं? क्या हमारे मतदाता लालच में आ जाते हैं? और यदि यह मान भी लिया जाये तो 45 दिन के पहले लालच देने की घोषणा के इस भाग को चुनाव आयोग की आचार संहिता के तहत अप्रभावी किया जा सकता हैं? 
जनता को निश्चित ही इस बात के लिये शिक्षित करने की आवश्यकता हैं कि वोट आपके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अधिकार हैं। इसके द्वारा आप यह तय करते हैं कि आप किस तरह से शासित होना चाहेंगे व आप पर किस तरह का शासन हो जो आपके जीवन को श्रेष्ठ एवं प्रभावकारी बना सके।.इसीलिए बजट का चुनाव के समय प्रस्तुतीकरण का विरोध बेमानी एवं अप्रंासगिक हैं। आवश्यकता तो सिर्फ मतदाता को एक सही व्यक्ति/दल के पक्ष में बेइमानी परिस्थियों से प्रभावित हुये बिना मतदान करने के लिये जागरूक करने की हैं। 
शायद इसी विवाद को खत्म करने के लिये प्रधानमंत्री मोदी ने लोकसभा व विधानसभा चुनाव एक साथ कराये जाने की वकालत की हैं। उच्चतम् न्यायालय ने भी अभी तक उक्त मुद्दे पर कोर्इ्र स्थगन (स्टे) जारी न करके यह इंगित किया हैं कि ‘बजट’ का चुनाव से कोई सीधा संबंध नहीं हैं। यहॉं अमेरिका के प्रेसीडेंट के चुनाव का उल्लेख करना प्रासांगिक होगा कि वहॉ पर प्रेसीडेंट के चुनाव परिणाम घोषित हो जाने के बावजूद लगभग 3 माह (20 जनवरी तक) पूर्ण अधिकार के साथ प्रेसीडेंट पद पर कार्य करते रहेगे। भले ही वे या उनकी पार्टी की चुनाव में हार भी हो गई हो जैसा कि वर्तमान में प्रेसीडंे़ट बराक ओबामा की स्थिति अमेरिका में चार वर्ष की पूर्व निश्चित अवधि के लिये चुनाव होता हैं शतथ की तारीख भी निश्चित 20 जनवरी रहती हैं। लेकिन भारत में चुनी हुई सरकार के कार्य काल की अवधि कार्यकाल के पूर्व ही आचाार संहिता के माध्यम से चुनाव अवधि (कार्यकाल) के पूर्ण (समाप्ति) के 45 दिन पूर्व ही निर्णय पर प्रतिबंध लगाया जाकर चुनाव कराया जाता हैं। इस प्रकार वास्तविकता में चुनी हुई सरकार का 45 दिन का कार्यकाल प्रभावी रूप से कम हो जाता हैं। यहॉं यह तथ्य रेखांकित करना आवश्यक हैं।  
  
 धन्यवाद्।   

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