रविवार, 12 जून 2016

‘‘जमानत एक ‘‘रूल’’ हैं’’ कितनी वास्तविकता! कितनी सतही ?

माननीय उच्चतम् न्यायालय ने लगातार अपने अनेक निर्णयों में आपराधिक विधिशास्त्र का यह सिद्धान्त प्रतिपादित किया हैं कि जमानत एक नियम (रूल) हैं, जेल एक अपवाद हैं (अनेक निर्णयों में से एक संजय चन्द्र वि. सी.बी.आई.) न्यायपालिका का यह एक चिरपरिचित सिंद्धान्त हैं। लेकिन क्या वास्तविक धरातल में भी ऐसा ही हैं, यह जानने की अत्यंत आवश्यकता हैं। विगत कुछ समय पूर्व हसन अली को 5 साल जेल में रहने के बाद माननीय न्यायालय द्वारा आरोपो से मुक्त कर जेल से रिहा कर दिया गया। इन 5 सालो में हसन अली की 13 जमानत याचिकाएॅं अस्वीकार हुई हैं। इसलिए यह प्रश्न उत्पन्न हुआ हैं। हसन अली वही व्यक्ति हैं जिसके विरूद्ध कालेधन को हवाला के माध्यम से सफेद बनाने का आरोप जॉच एजेंसी ने लगाया था व आयकर विभाग ने उस पर 34000 करोड़ रू. की आयकर की देनदारी निकाली थी जो बाद में आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण ने घटा कर मात्र 3 करोड़ रू. तक सीमित कर दी थी। 
मुंबई के मझगांव डॉक पर काम करने वाले मैकेनिकल इंजीनियर मोहम्मद सलीम अंसारी को तो 23 साल जेल में रहने के बाद हाल में ही माननीय उच्चतम् न्यायालय के द्वारा आरोपो से दोष मुक्त कर दिये जाने के बाद रिहा किया गया हैं। मध्यप्रदेश के व्यापम कांड में बंद सैकड़ो विद्यार्थी व उनके परिजन जमानतों का मामला एक बड़ा उदाहरण है जहां जमानत के अधिकार पर किस तरह के प्रयोग, उपयोग व दुरूपोग हुये है। व्यापम कांड के साथ-साथ इन मामलों में गिरफ्तार अभियुक्तों की जमानत के मामलो की जॉच किसी एजेन्सी या आयोग गठन के द्वारा किया जाना आवश्यक है ताकि ‘जमानत’ के पीछे छुपे तथ्यों का उजागर हो सके। इस तरह के देश में अनेकोनेक मामले हैं जिनमंे जमानत न मिलने के कारण अभियुक्त सालो साल जेल में रहकर मुकदमा लड़ते रहते हैं व अंत में जब दोष मुक्त हो जाते हैं तो उनके वास्तविक जीवन में उसका कोई अर्थ ही नहीं रह जाता हैं। 
भारतीय विधिशास्त्र आपराधिक मामलों में भारतीय दंड संहिता व दंड प्रक्रिया संहिता इस अवधारणा व परसेप्शन (अनुभूति) पर टिका हैं कि अभियोगी/आरोपी तब तक निर्दोष हैं जब तक उसे सक्षम न्यायालय द्वारा दोषी साबित नहीं कर दिया जाता हैं। अपवाद स्वरूप कुछ अपराधों को छोड़ दिया जाय तो अन्य समस्त आपराधिक मामलो में दोषी सिद्ध होने तक अभियोगी बेगुनाह  (इनोसेंस) माना जाता हैं व अभियोजन को उसे संदेह से परे अपराध/आरोप सिद्ध करना होता हैं। संदेह का लाभ भी अभियुक्त को ही मिलता हैं। भारतीय न्यायपालिका का यह सर्वमान्य सिंद्धान्त हैं कि चाहे सौ आरोपी न्यायिक प्रक्रिया के परिपालन में छूट जांए, लेकिन एक भी निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिये। न्याय का एक और सिंद्धान्त हैं न्याय में देरी, न्याय के इंकार के समान हैं। यही सब मिलकर देश में अपराध बढ़ने का मूल कारण भी बन गए हैं।   
यदि हम भारत की न्यायिक व्यवस्था का अध्ययन करे तो हम पायेगें कि भारत में सजा का  अनुपात औसतन 45 प्रतिशत हैं जो अन्य राष्ट्रो की तुलना में कम हैं। मलेशिया में 80 प्रतिशत, इंग्लैड़ में 86 प्रतिशत, अमेरिका में 93 प्रतिशत, इंडोनेशिया में 100 प्रतिशत हैं जबकि पड़ोसी देश बांग्लादेश में 38 प्रतिशत हैं। इसका मूल कारण 1973 से चली आ रहा दंड प्रक्रिया सहिंता में वक्त के साथ आवश्यक बदलाव की कमी, जटिल न्यायिक प्रक्रिया, वकीलों के दाव-पेच, न्यायधीशो की कमी, न्याय में अत्यंत देरी व अभियोजन द्वारा की गई जॉंच में खामी की कमी और इन सभी तंत्रों में संलग्न व्यक्तियों में से अधिकांशो का मात्र आर्थिक उद्देश के लिये कार्य करना इत्यादि हैं। इन सब कारणों से अधिकतर अपराधी न्यायालय से आरोपो से छूट जाते हैं। एक स्टडी के अनुसार भारत में विभिन्न उच्च न्यायालयों में कुल 1035743 आपराधिक मुकदमें लम्बित हैं (31.11.2015 तक)। तब यह वास्तविकता लिये हुये न्यायप्रणाली में जब अभियुक्त को जमानत नहीं मिलती हैं तो वह अनावश्यक रूप से जेल में पडे़ पडे़ सड़ता रहता हैं व कई बार तो कानून में अपराध के लिये दी गई सजा की अवधि से ज्यादा उसकी हवालात में बंद रहने की अवधि बीत जाती हैं। अंततः जब वह अदालती आदेश द्वारा दोष मुक्त हो जाता हैं, तब उसका कोई मतलब ही नहीं बच जाता हैं। तब तक तो वह हवालात में जिन्दगी का लम्बा समय गुजार चुका होता हैं जो उसे किसी भी स्थिति में वापिस नहीं किया जा सकता हैं।
इसी कारण से माननीय उच्चतम् न्यायालय को उपरोक्त अलिखित नियम जमानत एक नियम हैं को वास्तविक धरातल पर उतारने के लिये अधीनस्थ न्यायालयों की अविरल गहरी निगरानी करते रहना अत्यंत आवश्यक हैं, ताकि दंड़ प्रक्रिया संहिता के द्वारा नागरिक के जीने के स्वतंत्रता के अधिकार में (जमानत न मिलने के कारण) अनावश्यक रूप से कटौती न हो।
निष्कर्ष में, ऐसी वर्तमान न्यायिक व्यवस्था में जमानत पाना अपराधी का एक अधिकार होना चाहिये। कुछ अति गंभीर प्रकार के अपराध व राष्ट्रद्रोह के अपराधों के लिये निश्चित अवधि के निवारण निरोध का अधिकार शासन के पास ही हैं जिसमें सामान्यतः जमानत के प्रावधान नहीं होते हैं। ऐसे अपराधों को छोड़कर शेष के लिये जमानत सुनिश्चित करने के लिये ऐसी न्यायिक व्यवस्था में आवश्यक संशोधन किया जाना आज के वक्त की मांग हैं। जब तक न्यायिक व्यवस्था अपनी समस्त कमियों को दूर कर अपने को पूर्णतः सुधार नहीं लेती, इंतजार करना ही नियति हैं। 
  

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपने न्याय व्यवस्था की बहुत बड़ी कमज़ोरी पर आम आदमी का ध्यान दिलाने की सही कोशिश की है। आवश्कयता है इसे एक आंदोलन का रूप देने की।

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  2. आपने न्याय व्यवस्था की बहुत बड़ी कमज़ोरी पर आम आदमी का ध्यान दिलाने की सही कोशिश की है। आवश्कयता है इसे एक आंदोलन का रूप देने की।

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