बुधवार, 13 जून 2012

‘‘ब्लेक-ब्लॉक्ड मनी बिकॅम्स करप्ट मनी‘‘?

‘कालाधन’ और ‘भ्रष्टाचार’ दो ऐसे शब्द है जिनका उपयोग देश के राजनीतिक लोग परस्पर एक दूसरे पर आरोप लगाते समय एवं गैर राजनीतिक लोग भी विभिन्न फोरमों में चर्चा के दौरान धड़ल्ले से करते है। बाबा रामदेव ने फिर हुंकार भरी है कि देश के बाहर जमा कालाधन वापस देश में लाकर देश को खुशहाल बनाएंगे। बार-बार लगातार प्रभावी आंदोलन करने के बावजूद इस दिशा में उन्हे कुछ खास सफलता नही मिल सकी है। इससे भी बड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या कालाधन वापिस आ जाने पर देश खुशहाल हो जायेगा व क्या जन लोकपाल कानून बनने पर भ्रष्टाचार समाप्त हो जावेगा। सिर्फ अनशन पर बैठना, रैली करना, आंदोलन करना और आरोप प्रत्यारोप लगना तथा भ्रष्टाचार विरोधी कानून बनाने से न तो इस देश मेें भ्रष्टाचार कम हुआ है न ही आगे कम होगा। इससे एक वातावरण बनाने में तो सहायता मिल सकती है लेकिन इसमें अंतिम सफलता तभी मिल सकती है जब हम इसके जड़ में जाकर जहां भ्रष्टाचार व कालाधन पैदा होता है पर उक्त बने हुए वातावरण के प्रभाव के द्वारा चोट न करे। बाबा का देश के बाहर का कालाधन व अन्ना का भ्रष्टाचार का मुद्दा पृथक-पृथक होने के बावजूद पारस्परिक संबंधित है, क्योंकि भ्रष्टाचार ही मूल रूप से कालेधन का जन्मदाता है। 
बात कालेधन को वापस लाने की है जैसा बाबा रामदेव कहते है। इस देश का कितना कालाधन बाहर है इसका कोई प्रामाणिक आकड़ा किसी के पास नहीं है। उक्त कालाधन बाबा किस प्रकार भारत मंे वापस ला सकते है इसकी भी कोई स्पष्ट प्रभावशाली व्यवहारिक एवं संभव कार्य योजना जनता के सम्मुख प्रस्तुत नहीं गई है। तर्क के लिए मान लिया जाए अरबो खरबो रूपये का कालाधन देश के जो बाहर है बाबा के आंदोलन से उत्पन्न शक्तिपुंज की ऊर्जा के प्रभाव से देश में आ भी जाये तो देश का भला किस प्रकार होगा यह एक गंभीर विषय है। देश की वर्तमान समस्या अर्थ (धन) की किल्लत नहीं है बल्कि जो भी उपलब्ध धन है वह ऊपर से लेकर नीचे तक आवश्यकतानुसार जरूरतमंद लोगो को पूरा का पूरा पहुंच जाये यह समस्या है। इस देश की जनता को ध्यान है कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने यह कहा था कि विभिन्न योजना के लिए जो पैसा ऊपर से नीचे जाता है उसमें से मात्र 15 प्रतिशत धन ही वास्तविक हितग्राहियों तक पहुचता है शेष पैसा भ्रष्टाचार में चला जाता है।
बाबा रामदेव को इस बात का ध्यान रखना होगा कि राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल से लेकर आज तक भ्रष्टाचार बढ़ा है कम नहीं हुआ है अर्थात 1 रूपये का 15 पैसा भी अब नहीं मिल रहा है। इसलिए यदि अरबो खरबो का कालाधन देश में वापिस आ भी गया तो वह जनता के बीच विभिन्न योजनाओं के माध्यम से उत्पादन के माध्यम से वर्तमान सिस्टम में सुधार लाये बिना यदि वितरित किया जाएगा तो उसका भी वही हाल होगा। अर्थात मात्र 10-12 प्रतिशत पैसा ही वास्तविक लोगो को मिल पाएगा। शेष धन भ्रष्टाचार को बढ़ाने में ही सहायक सिद्ध होगा। अतः हमारा तथाकथित पैसा जो कालाधन के रूप में बाहर रखा है वह देशी भ्रष्टाचारियो के चंगुल से दूर होने के कारण ही बचा हुआ है उसे लाने की जल्दबाजी क्यो? पहले बाबा व अन्ना देश में ऐसा वातावरण क्यों नहीं बनाते कि देश के वर्तमान सिस्टम में ऐसे चमत्कारिक परिवर्तन हो जाए कि लोगो की बेईमानी की प्रवृत्ति व भावनाएं बदलकर लोग ईमानदारी को ओढ़ ले ताकि कम से कम इस धन का सही बटवारा हो सके। जब हम 85 प्रतिशत भ्रष्टाचार की बात करते है तो उसके दो अर्थ निकलते है कि देश का 85 प्रतिशत वर्ग भ्रष्टाचारी हो गया है या 85 प्रतिशत पैसा मात्र कुछ लोगो के बीच एकत्रित हो गया है। जब हमारे देश में लाखो करोड़ो रू. में सैकड़ो घोटाले हो रहे है जिससे यह सिद्ध होता है कि यह भ्रष्टाचार का 85 प्रतिशत पैसा मात्र 15 प्रतिशत लोगो के बीच ही जा रहा है। यदि बाबा-अन्ना अपने इस मुहिम में असफल हो जाते है, इस देश के लोगो को ईमानदार नहीं बना सकते है तो कम से कम भ्रष्टाचार का समाजवादी में विकास हो जाए ताकि 85 प्रतिशत जनता को समान रूप से लाभ पहुचे। 
संक्षिप्त में हर आन्दोलन का अगला कदम रचनात्मक कदम होता है जो उस आंदोलन से उत्पन्न प्रभाव व उर्जा का उपयोग कर उसे एक रचनात्मक मोड़ देकर उस उद्वेश्य को प्राप्त करता है जिसके लिए आंदोलन किया गया था। यह सोच फिलहाल उन नेताओं में नहीं दिख रही है। कहने का मतलब यह है कि वास्तव में देश के नागरिको को बलात मात्र नैतिक शिक्षा देने की आवश्यकता है। बाबा व अन्ना को अपनी हर सभा में विचार गोष्ठी में शिविर में एक नैतिक शिक्षा का शिविर अवश्य लगाना चाहिए जिसमें वे नैतिक शिक्षा का पाठ न केवल जनता को दे बल्कि उनकी उक्त शिक्षा देने वाली टीम को भी (जिनका नैतिक स्तर पढ़ने वालो से तुलनात्मक रूप से उंचा है।) तब तक पढ़ाए जब तक कि उन्हे यह विश्वास नहीं हो जाता है कि परिस्थितियों में गुणात्मक परिवर्तन हो गया है। मैं सोचता हूं कि यही देशहित में होगा।
(लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष है)

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