शुक्रवार, 27 मई 2011

कहीं "बाबाजी" का नाम भ्रष्टाचारियों को संरक्षण तो नहीं दे रहा है?



''बाबा रामदेव" की मध्यप्रदेश यात्रा प्रारंभ हो गई एवं बहु प्रतिक्षित बैतूल एवं छिंदवाड़ा के योग शिविरो का सफल आयोजन हो गया। 'बाबा" ने 'योग" के साथ पुन: वही 'भ्रष्टाचार" के विरूद्ध लड़ाई और देश के बाहर का ''कालाधन" देश में वापस लाने की वकालत की। इसके लिए दिल्ली में दिनांक ०४ जून २०११ से सत्यागृह की अपनी प्रतिबद्धता पुन: घोषित की। बाबा ने उसमें एक लाख से अधिक व्यक्तियों के सत्यागृह में शामिल होने की उम्मीद जतायी और सौ करोड़ भारत वासियों की भ्रष्टाचार की उनकी इस मुहिम के समर्थन की बात भी 'बाबा" पूर्व में कह चुके है। 
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मैं यह उम्मीद कर रहा था कि 'बाबा" जब शिविर में आयेंगे तो वे इस तरह का कोई प्रयास करेंगे की भ्रष्टाचार विरोधी उनकी इस मुहिम में वे सिर्फ उन स्वच्छ लोगो का ही साथ लेंगे जो इस बात का दावा कर सकते है कि भ्रष्टाचार से उनका कोई लेना देना नहीं रहा है व जनता के बीच उनकी एक ईमानदार स्वच्छ, व्यक्ति की प्रतिछाया (बिम्ब) है। बैतूल शिविर में जो सात-आठ हजार लोग शामिल हुए क्या वे सब भ्रष्टाचार से दूर है, रहित है, घृणा करते है, यह दावा क्या 'बाबा" कर सकते है? आयोजकगण कर सकते है? या उनको देख सुन रही जनता कर सकती है? क्या उन्होने कोई 'तंत्र" (सिस्टम) बनाया है कि ''भारत स्वाभिमान ट्स्ट" का सदस्य सिर्फ ईमानदार व्यक्ति ही बन सके? क्या ऐसा कोई उदाहरण बाबा ने प्रस्तुत किया है कि भ्रष्टाचार के आधार पर उन्होने किसी सदस्य को भारत स्वाभिमान ट्रस्ट की सदस्यता देने से इनकार किया हो? यदि नहीं तो भ्रष्टाचार के विरूद्ध उनकी लड़ाई कितनी सही सार्थक व परिणामात्मक होगी, प्रश्र यह है। 
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बाबा रामदेवजी ने प्रारंभ में सायकल से चलकर मात्र कुछ सैकड़ो लोगो को योग शिक्षा देने का''योग अभियान" प्रारम्भ किया था। धीरे धीरे उनका यह अनुष्ठान लोकप्रिय होता गया और आज करोड़ो लोग इस 'योग अनुष्ठान" से जुड़ गये। यघपि योग उतना ही पुराना है जितना शायद भ्रष्टाचार का मुद्दा।  वास्तविक योग को भारत में प्रारंभ करने का श्रेय कुछ लोग मुंगेर आश्रम श्री योगाचार्य स्वामीं श्री सत्यानंदजी सरस्वती महाराज बिहार को देते है। लेकिन योग को सर्वसाधारण तक दूरदराज तक पहुंचाने के लिए एकमात्र व्यक्ति जिन्हे श्रेय दिया जा सकता है वह बाबा रामदेव ही है। इसलिए वे ''योग गुरू" के रूप में जाने जाते है व अब योग के 'पर्याय" माने जाने लगे है। जनता ने उनके इस अनुष्ठान पर कोई अन्य उद्वेश्य नहीं देखा, योग से उनको फायदा हुआ और इसलिए बेहिचक बिना किसी विवाद के (सिवाय कुछ मल्टी नेशनल कम्पनियों के विवादो को छोड़कर)जनता जनार्दन ने बाबा के योग को अपने जीवन में अपनाया, स्वीकार किया। इस कारण आज करोड़ो लोग बाबा के 'योग विद्या" के अनुयायी है। इसके माध्यम से बाबा ने देश की जनता के उन करोड़ो रूपये बचत की जो उनके स्वास्थ्य इलाज में खर्च होती थी और उसमें अधिकांशत: मल्टीनेशनल कम्पनी की झोली में जाती थी। बाबा द्वारा की गई इस राष्ट्रीय धन की बचत की चर्चा शायद ही कहीं होती हो। 
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जिस प्रकार योग शिक्षा के लिए उन्होने प्रारंभ में मात्र कुछ सैकड़ो लोगो को शिक्षा देकर अभियान प्रारम्भ कर आज करोड़ो लोगो को अनुयायी बनाया। उसी प्रकार स्वयं-सिद्ध घोषित ईमानदार कुछ सैकड़ो व्यक्तियों (इससे ज्यादा संख्या की उम्मीद कम ही है) जिनकी जनता के सामने स्वच्छ छवि है को जनता के सामने प्रस्तुत करके लेकर यदि वे भ्रष्टाचारी विरोधी अभियान चलाते तो जनता के बीच उस अभियान की विश्वसनीयता वैसे ही स्थापित होती जैसे कि योग अभियान को प्रारंभ करते समय हुई। इसमें समय तो अवश्य लगेगा लेकिन भविष्य में उनका यह अभियान उसी प्रकार बिना किसी आलोचना के लाखो लोगो की संख्या से जुडऩे के कारण सफल होगा जैसा कि योग शिक्षा के अभियान में हुआ है। 
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यदि सत्याग्रह शब्द का 'विग्रह" किया जाय तो उसका मतलब सत्य का आग्रह होता है। दिल्ली में होने वाले सत्याग्रह में भाग लेने वाला प्रत्येक व्यक्ति इस बात की शपथ ले कि उसने भ्रष्टाचार नहीं किया और न ही जीवन पर्यन्त करेंगा। क्या दिल्ली में ४ तारीख को प्रारम्भ हो रहे सत्याग्रह में शामिल होने वाले १ लाख व्यक्ति, पूरे देश में सत्याग्रह में शामिल होने वाले ५ लाख व्यक्ति व देश की १०० करोड़ जनता जो इस मुहिम का समर्थन कर रही है (जैसा कि बाबा ने दावा किया है) यदि ये समस्त लोग भ्रष्टाचार से दूर है तो फिर भ्रष्टाचार में कौन सी जनता शामिल है। क्या भ्रष्टाचार मात्र देश के शीर्ष पदो पर बैठे राजनैतिक, नौकर शाह ही कर रहे है। यदि हम अपना आत्मवलोकन इस विषय पर और गंभीरता से नहीं करेंगे व बाबा प्रत्येक नागरिक के मन, दिल व दिमाग में इस मुद्दे को हृदय से अपनाने के लिए गम्भीरता से प्रेरित करने का प्रयास नहीं करेंगे तो यह अभियान भी अन्ना हजारे के अभियान के समान तात्कालिक रूप से सफल होकर स्थायित्व के अभाव में असफल हो जाएगा क्योंकि भीड़ तंत्र किसी अभियान को तत्कालिक हवा तो दे सकती है लेकिन स्थायित्व नहीं जबतक भीड़ तंत्र में 'सिद्धांत" व शुचिता न जुड़ी हो।  इसीलिए यह कहा जा सकता है कि भ्रष्टाचार को प्रश्रय बाबा रामदेव के नाम में मिल रहा है। क्योंकि वे भ्रष्टाचार विरोधी मूहिम के 'आईकान, बिम्ब, पर्याय" बन चुके है। जब वे दावा करते है कि १०० करोड़ लोग उनकी मूहिम में शामिल है तो फिर भ्रष्टाचार कौन कर रहा है (१२५ करोड़ की जनसंख्या में २० करोड़ लोग तो नाबालिक होंगे ही)। अर्थात बाबा की मूहिम में शामिल लगभग प्रत्येक व्यक्ति भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम का झण्डा उठाकर यह दावा कर रहा है कि वह भ्रष्टाचारी नहीं है। तब फिर किस व्यक्ति पर भ्रष्टाचार की उंगली उठायी जावे प्रश्र यह उत्पन्न होता है क्योंकि वे सब तो बाबा के बाजू में बाबा का झण्डा लेकर बाबा की तरफ खड़े है। यदि बाबा यह मानते है कि देश के जीवनतंत्र में फैला हुआ भ्रष्टाचार मात्र कुछ हजारो, लाखो के बीच ही है तो यह वास्तविकता से आखें मूंदना होगा।
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बाबा का यह कथन बहुत ही आश्चर्यजनक है कि जब तक कोई व्यक्ति भ्रष्टाचार के आरोप पर न्यायिक प्रक्रिया द्वारा अपराधी घोषित नहीं किया जाता है तब तक उसे मंच पर या मेरे बाजू में बैठाने में मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी। वास्तव में यह भी एक सुविधा की ('राज') 'नीति' ही है। हम सब जानते है कि हमारी न्यायिक प्रक्रिया की स्थिति क्या है। देश में जितने अपराध पंजियत होते है जिसमें कितने प्रतिशत में अंतत सजा होती है ये हमको मालूम है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वास्तव में अपराध ही घटित नहीं हुवे है। वास्तव में न्यायिक प्रक्रिया एवं नागरिको की गवाही न देने की बढ़ती प्रवृत्ति के कारण अपराध दोष सिद्धि नहीं हो पाता है। इसका यह अर्थ कदापि नहीं होता कि वह अपराधी नहीं है। इसी प्रकार भ्रष्टाचार के मुद्वे में भी हजारों लोग ऐसे है जिनके खिलाफ मजबूत धारणा है कि वे भ्रष्टाचारी है लेकिन वे न्यायालय द्वारा भ्रष्टाचारी घोषित नहीं हो पाये है। क्या ऐसे लोगो को मंच पर बैठाया जाना चाहिए? जैसा कि 'नाथ' को छिंदवाड़ा शिविर में।
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एक तरफ जहां 'बाबा' यह कहते है कि विदेशी बैंको में खरबो रू. कालाधन के रूप में भारतीयों का जमा है जिसे भारत वापिस लाना है। भारत सरकार भी इस तथ्य को स्वीकार करती है। लेकिन यह एक अनुमान मात्र है कोई न्यायिक प्रक्रिया द्वारा सत्यापित आंकड़े नहीं है। क्या इस कालेधन को जमा करने वाले व्यक्तियों के विरूद्ध भारत या अन्तर्राष्ट्रीय किसी भी न्यायालय ने किसी भी व्यक्ति को इस बात की सजा दी है कि आपका इतना धन स्विस बैंक में कालेधन के रूप में जमा है। यदि नहीं तो फिर आप एक पुख्ता धारणा के आधार पर ही (जिसे केंन्द्रीय सरकार भी स्वीकार करती है) कार्यवाही करने की बात करते है तो उसी धारणा के आधार पर 'नाथ' जैसे व्यक्तियों को मंच से दूर क्यों नहीं रखा गया ताकि भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम ''अ-नाथ" होने से बच सके।
आज देश में जो भी भ्रष्टाचार है उसमें अधिकांश जनता की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भागीदारी है जिसमें मैं भी अपने आपको अलग होने का दावा नहीं कर सकता। प्रश्र आज भ्रष्टाचार के तंत्र को बदलने का नहीं है क्योंकि 'तंत्र' बदलने से भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा। यदि आप दूसरा तंत्र लाएंगे वह भी भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं है तो फिर भ्रष्टाचार खत्म कैसे होगा। मेरे मत में भ्रष्टाचार तब खत्म होगा जब तंत्र की उस भावना को ही खत्म कर दे जो भ्रष्टाचार उत्पन्न करती है। बाबा प्रत्येक व्यक्ति के मन में यह भावना पैदा करेदे कि वे भ्रष्टाचार को अपने होशो-हवास में आखरी सांस तक चाहे कितनी भी तकलीफ, दर्द सहना पड़े, दूर रखेंगे तभी हम इस जकड़ चुकि भ्रष्टाचार के 'तंत्र' की भावना को प्रभावशाली रूप से बदल सकेंगे तभी बाबा भीड़ तंत्र को सिद्धांत व शुचिता से जोड़कर यह आंदोलन को सफलता दे सकेंगे। मैं उन्हे इसी कल्पना के साथ भविष्य की शुभकामनाए देता हूं। अन्यथा भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम की चर्चा तो सर्वत्र होगी लेकिन भ्रष्टाचार उसी प्रकार कम नहीं होगा जिस प्रकार अत्यधिक महंगाई झेल रही जनता ने हाल ही में हुए पांच प्रदेश के चुनावों में कांग्रेस की विधायको की संख्या को पिछले चुनाव की तुलना में बढ़ाया जबकि मूल रूप से कांग्रेस ही इस महंगाई के लिये पूर्णत: जिम्मेदार है। 
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बाबा के बढ़ते हुए प्रभाव व शक्ति के कारण आज वे देश की विभिन्न समस्यामूलन केन्द्र बनने के कारण जनता की उनसे अपेक्षाए भी बढ़ गई है। इसी तारतम्य में मैं बाबा से उम्मीद करता हूं कि बाबा जब खरबो का कालाधन विदेश से वापस लाकर देश के विकास में लगाने की बात करते है तो उन्हे इस बात पर भी जोर डालना चाहिए कि वास्तविकता में शराब खोरी से देश की अर्थव्यवस्था चरमरा रही है क्योकि जितना टेक्स (जोकि एक आकर्षण का केंद्र है) सरकार को राजस्व के रूप में आबकारी से मिलता है यदि शराब से होने वाली हानि का मूल्यांकन रूपयों में किया जाए तो वह उससे कही ज्यादा होगी। शराब व्यक्ति के ''अमूल्य" समय को नष्ट करती है, अपराधों को जन्म देती है, सामजिक व्यवस्था को ध्वस्त करती है,। पारिवारिक जीवन की सहजता को समाप्त करती है। और अंतत: व्यक्ति की कार्यक्षमता जो अंतत: देश के उत्पादन में लगती है को बुरी तरह प्रभावित करती है। जिसके उत्थान में व्यक्तियों एवं सरकार का अरबों रूपये, टेक्स के रूप में आने वाली राशि से कहीं अधिक खर्च हो जाता है। अत: यदि बाबा 'शराब बंदी' के लिए सत्याग्रह पर जावे तो निश्चित रूप से देश का ही नही यह मानव कल्याण के लिये भी हितकर कार्य होगा।


(राजीव खण्डेलवाल)
(लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास के पूर्व अध्यक्ष है)

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