शनिवार, 4 सितंबर 2010

''विश्र्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में शासन क्या माननीय न्यायपालिका चलाएगी''?

हाल ही में माननीय उच्चतम न्यायालय ने भंडारण की कमी के कारण सड़ते हुए अनाज के भण्डार पर केंद्रिय शासन को यह निर्देश   दिया कि वह अनाज की भण्डारण क्षमता पूर्ण न होने के कारण पूरा अनाज खुले में पड़े होने से खराब हो रहा है अतः उसे गरीबों के बीच बांट दिया जायें। बाद में इस सबंध में पुनः १९ अगस्त को निर्देश पारित किये गये। अब ३१ अगस्त को माननीय उच्चतम न्यायालय ने १९ अगस्त के आदेश के सबंध में यह स्पष्टीकरण किया गया कि वह सुझाव नहीं बल्कि आदेश है।

सर्वोच्च न्यायालय का यह प्रथम निर्देश/निर्णय नहीं है जब उसने इस तरह केञ् निदेर्श/आदेश दिये जो न्यायिक न लगकर कार्यपालिका के आदेश लगते है। हमारें संविधान में राष्ट्र का शासन कैञ्से चलेगा इसकी स्पष्ट व्याख्या है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के अपने-अपने क्षेत्र में (जिसकी व्याチया की गई है) पूर्ण उत्तरदायित्व से कार्य करने की कल्पना और आशा संविधान निर्माताओं ने की थी जिसमें राष्ट्र सफलता की उस दिशा और सीमा तक जाएं जहा प्रत्येक नागरिक ही नहीं गैर नागरिक व्यक्ति भी अपने को खुशहाल समझे लेकिन पिछले कुञ्छ समय से इन तीनो पर अपने क्षेत्राधिकार के बाहर जाकर कार्य करने के आरोप प्रत्यारोप उनकी कार्यप्रणाली के कारण लगे है। १९७५ के आपातकाल के दौर में जब माननीय जस्टिस भगवती ने कमीटेड ज्यूडिसरी का नारा दिया था तब से लेकर आज तक न्यायिक प्रक्रिया और कार्य दर्शन में आमूलचूल परिवर्तन हो चुके है। आज सब जगह न्यायिक सक्रियता की बात न केवल की जा रही है बल्कि दिख भी रही है। इसका प्रथम उदाहरण मेरे होशो हवास में मैंने तब देखा जब एक ''पोस्ट कार्ड'' को (आपातकाल में) ''हेबियस कार्पोस रिट'' मानकर उसमें आदेश पारित किये। यह राष्ट्र के न्यायपालिका का एक साहसिक कदम माना गया जिसकी सर्वत्र प्रशंसा की गई। उसके बाद से माननीय उच्चतम न्यायालय ने कई लैण्डस्लाइड निर्णय दिये। वे यद्यपि जनहित में लुभावने निर्णय थे इसलिए आम जनता ने उनकी सराहना की क्योंकि वास्तव में जिनका जो कार्य था वे अपने कर्तव्यों को पूरा न करने के कारण उनकी उक्त कमियों की पूर्ति माननीय न्यायालय के निर्णय करते है। इसलिए जनहित में होने के कारण उन निर्णयों पर सामान्यतः कोई टीका-टिप्पणी या आक्षेप नहीं लगाये गये।

शासन का यह कर्तव्य है कि वह संविधान में प्रदत्त संवैधानिक अधिकारों की न केवल रक्षा करें बल्कि वह ऐसी जनकल्याणकारी नीतियां बनाये एवं चलाये ताकि न केवल देश का प्रत्येक नागरिक समृद्ध हो सके बल्कि अंततः समाज व राष्ट्र भी प्रगति की ओर चल कर समृद्ध हो। जहां तक एक नागरिक के संविधानिक अधिकारो का सवाल है उसकी विजिलेंस करने का अधिकार निश्चित रूप से न्यायिक क्षेत्राधिकार में है। लेकिन यदि दोषपूर्ण नीति के कारण या उपेक्षापूर्ण व्यवहार के कारण शासन नागरिकों के कल्याण के लिए उनकी, सुखलृसुविधाओं के लिए या उन अधिकारो के लिए जिनसे एक उत्तरदायी शासन द्वारा जनता के प्रति लोककल्याण के कारण अपेक्षा की जाती है का पालन न करने के कारण क्या देश का सर्वोच्च न्यायालय जो अंतिम रूप से पूरे राष्ट्र के लिए बंधनकारी निर्णय देता है को यह अधिकार है, कि वह शासन को जनकल्याण के लिए विशिष्ट निर्देश/आदेश जारी कर सकेञ्? यह प्रश्न उक्त निर्णय से उत्पन्न होता है। लोकतांत्रिक देश में जनता का शासन जनता के द्वारा और जनता के लिए होता है। यदि शासन लोककल्याणकारी नहीं है, उसकी नीतियां जनहित में नहीं है तो संविधानिक व्यवस्था के तहत ५ वर्ष केञ् अंतराल में होने वाले चुनाव में जनता उक्त अलोककल्याणकारी सरकार के खिलाफ जनादेश देकर उसे साथ से वंचित कर सकती है। लेकिन ५ साल समाप्त होने के पूर्व ऐसा नहीं किया जा सकता। तब भी जनता जन आंदोलन केञ् माध्यम से सरकार को लोकहित में कार्य करने के लिए विवश कर सकती है। लेकिन क्या न्यायालय उक्तञ् प्रक्रिया का विकल्प या भाग बन सकता है यह यक्ष प्रश्र्न है? क्योंकि यह हमारी सपूर्ण संविधानिक व्यवस्था को ध्वस्त करने का प्रयास करता है। वैसे पड़ोसी देश पाकिस्तान की ओर देखे तो वहां, पर शासन के असफल होने पर विकल्प के रूप में हमेशा सत्ता के लिये लालयित सेना शासन संभाल लेती है उसकी तुलना में हमारे देश में उक्त स्थिति में क्या यह बेहतर विकल्प नहीं है यह भी एक प्रश्र्न पैदा होता है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने किस प्रावधान के अंतर्गत केंद्रीय सरकार को उक्त निर्देश दिये यह स्पष्ट नहीं है। सामान्यतः सर्वोच्च न्यायालय का कार्य न्यायिक समीक्षा, विधायिका द्वारा पारित कानून की वैधता कि क्या वे संवैधानिक है, वे संविधान की मूल प्रवत्ति को नष्ट नहीं करते है (जैसा कि केशवानंद भारती के केश में कहा गया)? व संविधान द्वारा प्रदत्त नागरिक अधिकारो की रक्षा करना है जो उसके मूल, अपीलीय एवं एडवाइजरी (आर्टिकल १४३) क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत आता है।
विगत कुञ्छ समय से निरंतर ''न्यायिक सक्रियता'' इस सीमा तक पहुंच गई है कि माननीय उच्चतम न्यायालय ने पोस्ट कार्ड की प्रतिक्षा किये बिना भी कुछ मामलो में घटना का स्वप्रेरणा से संज्ञान लेते हुए सबंधित पक्ष को नोटिस जारी किये है जैसे कि कार्यपालिका का दायित्व होता है। यद्यपि यह जनता के हित में तो हो सकते है क्योंकि उक्त संज्ञान मानवीय संवेदना लिए हुए है लेकिन क्या वे विधिक संज्ञान है प्रश्र्न यह है। यह स्थिति जो वर्तमान में देश में उत्पन्न हो रही है उसका बहुत बड़ा कारण लोकप्रिय शासन का जनता के प्रति जवाबदेही न होना व अपने कर्तव्य में असफल होना है इस कारण से माननीय न्यायालयों को समयलृसमय पर इस तरह के निर्देश/निर्णय देने पड़ रहे है। क्या यह उचित समय नहीं आ गया है कि संविधान में इस तरह केञ् संशोधन के बारे में विचार किया जाए कि न्यायालय भी उपरोक्त तरह के निर्णय लेने के लिए संवैधानिक रूप से अधिकारिक हों?


सी.एन.जी बस प्रकरण में माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय का निर्णय सर्वविदित है। दिल्ली में डीजल से चलने वाली बसों पर माननीय उच्च न्यायालय ने प्रतिबंध लगाकर दिल्ली सरकार को निर्देश जारी किया और तब दिल्ली सरकार को मजबूरन सी.एन.जी. यूल  की बसें चलानी पड़ी। क्या कानून में डीजल की बसे चलाना गैर कानूनी था? और यदि था तो तब तक वह गैर कानूनी कार्य क्यो चलता रहा और यदि नहीं था तो सरकार ने कानून में संशोधन कर डीजल से बसें चलने पर प्रतिबंध क्या नहीं लगाया उस स्थिति में न्यायालय को उस तरह का कदम नहीं उठाना पड़ता। क्या न्यायालय को इस तरह का आदेश देने का अधिकार है? यही विचारणीय प्रश्र्न है।

एक और प्रश्र्न न्यायालय के कुछ निर्णयों से उत्पन्न होता है जिनमें कानून में प्रावधान न होने के बावजूद उक्त प्रावधान की कमी की पूर्ती करते हुए आदेश पारित किये है, जिससे यह आभाष होता है कि माननीय न्यायालय कानून निर्माण का कार्य कर रही है जो कि संसद का कार्य है न्यायालय का नही।
अंत मे सत्ता सुख का अपना बहुत बड़ा आकर्षण है और आज नागरिको में सत्ता सुख के प्रति  अन्तर्निहित मोह अत्यधिक जागा है यह सुख केवल शासन तंत्र तक ही सीमित नहीं है बल्कि वह व्यक्ति जो किसी भी तंत्र से जुड़ा है उस तंत्र की सत्ता का भागीदार होना चाहता है। क्या यह आत्ममुग्ध होने की भावना माननीय न्यायाधीशो के मन में उक्त निर्णयों के पीछे तो नहीं है? क्यो कि इस तरह के आदेश/निर्देश देकर सत्ता के आकर्षण को अप्रत्यक्ष रूप से संतुष्ट किया जा सकता है विशेषकर सत्ताधीशो के विरुद्ध जनहित के निर्णय देकर। यहां यह उल्लेखनीय है कि यदि माननीय उच्चतम न्यायालय चाहता तो अनाज बांटने के निर्देश के साथ सरकार को निश्चित समय में भण्डारण क्षमता बढ़ाने के निर्देश भी दे सकता था जो नहीं दिये गये शासद ऐसे निर्देश से आम जनता प्रभावित नही होती। ऐसी स्थिति में न्याय पालिका की निष्पक्षता व निर्लिप्तता संदेहास्पद हो सकती है।

यदि वास्तव में इस तरह की भावना इस तरह के निर्णयो के पीछे उभर रही है तो निश्चित रूप से संसद को अपने उस विशेषाधिकार का उपयोग करना होगा जब संसद इस तरह के निर्णय को रोकने के लिए आवश्यक कानून बनाये जैसा कि संसद ने उच्चतम न्यायालय ने शाहबानों प्रकरण में धारा १२५ के अंतर्गत मुस्लिमों के अधिकारो के प्रति दिये गये निर्णय को पलट कर नया कानून (डायवोर्स्ड मुस्लिम वीमेन प्रोटेक्शन एक्ट) बनाकर निर्णय की प्रभावशीलता को शून्य किया गया।



इस लेख का उद्वेश्य किसी भी तरह से माननीय उच्चतम न्यायालय या न्यायिक प्रक्रिञ्या के महत्व को कम
करना या आक्षेप करना नहीं है। बल्कि कानूनन उच्चतम न्यायालय को संविधान संशोधन के द्वारा वह मजबूती प्रदान करना है जो कार्य संविधान प्रदा हो सके ताकि लोकप्रिय शासन के असफल होने पर भी ५ साल के अन्तराल की प्रतीक्षा के कारण हो रही बदहाली की स्थिति को रोकने हेतु माननीय न्यायालय अपने उक्त प्रदा अधिकार का प्रयोग कर, आदेश पारित कर स्थिति को गंभीर होने से रोक सके यही इस लेख का उद्वेश्य है। चूंकि लेखक एक अधिवक्त है इसीलिए वह न्यायालय की गरिमा को मानता है। व्याख्या प्रत्येक व्यक्ति की अलग-अलग हो सकती है जैसा कि किन्ही मामलों में व्याख्या के कारण एक ही तथ्य होने के बावजूद निचली अदालत से उच्चतम न्यायालय तक निर्णय पलटते रहते है।

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