शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

गैर संवेदनशील प्रधानमंत्री अचानक संवेदनशील कैसे हो गये?




विगत दिवस मैने माननीय उच्चतम न्यायालय के सड़ते हुए अनाज के मामले में निरंतर आ रहे आदेशों/निर्देशो पर एक टिप्पणी ''''विश्र्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में शासन क्या माननीय न्यायपालिका चलाएगी''? शीर्षक से लिखी थी, जिस पर माननीय प्रधानमंत्री जी की यह टिप्पणी कि माननीय उच्चतम न्यायालय सरकार केञ् कामकाज के लिए नीति निर्धारित न करें जो मेरे द्वारा उक्त टिप्पणी में उठाये गये मुद्‌दे को सही ठहराती है। लेकिन माननीय प्रधानमंत्री की उक्त टिप्पणी से एक नया प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या माननीय प्रधानमंत्री को उक्त टिप्पणी करने का अधिकार है, क्या वह जायज व नैतिक है? और क्या वर्तमान परिस्थिति में उसका औचित्य था? या उक्त टिप्पणी को क्या अभी टाला जा सकता था?
 
विगत कई समय से सड़ते हुए अनाज केञ् मामले में माननीय खाद्य मंत्री, प्रधानमंत्री और केन्द्रीय सरकार की संवेदनहीनता के बाबत पूरे देश में न केवल इलेक्त्रनिक और प्रिंट मीडिया के माध्यम से बल्कि देश के आम नागरिकों के बीच यह चर्चा का विषय है, 'बहस' का नहीं है? (बहस तब होती है जब एकमत न हो) क्योंकि उक्त मुद्दे पर लगभग समस्त लोग एकमत है कि केंन्द्रीय शासन ने योजनाबद्ध तरीके से न तो अनाज को खरीदने की योजना बनाई न उसके भण्डारण की उचित व्यवस्था की और न ही उसके वितरण की व्यवस्था की और इन सब में असफल होने के कारण सड़ते हुए अनाज जिसका उपयोग देश के उन नागरिकों के भी काम में नहीं आ रहा है जिसे दो जून का भोजन उपलध नहीं है। इसीलिए प्रायः समस्त 'मतों' ने मत-मतान्तर होते हुए भी एकमत से एक आवाज में यह बात कही कि हमारे देश के प्रधानमंत्री घोर असंवेदनशील है। वही देश का असंवेदनशील प्रधानमंत्री सड़ते हुए अनाज के मामले में लगभग एक महीने में माननीय उच्चतम न्यायालय के तीन बार लगातार आदेश (एक बार स्वतः स्फुरित हुए) निर्णय पारित करने के कारण वह मामला इतना संवेदनशील हो गया कि माननीय प्रधानमंत्री एकदम तिलमिलाकर माननीय उच्चतम न्यायालय को ही नसीहत देने लगे। यह नसीहत भी बुद्धिजिवियों के एक वर्ग द्वारा स्वीकार कर ली जाती यदि वह अनाज के संबंध में की गई गलतियों को सुधारने के लिए कोई प्रभावशाली योजना की घोषणा करते और उसे तुरंत लागू करते। लेकिन उक्त मामले में उनकी संवेदनशीलता अभी तक नहीं जगी बल्कि मजबूरी ही झलकती दिखाई देती है, जब उन्होने बीपीएल को २५ लाख टन गेहूं रियायती दर पर बांटने की घोषणा की। माननीय प्रधानमंत्री जी ने सड़ते अनाज के अतिरिक्त अन्य किसी आदेश के आधार पर माननीय उच्चतम न्यायालय को हद में रहने की हिदायत दी ऐसा लगता नहीं जैसा की कांग्रेस के प्रवक्ता शकील अहमद ने एनडी टीवी के कार्यक्रम में दावा किया। यदि माननीय प्रधानमंत्री वास्तव में यह मानते है कि नीतिगत मामलों में माननीय उच्चतम न्यायालय को नहीं पडऩा चाहिए यह उनका क्षेत्राधिकार नहीं है तो केंन्द्रीय सरकार को माननीय उच्चतम न्यायालय में दाखिल हलफनामें में उक्त तथ्य का उल्लेख अवश्य करना था बजाय इसके कि माननीय उच्चतम न्यायालय की नाराजगी को दूर करने केञ् लिए बीपीएल रेखा से नीचे के नागरिकों को अनाज बांटने की बात कही गई।  माननीय प्रधानमंत्री जी की माननीय  उच्चतम न्यायालय को नसीहत देते समय उनकी संवेदनशीलता इस बात पर नहीं गई कि उक्त बयान का हमारी संवैधानिक व्यवस्था पर क्या प्रभाव हो सकता है। यह कई बार कहा जा चुका है कि हमारे संवैधानिक तंत्र के अंतर्गत तीनो क्षेत्र कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका अपने अपने क्षेत्रों में सौरभौमिक है और प्रत्येक को अपने क्षेत्राधिकार की सीमा में रहकर ही एक दूसरे केञ् क्षेत्र में हस्तक्षेप किये बिना कार्य करना चाहिए। यह बात स्पष्ठ है कि माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा कई मामले में जो सरकार के नजर में नीतिगत मामले हो सकते है व्यवस्था के चरमराने के कारण जनहित में सरकार को जनहितकारी कार्यो को करने केञ् विशिष्ट निर्देश दिये गये जो स्थिति को यह और स्पष्ट करता है कि सरकार जिसका दायित्व जनहित कार्यो को करना है उसमें वह असफल रही है और इसलिए यदि माननीय प्रधानमंत्री जी माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्देशों को इस भावना से लेते कि संविधान द्वारा रक्षित दायित्व के अंतर्गत वे जनहित में कार्य न करने के कारण माननीय उच्चतम न्यायालय को उक्त असाधारण कदम उठाने पड़ रहे है तो निश्चित रूप से वे उक्त टिप्पणी न करके उनके नीतिगत मामलों में जो कमियां है, लोककल्याण के लिए जनहित में है, उसको दूर करने का वह प्रयास करते। तब  शायद यह मुद्दा ही बेमानी हो जाता। लेकिन निश्चित रूप से एक कमजोर अंर्थशास्त्री प्रधानमंत्री ने उक्त साहसिक टिप्पणी करके एक नये विवाद को जन्म दिया है जो संवैधानिक व्यवस्था के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है। उनका यह कथन भी शासन चलाने के सामुहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत के विरूद्ध है कि ''मैं यह नहीं कह सकता कि मंत्री मुह बंद करले।'' मंत्री को अपनी राय व्यक्त करने का अधिकार है लेकिन वह राय उसे केबीनेट में व्यक्त करना चाहिए और जब केबीनेट में कोई निर्णय हो जाये तो उसके बारे में विवाद करने का अधिकार मंत्रीजी को नहीं है। केबीनेट में निर्णय होने के पूर्व वे अवश्य अपनी राय रख सकते है। लेकिन यदि उनकी राय पार्टी के द्वारा घोषित घोषणा पत्र या प्रधानमंत्री की घोषित नीति से अलग है तो सार्वजनिक रूप से राय देने से किसी भी मंत्री को बचना चाहिए ताकि किसी भी प्रकार का संशय या अराजकता की स्थिति न बने।

3 टिप्‍पणियां:

  1. विधायिका और न्यायपालिका का टकराव नया नहीं है। एक समय,न्यायपालिका की अतिसक्रियता राष्ट्रीय चर्चा का विषय थी।

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  2. jb tak koi bhi byawastha samajik nahi hogi us byawastha par samaj ka purn rup se adhikar nahi hoga tb tk aisa hota rahega, naukar fir naukar hai uski koi jimmedari hamare desh me tay nahi hoti hai
    arganikbhagyoday.blogspot.com

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