गुरुवार, 1 अप्रैल 2010

''धन्य हो ऐसी सर्वसमति'' ........भारत देश ''सर्वसमत'' निर्णय की ओर जा रहा है ?... ''सांसद'' ''विधायक'' बधाई कें पात्र है ?

मध्य प्रदेश विधानसभा में विधायको के वेतन सबंधी विधेयक लगभग सर्वसमति से पारित हो गया। जिसपरसर्वसमति बनाने के लिए समस्त विधायक गण बधाई के पात्र है क्योंकि इस देश में ''सर्वसम्मति'' का 'अकाल' हैचाहे वह ''राष्ट्रीय एकता'' का प्रश्न हो, ''सुरक्षा'' का प्रश्न, ''स्वाभिमान'' या ''नैतिकता'' का प्रश्न हो समस्त मुद्दो परकिसी भी प्रकार की कोई सहमति तो इस देश के जनप्रतिनिधियों के बीच है और ही नागरिकों के मध्यइसलिए ऐसे वातावरण में से किसी भी मत पर एकमत होना निश्चित ही स्वागत योग्य कदम है। माननीयविधायकों को इस बात की भी बधाई दी जानी चाहिए की उन्होने इस बात को स्वीकार कर लिया है की देश में बहुततेजी से मंहगाई बढ़ गई है इसलिए उस महंगाई के असर को कम करने के लिए खुद के वेतन बढ़वाकर भार कोकम करले ताकि शांत मन से जनता की महंगाई पर भी विचार किया जा सके? जिस देश के कर्णधार बनाने वालेशिक्षकों का वेतन (मध्यप्रदेश में मात्र २६०० मासिक मान्यता प्राप्त स्कूञ्ल में जो सामान्यतः दैनिक मजदूरी से भीकम है) वहां ३६००० हजार वेतन (सुविधाए अलग)पाने वाले व्यक्तिञ् कितने है ? यदि विधायको का विधायकी कायह कथन सही है कि हमें अपने क्षेत्र की जनता की सुविधाओं का ध्यान रखने के लिए आतिथ्य करने के लिए औरअपने कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए जो हमें वर्तमान वेतन और सुविधाएं मिल रही है वे कम है। तो उनसे यहभी पूछा जाना चाहिए कि चुनाव आयोग ने जो चुनाव खर्च की सीमा तय की हैया वास्तव में में वे उस सीमा केअंदर ही खर्च करके चुनाव लड़ते है? और यदि नहीं तोया वास्तव में जो उन्हे सुविधांए और वेतन मिल रहा है वेभीया पूरी की पूरी अपने कर्तव्य के पालन में खर्च करदेते है? (अपवाद सब जगह है) इसलिए यदि इनजनप्रतिनिधियों ने अपने से उपर की ओर देखकर जो बहुत ही कम संया में है अपने से नीचे की ओर और अपनेआसपास के वातावरण को देखा होता तो शायद उनका अन्दर का मन इतना विचलित हो जाता कि वे ऐसे विधेयकको पेश करने की पैरवी कभी नहीं करते। भौतिक युग में भौतिक सुख प्राप्त करने का अधिकार हर व्यक्तिञ् को है जोबगैर 'अर्थ' के सभव नहीं है लेकिन संविधान द्वारा प्रदा विशेषाधिकार प्राप्त करने वाले चुने गये प्रतिनिधियों का कार्यचुनाव के दौरान गरीब के प्रति किये गये लच्छेदार भाषणों से भी तो मेल खाना चाहिए।
आज
भी भारत की आधी जनता धरती के बिछौने पर सोकर आसमान की चादर ओढ़ते हुए दिशाओं के
वस्त्र पहनती है। जिस देश में आज भी आधी जनसंया दो जून की रोटी प्राप्त करने में पूरे शरीर पसीने से गीलाकर नहा लेती है (और इस प्रकार पानी की बचत करती है), जिस देश में निम्र वर्ग मध्यम वर्ग महंगाई के तलेदबकर अपने आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए गलत रास्ते अपनाने को मजबूर हो जाते है वहां पर शायदविधयिकों के''विधाता'' स्वयमेव अपने को विधाता मानकर कुञ्छ भी मनमानी करने के अधिकार को स्वतः प्राप्तकर विधाता होने की खुशी महसूस करते है तभी इस तरह के विधेयक पास होते है।यह प्रथम अवसर नहीं है जबम।प्र. की विधानसभा एकमत हुई हो। वास्तव में विधायकों की वेतन, भो एवं पेंशन के मुद्दे पर पूरे देश में समस्तविधानसभाओं , लोकसभा और राज्यसभा में लगभग एकमतता है जो निश्चय ही भारत देश की अर्थव्यवस्था कोमजबूती प्रदान करती हैयोकि मामला ''अर्थ'' का है और आप ''अर्थ'' से कोई ''अनर्थ'' निकालेयोंकि इस देशके संविधान ने जिन लोगो को शासन चलाने की ''जिमेदारी'' दी है वे सब इस ''अर्थ'' के मामले में एकमत है। जनताबेबस है। उसका इस ''एकमत'' के आगे नतमस्तक होना स्वाभाविक है। जो वह अपने मौन स्वीकृञ्ति द्वारा देती है।कुञ्छ पढ़े लिखे तथाकथित बुद्धिजीवी इस पर अपना विरोध प्रकट कर देते है, लेख लिखते है, विचार व्यक्तञ् करदेते है इससे उन ''उत्तरदायी'' व्यक्तिञ्यों पर क्या फर्क पड़ता है क्योकि वे जानते है ये मुट्रठी भर लोग तो देश कीदिशा को बदल सकते है और ही मत को बदल सकते है। फिर जिस जनता ने हमें चुनकर विधानसभा, लोकसभामें भेजा है विभिन्न विचारों के होते हुए विभिन्न प्रदेशो, संस्कृतियों, भाषाओं, विचारों एवं वातावरण से आते हुएजब हम सब एकमत है। क्योकि हमें मतो ने ही एकमत बनाया है? और जनता ने भी जिसने हमें चुना है उसने मौनस्वीकृञ्ति देकर हमें अपना मत दिया है? तब हमें गर्व से यह कहने से कौन रोक सकता है कि हमने जनता के मतोंके पालनार्थ सर्वसमति से एकजूट होकर उक्तञ् प्रस्ताव पारित कर उक्तञ् जनता के प्रति अपना गहरी आस्थाव्यक्तञ् कर उनके प्रति आभार व्यक्तञ् किया है। जय हो 'जनता' ''जन-जन-नेता''?

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