रविवार, 5 मई 2024

‘‘विश्वासघात, अनैतिकता व अदूरर्दिशता’’ का अनूठा परिणाम जनक संगम! सूरत-इंदौर चुनाव।

 कम मतदान! बुद्धिमत्तापूर्ण, ‘‘चतुर’’ कदम!


कांग्रेस! मैच फिक्सिंग का आरोप। पुनः सेल्फ गोल!

सूरत-इंदौर चुनाव को लेकर आत्मघाती गोल की विशेषज्ञता कांग्रेस का बीजेपी पर ‘‘मैच फिक्सिंग’’ का आरोप तो बहुत ही बेहूदा, हास्यास्पद एवं पुनः ‘‘सेल्फ गोल’’ है। ‘‘मैच फिक्सिंग’’ का मतलब भाजपा व कांग्रेस सहित समस्त अन्य दलीय व निर्दलीय उम्मीदवारों के बीच एक छिपी हुई सहमति का होना है। इसका शाब्दिक अर्थ मैच की उस अवस्था को कहते हैं, जिसमें मैच के नियमों का उल्लंघन करते हुए परिणाम पहले से ही निश्चित हो जाते हैं। कांग्रेस प्रवक्ता जयराम रमेश ने ‘‘एक्स’’ पर लिखा यह ‘लोकतंत्र पर खतरा हैं’, और इसे ‘‘मैच फिक्सिंग’’ करार दिया। इसका मतलब तो यही हैं कि यदि यह फिक्सिंग सिर्फ भाजपा व चुनाव आयोग के बीच हुई है, तो निर्विरोध चुनाव दूसरे उम्मीदवारों की उपस्थिति के कारण हो नहीं सकता था। अतः इस आरोप का दूसरा तार्किक अर्थ यही निकलता है कि इस मैच फिक्सिंग में नामांकन भरने वाली अन्य समस्त छोटी पार्टियां, निर्दलीय व कांग्रेस भी भाजपा के साथ शामिल हैं। यह तो सेल्फ गोल है। 

अदूरदर्शी नेतृत्व! बदहवास कांग्रेस। 

इन मामलों को लेकर कांग्रेस नेतृत्व अपने कमजोरी को छुपाने के लिए डॉ. भीमराव अंबेडकर के भारतीय संविधान का हवाला देते समय यह भूल जाती है कि डॉ. अंबेडकर ने संविधान में यह प्रावधान नहीं किया था कि सत्ता पक्ष, विपक्ष के सही उम्मीदवारों का चयन कर सही तरीके से फार्म भरवाए और चुनाव कराये, ताकि विश्व में भारतीय लोकतंत्र के ‘‘दिये’’ की ‘‘लौ’’ जलती हुए दिखती रहे। दोनों जगह स्थानापन्न (डमी, वैकल्पिक) उम्मीदवारों का भी नामांकन खारिज हो जाना, कांग्रेस नेतृत्व की तथाकथित रणनीति, गंभीरता व अदूरदर्शिता को ही दिखाता है? कांग्रेस की लगातार हो रही बदहवासी के मात्र उक्त मामले ही नहीं हैं, बल्कि पूर्व में वर्ष 2009 में राजकुमार पटेल (पूर्व सांसद प्रत्याशी) जिन्होंने विदिशा लोकसभा क्षेत्र में चुनाव चिन्ह आवटन का पत्र बी ‘फार्म’ प्रस्तुत नहीं किया था और दूसरे भागीरथ प्रसाद (सेवा निवृत्त आएएस) जिन्हें वर्ष 2014 में कांग्रेस ने भिंड से अपना उम्मीदवार घोषित किया था, परन्तु उन्होंने कुछ सज्जनता बरतते हुए विश्वासघात न करते हुए टिकट वापिस कर भाजपा की टिकट पर चुनाव लड़कर जीते। ऐसी स्थिति से शायद ही देश की किसी अन्य छोटी अथवा बड़ी राजनैतिक पार्टी को गुजरना पड़ा हो। 

चुनावी राजनीति की ‘‘नई प्रणाली का ईजाद’’! 

लोकसभा के इसी आम चुनाव में मध्यप्रदेश के खजुराहो संसदीय क्षेत्र से इंडिया गठबंधन के उम्मीदवार मीरा यादव का नामांकन एक जगह ‘‘हस्ताक्षर न होने’’ के कारण निरस्त कर दिया गया, वहां भी षड्यंत्र की ‘‘बू’’ की अपुष्ट खबरें हैं। अभी तीसरे दौर के चुनाव में इंदौर से कांग्रेस उम्मीदवार अक्षय कांति बम से भी नामांकन वापिस करवा कर सूरत का इतिहास दोहराने का आंशिक प्रयास अवश्य हुआ। मतलब कांग्रेस के उम्मीदवार ने फार्म तो वापस ले लिया। परंतु अन्य समस्त उम्मीदवारों के फॉर्म वापस न लेने अथवा न हो पाने के कारण इंदौर ‘सूरत’ (निर्विरोध चुनाव की स्थिति) नहीं बन पाया। अभी तो सूरत बनने व बनाने की प्रक्रिया प्रारंभ हुई है? पश्चिम बंगाल की तेज तर्रार नेत्री मुख्यमंत्री ममता का बंगाल में ‘खेला’ होगा कि नहीं, यह देखना तो अभी शेष है, परन्तु उसी बंगाल के प्रभारी रहे व ममता बनर्जी को सफलता पूर्वक चुनौती (पहली बार लोकसभा की 18 सीटे भाजपा ने जीती थी) देने वाले कद्दावर नेता कैलाश विजयवर्गीय ने अपने घर मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर में बड़ा ‘‘खेला’’ कर चौका दिया। कांग्रेस के अक्षय कांति बम कांग्रेस के लिए फुस्सी बम होकर न केवल भाजपा के लिए ‘बम’ फोड़ा है, बल्कि मोदी की स्वच्छता अभियान के पिछले 7 साल से प्रथम रहने वाला इंदौर व 2023 में इंदौर के साथ संयुक्त रूप से सूरत शहर ने प्रथम रहकर राजनीति में भी वही ‘‘स्वच्छता’’ को बनाए रखने के लिए एक बम फोड़ कर इंदौर व सूरत के कांग्रेस के कचरे को हटाकर ‘‘कचरा से ऊर्जा बनाने’’ वाली अपनी मशीन में डालकर नई ऊर्जा बनाकर/पाकर मोदी के कांग्रेस मुक्त भारत की सोच में भी महत्वपूर्ण योगदान किया है।

जन प्रतिनिधियों को ‘‘बंधक’’ किये जाने की राजनीति को बढ़ावा?

सूरत के बाद इंदौर की घटना ने ‘‘कांग्रेस की सूरत को बदसूरत कर कालिक अवश्य पोत दी’’ है। परंतु अरुणाचल से प्रारंभ होकर खजुराहो, सूरत व इंदौर तक की लगभग एक ही तरह की नई चुनावी पद्धति की घटनाओं की श्रृंखला ने भविष्य की नई तरह की चुनावी राजनीति का संकेत अवश्य दे दिया है। इस नई नीति में पूर्व में चुने गये जन प्रतिनिधियों के साथ आज चुने जाने वाले उम्मीदवार को बंधक बनाने की नीति को बढ़ावा देने के साथ इसे होटल और पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देने की नई नीति भी कह सकते हैं। वह इसलिए की अब राजनीतिक पार्टियों को अपने उम्मीदवारों के साथ-साथ प्रस्तावकों को भी नामांकन वापसी की तारीख तक ‘‘होटल’’ में रखना या फिर बाहर घूमने फिरने भेजना होगा। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार अभी तक की राजनीति में, राजनीतिक दलों के टूटने पर या विधानसभा में बहुमत के प्रश्न पर जब बहुमत के आंकड़े ‘‘छीण’’ होते हैं, विधायकों को होटल में रखना या सैर सपाटे के लिए बाहर घूमने भेज देने की राजनीति पिछले कुछ समय से धड़ल्ले से सफलतापूर्वक चल रही है। देश में कुल 4126 विधानसभा क्षेत्र व 781 सांसद है। निर्दलीय उम्मीदवार को 10 प्रस्तावक लगते है। अब आप गणना कर लीजिए इनका खडे होने वाले उम्मीदवारों व उनके प्रस्तावकों की संख्या मिलाकर उनका कुल खर्चा। इस ‘‘नई नवेली नीति’’ का नई नवेली शादी के जोड़े का स्वागत करने के समान की बजाय, इस नीति के लोकतंत्र पर पड़ने वाले परिणाम पर गंभीरतापूर्वक विचार व आकलन करना आवश्यक हो गया है। 

हो रहे कम मतदान से ‘‘लाभ-हानि’’ के आकलन से इतर ‘‘आकलन’’!

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का सबसे बड़ा संसदीय चुनावी महाकुंभ के अभी दोनों फेसों के मतदान पूर्ण हो चुके हैं, जहां कुल 190 (लगभग एक तिहाई) लोकसभा क्षेत्र का भाग्य सील बंद हो गया है। इन दोनों फेस में मतदान पिछले वर्ष 2019 की तुलना में लगभग 6 प्रतिशत कम हुआ है। तथापि अभी-अभी चुनाव आयोग द्वारा जारी नवीनतम अधिकृत आंकड़ों के अनुसार यह अंतर कम होकर लगभग 3 प्रतिशत हो गया है। समस्त विश्लेषक इसका आकलन अपने-अपने हिसाब से कर रहे हैं कि इसका परिणाम/दुष्परिणाम किस गठबंधन के पक्ष में होगा? परन्तु इसे मैं एक बिल्कुल अलग नजरिए से देखता हूं। आखिर ‘‘कम मतदान’’ का कारण क्या है? जब आप इस ‘‘कम मतदान’’ को ‘‘नोटा’’ के साथ मिलाकर देखेंगे तो आपके सामने एक नई पिक्चर ही सामने आयेगी। नोटा का उपयोग वे ही लोग करते हैं, जो वर्तमान राजनीतिक पार्टियों व उम्मीदवारों से परेशान हैं और संतुष्ट नहीं है। अतः वे खीझकर एक ‘‘काल्पनिक’’ उम्मीदवार नोटा जो उनकी ‘‘कल्पना’’ के शायद ज्यादा अनुकूल है, को वोट दे देते है, उस ‘‘नोटा’’ को जो कभी भी शासनारूढ (‘शासन’) नहीं हो सकता है। उच्चतम न्यायालय ने नोटा का अधिकार देते समय लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 79 (घ) का उल्लेख करते हुए इस तथ्य को रेखांकित किया कि जिस प्रकार नागरिकों को ‘‘मत देने’’ का अधिकार है, उसी प्रकार उन्हें किसी भी उम्मीदवार को ‘‘मत न देने’’ का भी अधिकार प्राप्त है। मतलब इस अधिकार की पूर्ति ‘‘नोटा’’ द्वारा अथवा मतदान केन्द न जाकर भी की जा सकती है। मतदान केन्द्र में मत देने न जाने वाले मतदाता का कारण व रूख लगभग वही होता है, जो मतदान केन्द्र में जाकर ‘‘नोटा’’ का बटन दबाते है। अवश्य कुछ लोग अन्य कारणों से शादी-ब्याह, बीमारी या बाहर रहने के कारण वोट ड़ालने जाने से महरूम हो जाते हैं। इसलिए यदि वोटिंग व मत प्रतिशत बढ़ाना है, तो निश्चित रूप से नोटा को हटाना पड़ेगा। अथवा पुर्नगठन कर नोटा को प्रभावी व दंतयुक्त बनाना पड़ेगा, कैसे? जिसका उल्लेख मैंने पिछले लेख में किया है।

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