शुक्रवार, 10 मई 2013

बेशरम कांग्रेस को वोट देकर क्या जनता भी बेशरम नहीं हो गई है?


राजीव खण्डेलवाल:
             कर्नाटक विधानसभा के हुए चुनाव में कांग्रेस की हुई विजय न तो आश्चर्यजनक और न ही अचंभित करने वाले परिणाम है। कर्नाटक भाजपा से येदुरप्पा के अलग पार्टी (केजीपी) बनाने के बाद से ही यह स्पष्ट हो गया था कि वोटो का बॅटवारा होने के कारण कांग्रेस की सरकार बननी तय है जैसे कि एग्जिट पोल में भी बतलाया गया था। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा हुआ है? यदि भाजपा और येदुरप्पा के वोट जोड़ दिये जाये तो भी वे कांग्रेस को प्राप्त वोटो से अधिक नहीं है। 22 प्रतिशत भाजपा और 9 प्रतिशत वोट येदुरप्पा की पार्टी को मिले इस प्रकार कुल 31 प्रतिशत होते है जो कांग्रेस को प्राप्त वोट 37 प्रतिशत से काफी कम ही है पिछले चुनाव के नतीजो से एकदम भिन्न भी है। प्रश्न यह पैदा होता है कि क्या कर्नाटक भाजपा की सरकार का अन्तर्कलह, भ्रष्टाचार, महंगाई और सरकारी प्रशासन की लापरवाही कांग्रेस की पूर्ववर्ती सरकार या केंद्रीय कांग्रेसी सरकार से ज्यादा परेशान करने वाली हो गई थी जिस कारण से जनता ने कांग्रेस को वोट दिया। वर्तमान में जो कांग्रेस नेतृत्व है और उसकी केंद्रीय सरकार केंद्र में चल रही हैं वह अब तक की भ्रष्ट बेशरम व निकम्मी सरकार है इस बाबत शायद ही दोमत हो। यद्यपि इस राजनैतिक हमाम में सब नंगे है यह तथ्य भी 100 प्रतिशत सही है। लेकिन प्रजातंात्रिक व्यवस्था के इस हमाम से ही जनता को अपने प्रतिनिधियों को चुनना है। तब अंधो में काना राजा का मुहावरा ही चलन में होना चाहिए। अर्थात अधिक बुरे से कम बुरे को चुने जाना जनता की मजबूरी है। बात जब राजनीति की समस्त बुराईयां की है तो यह निश्चित है कि देश की सबसे पुराना राजनैतिक दल कांग्रेस ही उसका नेत्रत्व करती है। देश में इस समय जो राजनीतिक असहिष्णुता, अराजकता, भ्रष्टाचार, महंगाई चोरी और सीनाजोरी का जो वातावरण पिछले कुछ समय निर्मित से हुआ हैं। इसके लिए सबसे ज्यादा कोई पार्टी जिम्मेदार है तो वह कांग्रेस ही है। इसके बावजूद विकल्प हीनता के आधार पर यदि भ्रष्टतम कांग्रेस को विपक्ष की तुलना में कम भ्रष्ट मानकर चुना मानकर जा रहा हैं तो इसका सबसे बड़ा दोष जनता का ही है। जो कांग्रेस को इस बात के लिए उत्साहित-प्रोत्साहित कर रही है कि वर्तमान परिस्थितियों में उसने जितने भी उल्टे गलत जनविरोधी निर्णय लिये है कार्य किये है उस पर कर्नाटक की जनता ने मोहर लगाकर कांग्रेस का हौसला अफजाई ही किया है। इसलिए भविष्य में कांग्रेस अपनी इन गलतियों को सुधारने का प्रयास करेगी इन सम्भावनाओं को कर्नाटक के चुनाव परिणामों ने छीण कर दिया है। कांग्रेस की बेसर्मी जगजाहिर है। जनता की जो चाहे मजबूरी हो लेकिन उसका यह कदम मजबूरी कम और कांग्रेस के ताल में ताल मिलाकर बेसर्मी को ही सिद्ध करता है। 
             कुछ नहीं तो जनता इतना तो अवश्य कर सकती थी कि सही विकल्प के अभाव में सम्पूर्ण राजनीतिक व्यवस्था को दीमक के समान खोखली कर देने वाली कांग्रेस को चुनने के बजाय वह अपना मत न देकर मौन विरोध ही प्रदर्शित कर राजनीतिक पार्टियों को इस बात की चेतावनी देती। लोकतंत्र में प्रजातांत्रिक प्रणाली जो कि बहुमत के आधार पर शासन करती है। उसमें जनता के बहुमत की जब भागीदारी नहीं होगी तब ही इस बात का दबाव राजनैतिक पार्टियों पर पड़कर उनको सुधरने का या कुछ नया सोचने का एक मौका मिलेगा। 
             कर्नाटक का जनादेश राजनीतिक रूप से अपेक्षित और स्वाभाविक होने के बावजूद मैं यह मानता हूं जनता को इससे कुछ बाहर निकलकर खोखली होती हुई राजनीतिक व्यवस्था को दुरूस्त करने के लिए अपने ही तरीके से एक मेसेज राजनैतिक तंत्र को देना था जिसमें वह न केवल असफल हुई बल्कि जिन कारणो से राजनैतिक तंत्र असफल हो रहा है जिसके लिए जो पार्टी सबसे ज्यादा जिम्मेदार है उसको जनादेश देकर एक ऐतिहासिक गलती हुई है इसे आगामी होने वाले और आम चुनावों में सुधारने की नितांत आवश्यकता है। 
(लेखक वरिष्ठ कर सलाहकार एवं पूर्व नगर सुधार न्यास अध्यक्ष है)

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