शुक्रवार, 3 अगस्त 2012

भ्रष्टाचार की समस्या का निवारण मात्र जनलोकपाल कानून नहीं बल्कि ‘दोहरे चरित्र’ की समाप्ति की आवश्यकता

                  अन्ना का ‘जनलोकपाल बिल’ को कानून बनाने के लिए चल रहा आंदोलन के दौरान ही जनता के बीच यह साफ हो चुका था कि मात्र जनलोकपाल कानून बनने से भ्रष्टाचार की समस्या का न तो निवारण होगा और न ही उस पर प्रभावी अंकुश लग पायेगा। समस्या कानून की न होने की नहीं, लागू होने की नही है बल्कि उसको लागू करने वाले व्यक्तियों के दोहरे चरित्र होने के कारण उनकी की दृढ़ इच्छाशक्ति का अभाव का होना है।
                  यदि हम अन्ना के 16 महीने के आंदोलन के दौर पर विचार करे तो यह हमारे सामने एक बहुत ही साफ चित्र सामने आता है वह यह कि इस आंदोलन में शामिल या प्रभावित होने वाला प्रत्येक वर्ग चाहे वह संसद हो, सरकार हो, अन्ना टीम हो, समस्त राजनैतिक पार्टीयां हो, नेता हो, अभिनेता हो, बुद्धिजीवी वर्ग हो या आम जनता हो, सबका दोहरा चरित्र कमोवेश एक दूसरे के सामने आ गया है। यह देश की चिंता का विषय है। यदि हम आज व्यक्ति/संस्था के दोहरे चरित्र की बात करते है तो दोहरे चरित्र का यह मतलब कदापि नहीं है कि यदि किसी व्यक्ति ने एक समय कोई स्टेण्ड लिया और वह अनुभव के आधार पर परिस्थितिवश हालत बदलने के कारण अपने स्टैण्ड में बदलाव लाता है। एक साथ ही कथनी व करनी में अंतर ही दोहरा चरित्र है। 
                  बात पहिले अन्ना की ही कर ले। अन्ना एवं उनकी टीम द्वारा सदा से ही लगातार यह कहा जा रहा था कि यह एक गैर राजनैतिक जन-आंदोलन है व वे कभी भी इस राजनैतिक कीचड़ में नहीं पड़ेंगे। इसी राजनीतिक कीचड़ के कारण वर्तमान संसद 166 से अधिक आरोपित सांसदो से घिरी हुई है। मुझे ख्याल आता है जब अन्ना का प्रथम बार आंदोलन हुआ था तो उमाजी जो उनको समर्थन देने गई थी तब उन्हे मंच पर चढ़ने नहीं दिया था जबकि उमाजी राजनीतिज्ञ के साथ-साथ साध्वी व प्रखर आध्यात्मिक वक्ता भी है। लेकिन राजनीति की ‘बू’ से उस समय अन्ना को इतनी ज्यादी चिढ़ थी कि उसकी छाया से भी उन्होने परहेज रखा। लेकिन वही अन्ना उस विलासराव देशमुख जो एक भ्रष्ट आरोपित केंन्द्रीय मंत्री थे (बाद में जारी 15 भ्रष्ट केन्द्रीय मंत्री की लिस्ट में भी उनका नाम शामिल था) प्रधानमंत्री की चिट्ठी को सार्वजनिक मंच पर आदर पूर्वक उनके हाथो से स्वीकार करते हुए वह चिट्ठी पढ़ी गई तब अन्ना को उनसे परहेज करने आवश्यकता महसूस नहीं पड़ी जैसा कि तृतीय स्टेज के आंदोलन में उन्होने भ्रष्ट मंत्रियो से मिलने से इनकार तक की बात कही थी। इससे अन्ना का दोहरा चरित्र परिलक्षित होता है। राजनीति से घृणा करने वाले अन्ना का राजनैतिक विकल्प देने की घोषणा करना भी दोहरे चरित्र का उदाहरण है। यहा कुछ लोग इसे अपने पूर्व स्टेंड का बदलना भी कह सकते है। 
                  राजनैतिक विकल्प की घोषणा के साथ अन्ना एवं अरविंद केजरीवाल द्वारा कोई चुनाव न लड़ने की घोषणा एवं कोई पद ग्रहण न करने का कथन भी दोहरे चरित्र का उदाहरण है इस अर्थ में कि वे एक ओर सक्रिय चुनावी राजनीति में अच्छे लोगो को आने की सलाह भी दे रहे लेकिन वे स्वयं उन अच्छे लोग से अधिक अच्छे होने के बाद सक्रिय राजनीति में भाग लेने से इंकार रहे है। जो आचरण एवं कार्य दूसरे को करने के लिए कह रहे है यदि वे स्वयं उसको अंगीकृत नहीं करते है तो यह दोमुही बाते ही कही जायेगी।
                  जनलोकपाल बिल के लिए अंतिम सांस तक अनशन करने की बात करने के बाद अचानक बिना उद्वेश्य की प्राप्ति के या बिना किसी उपलब्धि के अनशन समाप्त करना। इसके पूर्व अनशन में तो उन्हे सरकार की तरफ से कुछ न कह आश्वासन भी मिला था। यह दोहरे चरित्र के साथ जनता के विश्वास को एवं तोड़ना भी है। देश आंदोलनकारी व जनता को एक माला में पिरोने का आव्हान करने वाली अन्ना टीम स्वयं एकमत न होकर समय-समय पर उनके अलग-अलग स्वर प्रस्फुटित हो रहे थे जो अन्ना टीम के विरोधाभासी आचरण का प्रतीक है।
                  बात जहां तक संसद एवं विभिन्न राजनैतिक दलों की है जिन्होने संसद में सर्वसम्मति से ऐतिहासिक रूप से अन्ना के मुद्दो पर सहमति देकर स्वीकार कर जो ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित कर प्रधानमंत्री ने अन्ना को सेल्यूट किया। इसके बाद क्या हुआ? जब बिल पेश हुआ व उस पर विभिन्न राजनैतिक दलो ने जो विचार व्यक्त किये थे वे घोर अवसरवादी होते हुए दोहरे चरित्र के ही प्रतीक थे। बात अभिनेताओ की भी कर ली जाये वैसे वे डबलरोल में काम करने के अभ्यस्त है। (अनुपम खेर जैसे व्यक्तियों को छोड़ दिया जाए तो)
                  बात मीडिया की भी कर ली जावे। यदि वास्तव में इलेक्ट्रानिक मीडिया नहीं होता तो यह आंदोलन इतना प्रभावी नहीं दिखता। यह इस बात से भी समझा जा सकता है कि आंदोलन का आव्हान पूरे देश में किया गया था। लेकिन भीड़ मात्र रामलीला मैदान या जंतर मंतर में दिखी क्यो? टीआरपी के चक्कर में मीडिया ने दोहरा आचरण दिखाया।
                  अंत में जनता की बात आती है जो स्वयं दोहरे चरित्र से ग्रसित है जो ही समस्या का मूल कारण है। जनता ने अन्ना टीम के आव्हान पर यह टोपी पहन मैं भी अन्ना तू भी अन्ना। क्या ये टोपी धारी (बाकी लोगो को तो छोड़ ही दिया जाये) इन 16 महीनो में ‘अन्ना’ बन जाने से भ्रष्टाचार से मुक्त हो गये है? बड़ा प्रश्न है?

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