सोमवार, 15 अगस्त 2011

आंदोलन-परमिशन क्या परस्पर विरोधाभासी नहीं?



पूरे देश में इस समय एक ही बात पर बहस हो रही है १६ तारीख को अन्ना हजारे का अनशन होगा कि नहीं? क्योंकि इसके लिए सिविल सोसायटी के लोगो ने अनशन की ''परमिशन" शासन व पुलिस कमीश्नर से मांगी जो देहली पुलिस द्वारा २२ शर्तो के साथ ''परमिशन" दी गई जिसमें से २० शर्ते पूर्व में अन्ना टीम स्वीकार कर चुकी है लेकिन आज १६ शर्तो की स्वीकृति का शपथ पत्र देने के बाद बची शेष शर्ते न मानने के कारण देहली पुलिस ने अभी तक स्वीकृति प्रदान नहीं की और इसलिए अन्ना के अनशन पर एक संदेह पैदा हो गया है। 

यह पूरा घटनाक्रम जो पिछले एक हप्ते से ''अनशन की परमिशन" के कारण पैदा हो रहा है वह यह है कि क्या विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में आंदोलन या अनशन के लिए ''परमिशन" की आवश्यकता है? जिस तरह से सरकार अन्ना टीम को 'परमिशन" के लिए झुला रही है और अन्ना टीम भी एक ऑफिस से दूसरे ऑफिस के चक्कर लगा रही है, क्या यह उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन व आक्रमण तो नहीं है? इस पर भी अन्ना टीम को गहराई से लोकपाल के मुद्दे के साथ विचार और चिंतन करना आवश्यक हो गया है। अन्ना जैसे व्यक्तित्व जिसे पूरे देश का जनसमर्थन अनशन और आंदोलन के लिए प्राप्त हो रहा है, की तुलना में दूसरा अन्य व्यक्ति या संस्था जनता से जुड़े किसी अन्य मुद्दे (जनता के सामने अनेक समस्याएं है) पर आंदोलन करने की हिम्मत कैसे जुटाएगा प्रश्र यह भी उत्पन्न होता है। यह प्रश्र इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि सरकार के मंत्री कालेधन के मुद्दे पर बाबा रामदेव के एक बहुत बड़े जन आंदोलन को पुलिस प्रशासन के बल पूर्वक उपयोग कर सफलता पूर्वक कुचलकर ''दम्भ" भर रही है। दम्भ भरने के कारण सरकार का हौसला अन्ना के इस आंदोलन को भी कुचलने के लिए बढ़ा हुआ है और इसलिए यह परमिशन का नौटंकी चल रही है। 
वास्तव में कोई भी ''आंदोलन" जिसका रूप धरना, अनशन, आमरण अनशन, अनिश्चितकालीन अनशन जुलूस, चक्का-जाम, अवज्ञा इत्यादि के रूप में होता है, तब किया जाता है जब सरकार नागरिकों और समाज से जुड़े किसी मुद्दे पर आम नागरिकों की इच्छा के विरूद्ध कार्य करती है। तब कोई व्यक्ति संस्था या पार्टी आम नागरिकों की बहुमत कीइच्छा के आधार पर उक्त मुद्दे को सरकार के समक्ष उठाती है। जब सरकार उसपर कोई ध्यान नहीं देती या विचार नहीं करती है या उस पर कोई कार्यवाही नही करती तब ही 'आंदोलन" की ''उत्पत्ति" होती है। जब 'आंदोलन" किया जाता है तब उसमें निहित अर्थ और प्राथमिक भावार्थ जो आंदोलनकर्ताओं के दिमाग में होता है कि वह सरकार की सामान्य गतिविधियों और मशीनरी पर अवरोध कर सरकार के मन में यह दहशत पैदा करें। यह डर पैदा करे कि यदि उनकी सही जरूरी मांगे जिसके पीछे जनता का एक बहुत बड़ा वर्ग खड़ा है और उसकी स्वीकार्यता को स्वीकार करता है वह सरकार के खिलाफ सड़क पर खड़ा हो जाएगा। अर्थात कोई न कोई नियम-कानून का उलंघन कर जनता का ध्यान आकर्षित कर सरकार का ध्यान आकर्षित होगा और आंदोलन को तीव्रता देकर सरकार के मन में दहशत पैदा करेगा। तभी उसकी जायज मांगो पर सरकार विचार करेगी। यही आंदोलन का मूल मंत्र है। अर्थात आंदोलन में कानून नियम का उलंघन निहितार्थ है और यह कानून नियम का उलंघन उसके संवैधानिक मौलिक और उसके मानवाधिकार के तहत है जिसे भी कानूनी कहा जा सकता है। अर्थात एक कानून का उलंघन दूसरे स्थापित कानून द्वारा किया जा रहा है इसलिए उसे उचित और जायज एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में माना गया है। इस देश में सरकारी मुलाजिमों द्वारा दफ्तरो में नियम के अनुसार कार्य करना भी आंदोलन का एक अस्त्र बन चुका है। इसलिए 'आंदोलन" में परमिशन के लिए जगह कहां है। परमिशन का मतलब हम उस संस्था, संगठन से इस बात की उम्मीद करें जिसके खिलाफ हम आंदोलन करने जा रहे है उसी से हम कहे कि वह स्वयं के खिलाफ आक्रमण करने की इजाजत दें। क्या यह उचित है? इसलिए अन्ना हजारे को परमिशन के इतर किस उ्देश्य के लिए किस स्थान पर वह आंदोलन करने जा रहे है इसकी सूचना सरकार, क्षेत्राधिकार में आने वाली पुलिस प्रशासन व जनता को मीडिया के माध्यम से दे इसके अतिरिक्त जिम्मेदारी कहां है और इसलिए वेे आंदोलन करने में सक्षम है। अन्ना की टीम को दिल्ली के पुलिस आयुक्त और मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल, गृह मंत्री पी चिदम्बरम और माननीय प्रधानमंत्री से यह पूछने का अधिकार है कि इस देश में स्वतंत्रता प्राप्ति से लेकर आज तक का क्या यह पहला आंदोलन है। यदि उत्तर नहीं है तो आज तक जितने आंदोलन हुए है उसके लिए क्या सरकार से या पुलिस से अनुमति प्राप्त की गई और अनुमति नहीं ली तो उन पर क्या कार्यवाही की गई। और यदि अनुमति दी गई तो क्या इस तरह की २२ सूत्रिय शर्त कभी पूर्व में लगाई गई। यदि नहीं तो क्या सरकार यह कहना चाहती है कि आज की जो वर्तमान राजनैतिक परिस्थितियां है या आंदोलनकारी ने यह स्थिति पैदा कर दी है जो १९७४ के आंदोलन से भी बूरी स्थिति है। सरकार इस बात का जवाब दे कि इस देश में समस्त राजनैतिक पार्टियों में लाखों की संख्या में दिल्ली में कई बार प्रदर्शन हुए है तब क्या उनपर इस २२ सूत्रिय इस तरह तो सत्ता की बाबत प्रस्ताव लिया गया यह भी जनता का बताए। राजनैतिक पार्टिया अपनी सुविधा के अनुसार जब राजनैतिक आंदोलन बिना किसी परमिशन के कर सकती है तो अन्ना के द्वारा क्यों नही है।  इन सब प्रश्रो का उत्तर एक ही है कि अन्ना अनशन की मंजूरी के लिये सरकार के सामने याचिकाकार के रूप में न कर जनता के सम्मान को झुकाये बिना अपने एक लोकतांत्रिक संवैधानिक और मानवाधिकार के तहत जेपी सचान आंदोलन प्रारम्भ करे। जनता उनके साथ है और सरकार की किसी भी कार्यवाही का जवाब देने में वह न केवल सक्षम है बल्कि जाग्रत भी हो चुकी है। 

इसलिए इस बात पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है कि 'मिशन" (अन्ना द्वारा उठाये गये मुद्दे मिशन ही है) के लिए क्या 'परमिशन" की आवश्यकता है। क्या सरकार से इस बात का प्रश्र नहीं पूछा जाना चाहिए की बगैर परमिशन के राष्ट्र विरोधी संगठन इस देश को कमजोर करने के लिये जो मिशन चला रहे है सरकार ने उनको रोकने के लिए क्या किया। क्या उनके मिशन को परमिशन दी गई और यदि नहीं तो सरकार पूरी ताकत का उपयोग कर प्रभावी रूप से उन्हे क्यों नहीं रोक पा रही है जो ताकत (सत्ता की) का उपयोग वह अपने देश के नागरिकों के खिलाफ आंदोलन को कुचलने के लिए करना चाहती है।  

अत: अन्ना से यही उम्मीद की जाती है कि वे पूरी शक्ति के साथ 'आंदोलन" प्रारम्भ करे पूरे देश की जनता का जन, बल, भाव उनके साथ है। 
जय अन्ना

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