मंगलवार, 16 नवंबर 2010

क्या ‘‘ओछी राजनीति’’ के चलते राष्ट्र विरोधी कथन से भी बड़ा व्यक्तिगत आरोप हो गया है?

इस समय पूरे देश में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक कुप सी सुदर्शनजी की श्रीमति सोनिया गांधी और स्वर्गीय भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गांधी के प्रति की गई असामयिक टिप्पणी की पूरे देश में जो प्रतिक्रिया हुई है वह स्वभाविक है और प्रतिक्रिया होनी भी चाहिए। उक्त टिप्पणी देश के भूतपूर्व प्रधानमंत्री के विरूद्ध व्यक्तिगत (संस्थागत नही) होने के बावजूद सार्वजनिक रूप से बिना किसी तात्कालिक संदर्भ के की गई है। यद्यपि ऐसी टिप्पणियां पहली बार नहीं हुई है पूर्व में कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव के अवसर पर स्वर्गीय जितेन्द्र प्रसादजी पूर्व केंद्रीय मंत्री (वर्तमान सांसद जतिन प्रसादजी के पिता) खड़े हुए थे जो गांधी परिवार के काफी निकट थे तब उनके समर्थकों ने सोनिया गांधी पर ‘‘सीआईए एजेंट‘‘ का नारा लगाते हुए उनके विरूद्ध वापस जाओं के नारे लगाये गये थे। इसी प्रकार हैदराबाद हवाई अड्डे पर तत्कालीन केंद्रीय मंत्री पी. उपेन्द्र को देखकर स्व. इंदिराजी की यह टिप्पणी चर्चा में थी ‘‘यदि मैं जीवित रही तो इसे मुर्दा देखुंगी’’। इसी प्रकार पूर्व सांसद एवं जनता पार्टी के अध्यक्ष डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी पूर्व में उनके जन्म के संबंध सहित अनेक गम्भीर टिप्पणी कर चुके है।

                                      किन सार्वजनिक मर्यादित जीवन में किसी भी रूप से उक्त टिप्पणी को उचित एवं न्यायोचित नहीं कहा जा सकता है। इसलिए यदि उक्त टिप्पणी की निंदा हो रही है और स्वयं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने उक्त टिप्पणी को व्यक्तिगत विचार कहकर अपने को उससे अलग हटा लिया है, जो उक्त टिप्पणी की अवांछनीयता एवं असामयिकता को ही दर्शाता है। लेकिन इस घटना से व इससे पूर्व घटित कुछ घटनाओं ने संघ के संबंध में कुछ अभूतपूर्व प्रश्न अवश्य उत्पन्न हुये है। माननीय सुदर्शनजी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के पूर्व सर संघचालक थे तथा वे ऐसे दूसरे पूर्व सर संघचालक है जो पूर्व रहे है। प्रथम पूर्व सर संघचालक प्रो. रज्जू भैया (राजेन्द्र सिंह) को छोड़कर समस्त सर संघचालक अपने जीवन पर्यंत तक सर संघचालक रहे है। संघ विचारधारा से चलता है निजी विचारों से नही, इसके बावजूद यदि संघ ने श्री सुदर्शनजी के विचार को निजी विचार बतलाकर इतनी कड़ी प्रतिक्रिया दी है, तो वास्तव में उक्त बयान में ऐसी कुछ बात अवश्य है जो संघ की विचारधारा एवं कार्य प्रकृति से मेल नही खाती है। राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ द्वारा अपने प्रमुख स्वयं सेवक (मा. सुदर्शनजी) जो पूर्व में उनके मुखिया रहे है, के बयान को अपने से अलग करना भी अभूतपूर्व है। इतना ही नहीं माननीय एम.जी. वैद्यजी द्वारा उनके विरूद्ध मानहानि का मुकदमा और कानूनी नोटिस का सुझाव श्रीमति सोनिया गांधी को देना भी अभूतपूर्व है। इसके पूर्व संघ के वरिष्ठ स्वयंसेवक एवं पदाधिकारी श्री इंद्रेश पर लगाये गये आरोप को संघ ने व्यक्तिगत आरोप न मानकर संघ पर आरोप माना और इसलिये संघ के गठन से लेकर आज तक प्रथम बार पूरे देश में एक धरना आंदोलन किया गया वह भी अभूतपूर्व है। इन सब परिस्थितियों से यह तो स्पष्ट हो जाता है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ राष्ट्र एवं सार्वजनिक जीवन में किसी भी तरह के उद्वण्डता व व्यक्तिगत आरोपो से हमेंशा न केवल परहेज करता है बल्कि उसकी आलोचना भी करता है जो तथ्य यह सिद्ध करता है कि ‘संघ’ राजनीति से परे हटकर सार्वजनिक जीवन को स्वस्थ्य सुदृण बनाये रखने के लिए तथ्यों के सही होने पर वह उसे तुरंत स्वीकार करता है चाहे वे तथ्यों का उपयोग उसके खिलाफ ही क्यों न किया जाए। लेकिन क्या इसी तरह के कदम दूसरे पक्ष द्वारा भी उठाए गये है?

आरएसएस की इस तीखी प्रतिक्रिया से यह तो स्पष्ट रूप से सिद्ध हो गया है कि राष्टीय स्वयं सेवक संघ अपने सिद्धांतो के प्रति अडिग है। देशप्रेम, देशनिष्ठा तथा राजनैतिक सहिष्णुता, शालीनता उसमंे पूरी तरह समाई हुई है। जिस कांग्रेस ने उस पर तीन बार प्रतिबंध लगाया हो जिसके शीर्षस्थ पर इस तरह के आरोप पूर्व में लग चुके है तब संघ के शीर्षस्थ श्री सुदर्शन द्वारा लगाये गये आरोप के प्रतिउत्तर में आरएसएस के प्रमुख प्रोफेसर एम.जी. वैद्य द्वारा सोनिया गांधी को अपने शीर्षस्थ सुदर्शन जी के विरूद्ध मानहानी को कानूनी नोटिस देने की सलाह देना इस बात का घोतक है कि संघ कोई कार्य आवेश या जज्बात में नहीं करता है। वह अपने लक्ष्य के प्रति अडिग है और इसलिए जब इसके प्रमुख स्वयंसेवक एवं पदाधिकारी श्री इंद्रेशजी पर आतंकवादी घटना से जुड़ने का राजनैतिक आधार पर गम्भीर आरोप लगाये गये तो संघ ने पूरे देश में उसका अभूतूपर्व विरोध किया गया। क्योंकि वह आरोप सत्य से परे था। निश्चित रूप से यदि संघ के किसी व्यक्ति द्वारा किसी भी प्रकार कोई गलती की जाती या कोई व्यक्ति अपराधिक कार्याे में संलग्न होता तो संघ उपरोक्तानुसार उसके खिलाफ तुरंत कार्यवाही करता। परन्तु वास्तविक रूप से वस्तुस्थिति ऐसी नहीं पायी गई।
                                      प्रश्न यह है इस देश में किस तरह का सार्वजनिक जीवन चलेगा? राजनीति से प्रभावित हुए बिना ‘‘नीतिगत‘‘ स्वस्थ पारदर्शी प्रतिक्रिया क्या सार्वजनिक जीवन में संभव है अथवा नहीं? यह प्रश्न उपरोक्त प्रतिक्रिया एवं ‘‘बुकर’’ पुरस्कार प्राप्त सुश्री अरूंधति राय के काश्मीर के सम्बंध में दिये गये बयान पर राष्ट्र की प्रतिक्रिया से उत्पन्न होता है। लेखन के क्षेत्र में ‘‘वर्ष 2007 में मेन बुकर पुरस्कार और सिडनी पीस 2004’’ पुरस्कार से अलंकारित लेखिका सुश्री अरूंधति राय का बयान किसी व्यक्ति विशेष के विरूद्ध नहीं था जैसा कि सुदर्शन जी का था, बल्कि उनका बयान राष्ट्रीय अखण्डता, राष्टीªय अस्मिता व देशहित के खिलाफ और विदेशो में काश्मीर मुद्दे पर चल रहे दुष्प्रचार को मान्यता देने वाला था जो अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त एक भारतीय नागरिक द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय प्रचार पाने की ललक लिये विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के स्वतंत्र प्रजातन्त्र और प्रेस की स्वाधीनता का वजूद होने के कारण ही उक्त बयान सम्पूर्ण देश में प्रसारित होना सम्भव हो पाया। क्या उनका यह बयान हमारे संविधान की मूलभूत भावना और राष्ट्रीय अखण्डता के विरूद्ध नहीं है जो भारतीय दण्ड संहिता एवं दण्ड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत अपराध नहीं है? क्या ‘‘स्वतंत्रता’’ का यह मतलब तो नहीं है कि हम मानवाधिकार की आड़ में उसका दुरूपयोग कर भारत माता की अखण्डता व सीमा के साथ छेड़छाड़ करें। आज जब अन्तर्राष्ट्रीय संस्था ‘‘संयुक्त राष्ट्र संघ‘‘ ने स्वयं ‘‘काश्मीर‘‘ को लम्बे समय से चले आ रहे विवादित मुद्दे की सूची से हटा कर न केवल ‘भारतीय’ होने का आभास दिलाया है बल्कि श्रीमती अरूंधति राय के बयान की हवा ही निकाल दी। तब अरूंधति राय से लेकर जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री श्री उमर अब्दुला का काश्मीर के बारे में बयान का अपराध और कई गुना बढ़ जाता है। तब क्या उनके खिलाफ भारत सरकार को प्राथमिकी दर्ज नहीं करनी चाहिए था जैसा कि कुछ लोग सुदर्शनजी की व्यक्तिगत टिप्पणी (जो अवांछित होने के बावजूद) उन पर अपराधिक प्रकरण दर्ज कराने के लिए म.प्र. के केन्द्रीय कांग्रेस मंत्रियो का दल केन्द्रीय सरकार से मांग करने वाला है। क्या राजनीति की गिरावट इस हद तक पहुंच गई है? कांग्रेस को यह पूर्ण अधिकार है कि वे राजनैतिक लाभ एवं हानि को ध्यान में रखते हुए प्रदर्शन करे। ‘‘स्वामी भक्ति’’ को अग्रता देते हुए माननीय सुदर्शनजी के बयान का घोर विरोध करे लेकिन संघ कार्यालय पर तोड़-फोड़ का अधिकार उन्हे कोई परिस्थिति नही देती है। यदि वास्तव में वे अपने को पराक्रमी समझते है तो ‘‘दिग्गी राजा’’ द्वारा प्रतिबंधित सिम्मी के कार्यालय पर क्यों नहीं ताला जड़ते। लेकिन साथ ही उनका यह भी दायित्व बनता है कि स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने वाले वर्तमान में एकमात्र राजनैतिक पार्टी होने के कारण जब भारत ‘‘संघ’’ के खिलाफ अरूंधती राय ने बयान दिया तो उसका पूर्ण क्षमता के साथ ‘‘संघ’’ विरोध की ज्यादा ताकत से विरोध किया जाना चाहिए तथा इसके खिलाफ पूरे देश में धरना आंदोलन जूलूस इत्यादि कार्यवाही की जानी चाहिए थी। एक सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदारी के पद पर रहकर राष्ट्र की सरकार चलाने में भागीदार होते हुए यह दायित्व बनता है कि हम राजनीति प्राथमिकता तय करते समय देश की अस्मिता को पहला स्थान दे। ‘‘भारत देश’’ की अस्मिता ‘‘व्यक्ति’’ की अस्मिता से बड़ी है। यदि ‘‘देश भक्ति’’ की भावना को राजनीति से ऊपर उठकर हर पार्टी व नागरिको ने मान्यता दी होती तो मै यह मानता हूं कि इस प्रकार की घटनाएं घटित ही नहीं होती। देश के प्रति इस मानसिकता को बदलने की आज प्रत्येक नागरिक को आवश्यकता है क्योंकि इससे यह बात तो सिद्ध होती है कि नागरिको में देश प्रेम की भावना में कही न कही कमी आयी है, अरूचि बढ़ी है। उक्त मुद्दे के घटित होने से प्रत्येक नागरिक को एक अवसर मिला है जिस पर चिंतन कर यदि उसके देश प्रेम के जज्बे में काई कमी आई है तो वह उस कमी को दूर कर सके तो हम देश के प्रति अपने कर्तव्य पालन में न केवल खरे उतरेंगे बल्कि इन भावनाओं के मजबूत होने पर भविष्य में इस तरह के बयानबाजी को भी हतोत्साहित करेंगे जो अंततः देश को मजबूत बनायेगा।

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